यूआईडीः यह कार्ड खतरनाक है

वर्ष 1991 में भारत सरकार के वित्त मंत्री ने ऐसा ही कुछ भ्रम फैलाया था कि निजीकरण और उदारीकरण से 2010 तक देश की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी, बेरोज़गारी खत्म हो जाएगी, मूलभूत सुविधा संबंधी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी और देश विकसित हो जाएगा. वित्त मंत्री साहब अब प्रधानमंत्री बन चुके हैं. 20 साल बाद सरकार की तरफ से भ्रम फैलाया जा रहा है, रिपोट्‌र्स लिखवाई जा रही हैं, जनता को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि आधार कार्ड बनते ही देश में सरकारी काम आसान हो जाएगा, सारी योजनाएं सफल होने लगेंगी, जो योजना ग़रीबों तक नहीं पहुंच पाती वह पहुंचने लगेगी और सही लोगों को बीज एवं खाद की सब्सिडी मिलने लगेगी. लेकिन अगर यह सब नहीं हुआ तो इसके लिए किसे ज़िम्मेदार माना जाएगा?

यूआईडीएआई ने इसके लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन. इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं. इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है.

अब पता नहीं कि सरकार क्यों इस कार्ड को अलादीन का चिराग बता रही है. हमारी तहक़ीक़ात तो यही बताती है कि राशनकार्ड, कालेज या दफ्तर का पहचान पत्र, पासपोर्ट, पैनकार्ड और निहायत ही घटिया मतदाता पहचान पत्र की तरह हमारे पास एक और कार्ड आ जाएगा. जिसकी नकल भी मिलेगी, फर्ज़ीवाड़ा भी होगा, कार्ड बनाने वाले दलालों के दफ्तर भी खुल जाएंगे और कुछ दिनों बाद सरकार कहेगी कि कार्ड की योजना में कुछ कमी रह गई. क्या भारत सरकार संसद और सुप्रीम कोर्ट में यह हल़फनामा देगी कि इस कार्ड के बनने से ग़रीबों तक सभी योजनाएं पहुंच जाएंगी, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? दरअसल, इस कार्ड की संरचना, योजना और कार्यान्वयन की कामयाबी भारत में संभव ही नहीं है. आधार कार्ड से कुछ ऐसे सवाल खड़े हुए हैं, जिनका जवाब देना सरकार की ज़िम्मेदारी है.

इस सरकारी अलादीन के चिराग से जुड़ा पहला सवाल यह है कि दुनिया के किसी भी देश में क्या इस तरह के पहचान पत्र का प्रावधान है? क्या अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी एवं फ्रांस की सरकार ने इस कार्ड को अपने यहां लागू किया? अगर दुनिया के किसी देश ने यह नहीं किया तो क्या हमने इस बायोमेट्रिक पहचान पद्धति के क्षेत्र में रिसर्च किया या कोई प्रयोग किया या फिर हमारे वैज्ञानिकों ने कोई ऐसा आविष्कार कर दिया, जिससे इस पहचान पत्र को अनोखा बताया जा रहा है. सभी सवालों का जवाब नहीं में है. हकीकत तो यह है कि हमने सीधे तौर पर पूरी योजना को निजी कंपनियों पर आश्रित कर दिया. ऐसी कंपनियों पर, जिनका सीधा वास्ता विदेशी सरकारों और खु़फिया एजेंसियों से है.

दिल्ली सल्तनत का एक राजा था सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक. मुहम्मद बिन तुग़लक वैसे तो विद्वान था, लेकिन उसने जितनी भी योजनाएं बनाईं, वे असफल रहीं. इतिहास में यह अकेला सुल्तान है, जिसे विद्वान-मूर्ख कहकर बुलाया जाता है. मुहम्मद बिन तुगलक के फैसलों से ही तुग़लकी फरमान का सिलसिला चला. तुग़लकी फरमान का मतलब होता है कि बेवक़ू़फी भरा या बिना सोच-विचार किए लिया गया फैसला. वह इसलिए बदनाम हुआ, क्योंकि उसने अपनी राजधानी कभी दिल्ली तो कभी दौलताबाद तो फिर वापस दिल्ली बनाई. इतिहास से न सीखने की हमने कसम खाई है, वरना नए किस्म का पहचान पत्र यानी यूआईडी या आधार कार्ड लागू नहीं होता. यह कार्ड खतरनाक है, क्योंकि देश के नागरिक निजी कंपनियों के चंगुल में फंस जाएंगे, असुरक्षित हो जाएंगे. सबसे खतरनाक बात यह है कि भले ही हमारी सरकार सोती रहे, लेकिन विदेशी एजेंसियों को हमारी पूरी जानकारी रहेगी. अ़फसोस इस बात का है कि सब कुछ जानते हुए भी भारत जैसे ग़रीब देश के लाखों करोड़ रुपये यूं ही पानी में बह जाएंगे. सरकार ने इतना बड़ा फैसला कर लिया और संसद में बहस तक नहीं हुई.

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने इसके लिए तीन कंपनियों को चुना-एसेंचर, महिंद्रा सत्यम-मोर्फो और एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन. इन तीनों कंपनियों पर ही इस कार्ड से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारियां हैं. इन तीनों कंपनियों पर ग़ौर करते हैं तो डर सा लगता है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन का उदाहरण लेते हैं. इस कंपनी के टॉप मैनेजमेंट में ऐसे लोग हैं, जिनका अमेरिकी खु़फिया एजेंसी सीआईए और दूसरे सैन्य संगठनों से रिश्ता रहा है. एल-1 आईडेंटिटी सोल्यूशन अमेरिका की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनियों में से है, जो 25 देशों में फेस डिटेक्शन और इलेक्ट्रानिक पासपोर्ट आदि जैसी चीजों को बेचती है. अमेरिका के होमलैंड सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट और यूएस स्टेट डिपार्टमेंट के सारे काम इसी कंपनी के पास हैं. यह पासपोर्ट से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक बनाकर देती है.

इस कंपनी के डायरेक्टरों के बारे में जानना ज़रूरी है. इसके सीईओ ने 2006 में कहा था कि उन्होंने सीआईए के जॉर्ज टेनेट को कंपनी बोर्ड में शामिल किया है. जॉर्ज टेनेट सीआईए के डायरेक्टर रह चुके हैं और उन्होंने ही इराक़ के खिला़फ झूठे सबूत इकट्ठा किए थे कि उसके पास महाविनाश के हथियार हैं. अब कंपनी की वेबसाइट पर उनका नाम नहीं है, लेकिन जिनका नाम है, उनमें से किसी का रिश्ता अमेरिका के आर्मी टेक्नोलॉजी साइंस बोर्ड, आर्म्ड फोर्स कम्युनिकेशन एंड इलेक्ट्रानिक एसोसिएशन, आर्मी नेशनल साइंस सेंटर एडवाइजरी बोर्ड और ट्रांसपोर्ट सिक्यूरिटी जैसे संगठनों से रहा है. अब सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कंपनियों को भारत के लोगों की सारी जानकारियां देकर क्या करना चाहती है? एक तो ये कंपनियां पैसा कमाएंगी, साथ ही पूरे तंत्र पर इनका क़ब्ज़ा भी होगा. इस कार्ड के बनने के बाद समस्त भारतवासियों की जानकारियों का क्या-क्या दुरुपयोग हो सकता है, यह सोचकर ही किसी का भी दिमाग़ हिल जाएगा. समझने वाली बात यह है कि ये कंपनियां न स़िर्फ कार्ड बनाएंगी, बल्कि इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीन भी बनाएंगी. सारा डाटाबेस इन कंपनियों के पास होगा, जिसका यह मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगी. यह एक खतरनाक स्थिति है.

सरकार की तऱफ से भ्रम फैलाया जा रहा है, रिपोट्‌र्स लिखवाई जा रही हैं, जनता को समझाने की कोशिश की जा रही है कि आधार कार्ड बनते ही सारा सरकारी काम आसान हो जाएगा. क्या सरकार संसद और सुप्रीम कोर्ट में यह हल़फनामा देगी कि इस कार्ड के बनने से ग़रीबों तक सभी योजनाएं पहुंच जाएंगी, भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा?

यही वजह है कि कई लोग इस कार्ड की प्राइवेसी और सुरक्षा आदि पर सवाल उठा चुके हैं. बताया तो यह जा रहा है कि इस कार्ड को बनाने में उच्चस्तरीय बायोमेट्रिक और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा. इससे नागरिकों की प्राइवेसी का हनन होगा, इसलिए दुनिया के कई विकसित देशों में इस कार्ड का विरोध हो रहा है. जर्मनी और हंगरी में ऐसे कार्ड नहीं बनाए जाएंगे. अमेरिका ने भी अपने क़दम पीछे कर लिए हैं. हिंदुस्तान जैसे देश के लिए यह न स़िर्फ महंगा है, बल्कि सुरक्षा का भी सवाल खड़ा करता है. अमेरिका में यह योजना सुरक्षा को लेकर शुरू की गई. हमारे देश में भी यही दलील दी गई, लेकिन विरोध के डर से यह बताया गया कि इससे सामाजिक क्षेत्र में चल रही योजनाओं को लागू करने में सहूलियत होगी. देश में जिस तरह का सड़ा-गला सरकारी तंत्र है, उसमें इस कार्ड से कई और समस्याएं सामने आ जाएंगी. सरकारी योजनाएं राज्यों और केंद्र सरकार के बीच बंटी हैं, ऐसे में केंद्र सरकार को सबसे पहले राज्य सरकारों की राय लेनी चाहिए थी. यह कार्ड राशनकार्ड की तरह तो है नहीं कि कोई भी इसे पढ़ ले. इसके लिए तो हाईटेक मशीन की ज़रूरत पड़ेगी. जिला, तहसील और पंचायत स्तर तक ऐसी मशीनें उपलब्ध करनी होंगी, जिन्हें चलाने के लिए विशेषज्ञ लोगों की ज़रूरत पड़ेगी. अब दूसरा सवाल यह है कि देश के ज़्यादातर इलाक़ों में बिजली की कमी है. हर जगह लोड शेडिंग की समस्या है. बिहार में तो कुछ जगहों को छोड़कर दो-तीन घंटे ही बिजली रहती है. क्या सरकार ने मशीनों, मैन पावर और बिजली का इंतजाम कर लिया है? अगर नहीं तो यह योजना शुरू होने से पहले ही असफल हो जाएगी. अब तो वे संगठन भी हाथ खड़े कर रहे हैं, जो इस कार्ड को बनाने के कार्य में लगे हैं. इंडो ग्लोबल सोशल सर्विस सोसायटी ने कई गड़बड़ियों और सुरक्षा का सवाल उठा दिया है. इस योजना के तहत ऐसे लोग भी पहचान पत्र हासिल कर सकते हैं, जिनका इतिहास दाग़दार रहा है. एक अंग्रेजी अ़खबार ने विकीलीक्स के हवाले से अमेरिका के एक केबल के बारे में ज़िक्र करते हुए यह लिखा कि लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे संगठन के आतंकवादी इस योजना का दुरुपयोग कर सकते हैं.

यूआईडीएआई ने न स़िर्फ प्राइवेसी को ही नज़रअंदाज़ किया है, बल्कि उसने अपने पायलट प्रोजेक्ट के रिजल्ट को भी नज़रअंदाज़ कर दिया है. इतनी बड़ी आबादी के लिए इस तरह का कार्ड बनाना एक सपने जैसा है. अब जबकि दुनिया के किसी भी देश में बायोमेट्रिक्स का ऐसा इस्तेमाल नहीं हुआ है तो इसका मतलब यह है कि हमारे देश में जो भी होगा, वह प्रयोग ही होगा. यूआईडीएआई के पायलट प्रोजेक्ट के बारे में एक रिपोर्ट आई है, जो बताती है कि सरकार इतनी हड़बड़ी में है कि उसने पायलट प्रोजेक्ट के सारे मापदंडों को  दरकिनार कर दिया. मार्च और जून 2010 के बीच 20 हज़ार लोगों के डाटा पर काम हुआ. अथॉरिटी ने बताया कि फाल्स पोजिटिव आईडेंटिफिकेशन रेट 0.0025 फीसदी है. फाल्स पोजिटिव आईडेंटिफिकेशन रेट का मतलब यह है कि इसकी कितनी संभावना है कि यह मशीन एक व्यक्ति की पहचान किसी दूसरे व्यक्ति से करे. मतलब यह कि सही पहचान न बता सके. अथॉरिटी के डाटा के मुताबिक़ तो हर भारतीय नागरिक पर 15,000 फाल्स पोज़िटिव निकलेंगे. समस्या यह है कि इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए बायोमेट्रिक पहचान की किसी ने कोशिश नहीं की. कोरिया के सियोल शहर में टैक्सी ड्राइवरों के लिए ऐसा ही लाइसेंस कार्ड बना, जिसे टोल टैक्स एवं पार्किंग वगैरह में प्रयोग किया गया. एक साल के अंदर ही पता चला कि 5 से 13 फीसदी ड्राइवर इस कार्ड का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. नतीजा यह निकला कि ऐसा सिस्टम लागू करने के कुछ समय बाद हर व्यक्ति को इस परेशानी से गुज़रना पड़ता है और एक ही व्यक्ति को बार-बार कार्ड बनवाने की ज़रूरत पड़ती है. सच्चाई यह है कि इस तरह के कार्ड के लिए हमारे पास न तो फुलप्रूव टेक्नोलॉजी है और न अनुकूल स्थितियां. 24 घंटे बिजली उपलब्ध नहीं है और न इंटरनेट की व्यवस्था है पूरे देश में. ऐसे में अगर इस कार्ड को पढ़ने वाली मशीनों में गड़बड़ियां आएंगी तो वे कैसे व़क्त पर ठीक होंगी.

प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने असलियत बता दी कि भारत के एक तिहाई लोग कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं. पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है.

यह बिल्कुल वैसी ही हालत है कि आप एटीएम जाते हैं और वह कार्ड रिजेक्ट कर देता है, सर्वर डाउन हो या फिर कोई तकनीकी समस्या. सरकार इसे छोटी-मोटी दिक्कत कह सकती है, लेकिन आम आदमी के लिए यह जीवन-मरण का सवाल हो जाता है. इसके अलावा यह सिस्टम लागू होने के बाद छोटा सा भी बदलाव बहुत ज्यादा महंगा होगा. इन सब परिस्थितियों को देखकर तो यही लगता है कि सरकार यह योजना लागू करेगी, कुछ दिन चलाएगी और जब समस्या आने लगेगी, तब इसे बंद कर देगी. ऐसा ही इंग्लैंड में हुआ. वहां इसी तरह की योजना पर क़रीब 250 मिलियन पाउंड खर्च किए गए. आठ साल तक इस पर काम चलता रहा. हाल में ही इसे बंद कर दिया गया. इंग्लैंड की सरकार को जल्द ही इसकी कमियां समझ में आ गईं और उसके 800 मिलियन पाउंड बच गए.

नंदन नीलेकणी को मनमोहन सिंह ने यूनिक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया का चेयरमैन बना दिया. क्यों बनाया, क्या नंदन नीलेकणी किसी उच्च सरकारी पद पर विराजमान थे? नंदन नीलेकणी निजी क्षेत्र के बड़े नाम हैं. क्या सरकार को यह पता नहीं है कि सरकारी कामकाज और निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की मानसिकता और अंदाज़ में अंतर होता है, क्या संसद में इस बारे में चर्चा हुई, यह किसके द्वारा और कैसे तय हुआ कि चेयरमैन बनने के लिए क्या योग्यताएं होनी चाहिए तथा नंदन नीलेकणी को ही मनमोहन सिंह ने क्यों चुना? ऐसे कई सवाल हैं, जिनका जवाब प्रधानमंत्री ने न तो संसद में दिया और न जनता को. अ़फसोस तो इस बात का है कि विपक्ष ने भी इस मुद्दे को नहीं उठाया. क्या हम अमेरिकी सिस्टम को अपनाने लगे हैं? ऐसा तो अमेरिका में होता है कि सरकार के मुख्य पदों के लिए लोगों का चयन राष्ट्रपति अपने मन से करता है. अब तो यह पता लगाना होगा कि हिंदुस्तान में अमेरिकी सिस्टम कब से लागू हो गया. नंदन नीलेकणी ने अपनी ज़िम्मेदारियों से पहले ही हाथ खींच लिए हैं. वह स़िर्फ यूनिक नंबर जारी करने के लिए ज़िम्मेदार हैं, बाकी सारा काम देश के उन अधिकारियों पर छोड़ दिया गया है, जो अब तक राशनकार्ड बनाते आए हैं.

क़रीब सौ साल पहले मोहनदास करमचंद गांधी ने अपना पहला सत्याग्रह दक्षिण अफ्रीका में किया. 22 अगस्त, 1906 को दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने एशियाटिक लॉ एमेंडमेंट आर्डिनेंस लागू किया. इसके तहत ट्रांसवल इलाक़े के सारे भारतीयों को रजिस्ट्रार ऑफिस जाकर अपने फिंगर प्रिंट्स देने थे, जिससे उनका परिचय पत्र बनना था. इस परिचय पत्र को हमेशा साथ रखने की हिदायत दी गई, न रखने पर सज़ा भी तय कर दी गई. गांधी ने इसे काला क़ानून बताया. जोहान्सबर्ग में तीन हज़ार भारतीयों को साथ लेकर उन्होंने मार्च किया. अगर आज गांधी होते तो यूआईडी पर सत्याग्रह ज़रूर करते.

वैसे सच्चाई क्या है, इसके बारे में आधार के चीफ नंदन नीलेकणी ने खुद ही बता दिया. जब वह नेल्सन कंपनी के कंज्यूमर 360 के कार्यक्रम में भाषण दे रहे थे तो उन्होंने बताया कि भारत के एक तिहाई कंज्यूमर बैंकिंग और सामाजिक सेवा की पहुंच से बाहर हैं. ये लोग ग़रीब हैं, इसलिए खुद बाज़ार तक नहीं पहुंच सकते. पहचान नंबर मिलते ही मोबाइल फोन के ज़रिए इन तक पहुंचा जा सकता है. इसी कार्यक्रम के दौरान नेल्सन कंपनी के अध्यक्ष ने कहा कि यूआईडी सिस्टम से कंपनियों को फायदा पहुंचेगा. बड़ी अजीब बात है, प्रधानमंत्री और सरकार की ओर से यह दलील दी जा रही है कि यूआईडी से पीडीएस सिस्टम दुरुस्त होगा, ग़रीबों को फायदा पहुंचेगा, लेकिन नंदन नीलेकणी ने तो असलियत बता दी कि देश का इतना पैसा उद्योगपतियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए खर्च किया जा रहा है. बाज़ार को वैसे ही मुक्त कर दिया गया है. विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में. तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है. बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते. खबर यह भी है कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते हैं. अगर ऐसा होता है तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाएगा. यह देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं है. अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए. देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?

क़रीब एक सौ साल पहले मोहनदास करमचंद गांधी ने अपना पहला सत्याग्रह दक्षिण अफ्रीका में किया. सरकार को शायद याद नहीं है कि गांधी ने यह क्यों किया. 22 अगस्त, 1906 को दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने एशियाटिक लॉ एमेंडमेंट आर्डिनेंस लागू किया. इस क़ानून के तहत ट्रांसवल इलाक़े के सारे भारतीयों को अपनी पहचान साबित करने के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर अपने फिंगर प्रिंट्स देने थे, जिससे हर भारतीय का परिचय पत्र बनना था. इस परिचय पत्र को हमेशा साथ रखने की हिदायत दी गई. न रखने पर सज़ा भी तय कर दी गई. 19वीं शताब्दी तक दुनिया भर की पुलिस चोरों और अपराधियों की पहचान के लिए फिंगर प्रिंट लेती थी. गांधी को लगा कि ऐसा क़ानून बनाकर सरकार ने सारे भारतीयों को अपराधियों की श्रेणी में डाल दिया है. गांधी ने इसे काला क़ानून बताया. जोहान्सबर्ग में तीन हज़ार भारतीयों को साथ लेकर उन्होंने मार्च किया और शपथ ली कि कोई भी भारतीय इस क़ानून को नहीं मानेगा और अपने फिंगर प्रिंट नहीं देगा. यही महात्मा गांधी के पहले सत्याग्रह की कहानी है. अगर आज गांधी होते तो यूआईडी पर सत्याग्रह ज़रूर करते. झूठे वायदे करके, सुनहरे भविष्य का सपना दिखाकर सरकार देश की जनता को बेवक़ू़फ नहीं बना सकती. जनता का विश्वास उठता जा रहा है. सरकार जो वायदे कर रही है, उसके लिए वह ज़िम्मेदारी भी साथ में तय करे और विफल होने के बाद किन लोगों को सज़ा मिले, इसके लिए भी उसे आधिकारिक प्रस्ताव संसद में रखना चाहिए.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎

20 thoughts on “यूआईडीः यह कार्ड खतरनाक है

  • July 18, 2012 at 8:41 AM
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    यू डी आई कार्ड बनाने का केंद्र सरकार का गोरखधंधा ही है हिंदुस्तान की जनता के वितरण को बेहतर बनाने के लिए एक निहायत जरूरी चीज़ है

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  • July 13, 2012 at 7:42 PM
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    ये लेख पूरी जिम्मेदारी से नहीं लिखा गया है और इसका दृष्टिकोण पक्षपात पूर्ण है. पहली बात तोह ये है की UID सिर्फ एक संग्रह है देशवासियों को पहचान करने के लिए. ये कोई ऐसी गुप्त जानकारी नहीं है जिससे देश की सुरक्षा व्यवस्था खतरे में पड़ ही जाएगी.

    और आज के युग में जब पैसे ऑनलाइन डाटा की तरह मानेज किये जा सकते हैं तो ये जानकारी तोह बड़े आराम से secure राखी जा सकती है.

    इसमे जरूर कुछ खामिया हैं पर वो ऐसी कटाई नहीं हैं जिसकी वजह से इसे बंद किया जावे.

    UID से तकलीफ सिर्फ काले धन वालों को ही है. क्युकी इससे हर कोई privileged कंप्यूटर के द्वारा locate हो जायेगा. इससे साड़ी transactions भी ट्रैक हो जाएँगी और धान्दली पकड़ना बच्चो के खेल जैसा हो जायेगा.

    ये एक पेड कंटेंट है. और वाकई शर्मनाक है. UID इस नीडेड इन इंडिया.

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  • May 13, 2012 at 8:58 AM
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    आपकी बताई गई बातो से ये समझ में तो आगया की क्या होना चाहिए और क्या हो गया ……मेरी समझ में एक बात नहीं आई की सर्कार को इतनी हैटेक कार्य को करने की क्या जरूरत पड़ गयी क्या सर्कार ये नहीं जानती की अभी भारत की मुलभुत चीजे तो अपने पास अछे से है ही नहीं और चले है देश को हैटेक बनाने…ये तो वही बात हो गयी की बिच्छी का मंत्र न जाने और सांप के बिल में हाँत डाले …..आखिर उ ई डी की इतनी भी क्या जरूरत पड़ गयी, यहाँ हमारे देश में जो पैसा जरूरी कार्यो को करने के लिए आता है उसको तो लोग अच्छे से कर ही नहीं पाते और चले है आधार देने …इन्हे चाहिए की पहले मूलभूत चीज़े मुहैया कराये, क्योंकि जब आप के पास सब कुछ सही होगा तभी आप हितेक होंगे या इसके बारे में सोचे .

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  • April 21, 2012 at 4:33 PM
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    मै भी इस बात से सहमत हु की फर्जी वोटर कार्ड और फर्जी रतिओं कार्ड के आधार पट बने UID कार्ड की सार्थकता क्या होगी. अभी मेरे एक परिचित को पासपोर्ट अफसर में UID कार्ड को पहचान पत्र के रूप में स्वीकार करने से मन कर दिया.
    वोटर कार्ड की तरह यह भी एक और फालतू कावाद है जब तक बुनियादी प्राथमिकतायें पूरी न हो.

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  • April 14, 2012 at 1:19 PM
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    बेजान और निरर्थक तर्कों से भरे इस लेख के पीछे छिपी प्रेरणा संदेहास्पद है। UID में जिस तरह की जानकारी ली गई है उसतरह की जानकारी हमसे कई जगह – सरकारी और निजी दोनों जगह-ली जाती है। अमेरिका जैसे देश के लिये इसतरह की सूचना जमा करना कठिन नहीं है। लेखक को यह बताना चाहिए कि इन सूचनाओं का अमेरिका क्या करेगा, सिर्फ सहम नहीं जाना चाहिए। बेनामी संपत्ति बनाने वालों की ताकत इस लेख के पीछे दिखाई देती है।

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  • March 12, 2012 at 1:25 PM
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    आपने वाकई सटीक सवाल उठाए हैं, बहुत बहुत साधुवाद

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  • August 24, 2011 at 3:29 AM
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    अरे भाई पता नहीं है तो बकवास मत करो… एक वो विश्वबंधु गुप्ता जी का interview ले लिया…. हिदुस्तान इस वक़्त दुनिया की आईटी पॉवर बनाने जा रहा है वहां ऐसे लेख और interview जो cloud computing को बादल से जोड़ते हो, वो बस लोगों को बेवकूफ बनाने और हडकंप मचा के publicity पाने का जरिया है…

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  • August 23, 2011 at 7:20 PM
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    I do agree with UID Card

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  • August 23, 2011 at 1:23 PM
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    यह लेख दिग्भ्रमक है और लेखक को अनुसन्धान की जरूरत है ….क्या इस देश में ए टी एम मशीन काम नहीं कर रहे हैं? जबकि वो काफी बड़ी तकनीक है | हर आदमी के पास मोबाईल फोने आ गया है…इन्टरनेट है…क्या ये जनता का सशक्तिकरण नहीं है? तकनीक बहुत साडी समस्यनों को सुलझा सकता है और यु आई डी कार्ड संसाधनों के वितरण को बेहतर बनाने के लिए एक निहायत जरूरी चीज़ है…जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं..वो मुख्यतः वर्त्तमान भ्रष्टाचार से लाभान्वित हैं…इसलिए वे भ्रष्टाचार पे लगाम नहीं लगाना चाहते हैं…इसलिए वे ऐसे किसी भी चीज़ का विरोध कर रहे हैं जो पारदर्शिता ला सकती है जय हिंद |

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  • August 19, 2011 at 11:55 PM
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    यू डी आई कार्ड बनाने का केंद्र सरकार का गोरखधंधा ही है जो हिंदुस्तान की जनता के किसी काम का है ही नहीं भारत से ज्यादा विकसित देशो में पहले इसके लिए सर्वे हो चुके है लेकिन इसके फायदे कम नुकसान जादा की तर्ज पर इस योजना को बंद कर दिया गया .मेरे विचार से सरकार क्या सिर्फ आमजनता के पैसे ऐसे फालतू निर्णयों को लागू करके उड़ाना चाहती है की जादा से जादा भ्रस्टाचार उनके मंत्रियों को करने मिले इसको रोकना जरुरी है

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  • August 14, 2011 at 2:40 PM
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    इस पुरी योजना के लिये आप सिर्फ प्रधानमत्री जी को दोष कैसे दे सकते है ? इसमे और भी लोग होंगे जिनका स्वार्थ इस योजना से जुडा हो..?

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  • August 14, 2011 at 9:15 AM
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    डॉ. मनीष जी बिलकुल सही सोच रहे है.
    यह तो सभी जानते है की हमारे देश के नियम नीतिया विदेशों में तै होती है.
    चाइना ने विश्व बाजार पर कब्ज़ा कर अमेरिका को बर्बाद कर दिया है. दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता देश भारत किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को अपने उपभोक्ता के द्वारा उबार सकता है.
    हो सकता है की आने वाले सालो में इस देश की पिन से लेकर, कपडा, रोटी, दावा, दारू, साबुन, तेल, गुड सिक्षा, कापी किताब अमेरिका से ही आयत हो. हो सकता है यह सिर्फ संभावना ही हो किन्तु संका तो है.
    अपनी कीमती जानकारी किसी विदेशी कंपनी को सोपना किसी बड़ी साजिश की और इशारा करती है.
    धन्यवाद मनीष जी.

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  • August 10, 2011 at 7:54 AM
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    प्रधान मंत्री भारत को निजी कोम्पन्न्यियो के हाथो बेच रहे है

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  • August 6, 2011 at 10:46 AM
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    क्‍या भारत सरकार ने इस संबंध में संसद में अधिनियम पारित किया है ?

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  • August 6, 2011 at 6:57 AM
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    Manmohan is a facilitator of scamsters & fraudsters. That he personally does not indulge in corruption is immaterial since he learnt a lesson long ago that his foray into politics gained momentum through his quality of ‘strategic silence’ and as a corporate scam facilitator. As long as he runs along this narrow niche without opening his mouth too wide, he believes he is safe.

    Another factor is that he doesn’t feel he is accountable to the public of Indiabecause he has not bene elelcted by people of India.. A key pointer to this is the number of press conference he has held in his 7 years of holding the job. Maybe 1 or 2 at max.

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  • August 6, 2011 at 6:56 AM
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    how the traitor manmoahn singh bribed the MPs to get votes for nuclear deal with help of american and indian industrailists’s money. amar singh was jsut a middle man. this mannoahns ingh was alos involved in bribign the ps in narsingha rao misntry in 1993 when they were in minority.

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  • August 5, 2011 at 5:47 PM
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    क्या देश के भोले प्रधानमंत्री ने देश को बर्बाद करने का ठेका ले रखा है? उनका हर कदम देश को नई मुसीबत में डाल देता है.किसी भी विषय में गंभीरता से विशेषज्ञों की मदद से अध्ययन कराकर उचित निर्णय क्यों नहीं लिए जाते?भगवन इन नादानों को सद्बुद्धि दो.

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  • August 5, 2011 at 3:57 PM
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    एक एक शब्‍द सच बोल रहा है ।

    विदेशी कंपनियां भारत आ रही हैं, वह भी खुदरा बाज़ार में. तो क्या यह कोई साज़िश है, जिसमें सरकार के पैसे से विदेशी कंपनियों को ग़रीब उपभोक्ताओं तक पहुंचने का रास्ता दिखाया जा रहा है. बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां और निजी कंपनियां यूआईडीएआई के डाटाबेस के ज़रिए वहां पहुंच जाएंगी, जहां पहुंचने के लिए उन्हें अरबों रुपये खर्च करने पड़ते. खबर यह भी है कि कुछ ऑनलाइन सर्विस प्रोवाइडर इस योजना के साथ जुड़ना चाहते हैं. अगर ऐसा होता है तो देश का हर नागरिक निजी कंपनियों के मार्केटिंग कैंपेन का हिस्सा बन जाएगा. यह देश की जनता के साथ किसी धोखे से कम नहीं है. अगर देशी और विदेशी कंपनियां यहां के बाज़ार तक पहुंचना चाहती हैं तो उन्हें इसका खर्च खुद वहन करना चाहिए. देश की जनता के पैसों से निजी कंपनियों के लिए रास्ता बनाने का औचित्य क्या है, सरकार क्यों पूरे देश को एक दुकान में तब्दील करने पर आमादा है?

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  • August 5, 2011 at 1:34 PM
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    जनाब हर जानकारी बेंची जा रही है. फोन नम्बर बेंचे जा रहे हैं, स्कूलों के बच्चों की जानकारियाँ बेंची जा रही हैं, और अब नंदन निलेकनी जी विशेष पहचान नंबर (UID) के नाम पर हमारी आँखों की पुतली का फोटो ले रहे हैं, दसों उंगलिओं के निशान ले रहे हैं. इनका उपयोग या तो हम पर नज़र रखने के लिए किया जाएगा या बाज़ार की कंपनियों को व्यापार के लिए बेचा जाएगा या फिर इन जैविक जानकारियों का उपयोग कई प्रयोगों के लिए होगा…जनाब विशेष पहचान नंबर (UID) एक जंजीर है.

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  • August 5, 2011 at 1:15 PM
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    आपने लिखा है की
    “क़रीब एक सौ साल पहले मोहनदास करमचंद गांधी ने अपना पहला सत्याग्रह दक्षिण अफ्रीका में किया. सरकार को शायद याद नहीं है कि गांधी ने यह क्यों किया. 22 अगस्त, 1906 को दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने एशियाटिक लॉ एमेंडमेंट आर्डिनेंस लागू किया. इस क़ानून के तहत ट्रांसवल इलाक़े के सारे भारतीयों को अपनी पहचान साबित करने के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस में जाकर अपने फिंगर प्रिंट्स देने थे, जिससे हर भारतीय का परिचय पत्र बनना था. इस परिचय पत्र को हमेशा साथ रखने की हिदायत दी गई. न रखने पर सज़ा भी तय कर दी गई. 19वीं शताब्दी तक दुनिया भर की पुलिस चोरों और अपराधियों की पहचान के लिए फिंगर प्रिंट लेती थी. गांधी को लगा कि ऐसा क़ानून बनाकर सरकार ने सारे भारतीयों को अपराधियों की श्रेणी में डाल दिया है. गांधी ने इसे काला क़ानून बताया. जोहान्सबर्ग में तीन हज़ार भारतीयों को साथ लेकर उन्होंने मार्च किया और शपथ ली कि कोई भी भारतीय इस क़ानून को नहीं मानेगा और अपने फिंगर प्रिंट नहीं देगा.”
    आपका यह अंतिम वक्तव्य आपके द्वारा दिए गए सभी तर्कों पर भारी पड़ रहा है.मैं एक प्रश्न पूछता हूँ की अगर यह पहचान पत्र सम्पूर्ण दक्षिण अफ़रीका के लिए बिना भेदभाव के होता तो भी गांधी का रवैया वही होता क्या?क्या गांधी उसके विरुद्ध सत्याग्रह करते?फिर भी मैं आपके एक बात से अवश्य सहमत हूँ की जब अभी तक भारत में पूर्ण रूप से साधारण वोटर्स पहचान पत्र नहीं बन सका है तो ऐसा हाई टेक अभियान की सफलता की आशा कैसे की जा सकती हाई?

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