अन्ना, अनशन और अवाम

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के मंडी हाउस स्थित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) के समीप अचानक एक ऑटो रिक्शा वहां खड़े कुछ लोगों के पास आकर रुका. ऑटो चालक ने उनसे पूछा, क्या रामलीला मैदान जाएंगे? वहां मौजूद लोगों ने आश्चर्य भरे लहज़े में कहा, हां जाना तो है, लेकिन कितने पैसे लोगे? इस पर ऑटो चालक बोला, साहब, कमाना-खाना तो रोज है, लेकिन अन्ना जी की मुहिम में हमारा भी कुछ योगदान होना चाहिए. यह सुनते ही चार-पांच लोग मुस्कराते हुए उसके ऑटो में जा बैठे. ऑटो रिक्शा वाला हो, कैब वाला हो या निजी कार मालिक, सभी अन्ना के आंदोलन में लोगों की मदद करते नज़र आ रहे थे. इसके पीछे उनका स़िर्फ यही मक़सद था कि अधिक से अधिक लोग रामलीला मैदान में एकत्र हों, ताकि सरकार पर दबाव बन सके. अमूमन चालान और ट्रैफिक पुलिस से खौफ़ खाने वाले मोटरसाइकिल सवार और ऑटो चालक अन्ना के आंदोलन के दौरान पूरी तरह बेफिक्र नज़र आए. दिल्ली की सड़कों पर अगर आप बिना हेलमेट के बाइक चला रहे हों तो पुलिस की निगाह से बच नहीं सकते, लेकिन अन्ना के आंदोलन में युवाओं ने हेलमेट की अनिवार्यता को भी नज़रअंदाज़ कर दिया.हालांकि क़ानून और सुरक्षा के मद्देनज़र यह ग़लत था, लेकिन दिल्ली पुलिस भी सब कुछ जानते-समझते हुए अन्ना के समर्थकों की इस हरकत को नज़रअंदाज़ कर रही थी. यही वजह थी कि रैली में शामिल नौजवान पुलिस को देखकर नारा लगाते थे, यह अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है. यह सुनकर दिल्ली पुलिस के जवान भी अपनी मुस्कराहट रोक नहीं पाते थे.

जन लोकपाल विधेयक पर यूपीए सरकार से निर्णायक लड़ाई लड़ने वाले अन्ना हज़ारे और उनकी टीम को जैसा अपार समर्थन मिला, उसे देखकर राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक भी हैरत में थे. उनका कहना था कि अन्ना को मिले इस जन समर्थन के लिए कहीं न कहीं मौजूदा सरकार ही ज़िम्मेदार है, क्योंकि यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जनता जिस क़दर महंगाई और भ्रष्टाचार का शिकार हुई है, उसे देखते हुए उसकी नाराज़गी स्वाभाविक है.

अन्ना हजारे को युवाओं, किसानों, मज़दूरों, महिलाओं, बूढ़ों और बच्चों यानी हर वर्ग का ज़बरदस्त समर्थन मिला. स्कूल-कॉलेज, खेत-खलिहान और दफ्तर को छोड़कर ये सभी लोग बदलाव का एक सपना लिए ऐतिहासिक रामलीला मैदान पहुंचे. लोगों ने नए-नए नारों, रोचक तस्वीर एवं संदेश वाले बैनरों, टी-शट्‌र्स और टोपियों के साथ भागीदारी करके आंदोलन में जोश भर दिया. ढोल-नगाड़ों के साथ देश भक्ति के गीत गाकर उन्होंने बताया कि ज़रूरत पड़ने पर वे देश के लिए क्या कुछ कर सकते हैं. अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने आए लोगों में एक बड़ी संख्या उन युवाओं की थी, जिन्हें अभी तक केवल फेसबुक एवं टि्‌वटर के शौक़, ब्रांडेड कपड़े ख़रीदने, महंगे रेस्तरां में खाने, मौजमस्ती करने और अक्सर बड़ों की डांट-फटकार सुनने के लिए जाना जाता था. उसी युवा पीढ़ी ने अन्ना के आंदोलन में अपनी भागीदारी के ज़रिए यह संदेश दिया कि बेशक, उसके जीने का अंदाज़ अलग है, बावजूद इसके उसे इस बात का एहसास है कि देश का भविष्य उसके कंधों पर टिका हुआ है. यह अलग बात है कि आंदोलन में उनकी हिस्सेदारी के तौर-तरीक़े अन्य लोगों से भिन्न रहे. मसलन वे अपने दोस्तों को इस आंदोलन से जुड़ने की गुज़ारिश फेसबुक और एसएमएस से करते थे. विरोध प्रदर्शन में जहां वे जमकर नारे लगा रहे थे, वहीं अपने स्मार्ट फोन की मदद से प्रदर्शन की लाइव तस्वीरें अपलोड कर रहे थे. इस दौरान थकान और प्यास लगने पर वे कोल्ड ड्रिंक्स से अपनी प्यास भी बुझाते थे और फिर वापस उसी जोश-ओ-ख़रोश के साथ नारे बुलंद करने लगते थे. चौथी दुनिया ने जब रामलीला मैदान में देश के दूरदराज़ के इलाक़ों से आए लोगों से इस आंदोलन में शामिल होने की वजह पूछी तो इस बारे में सबकी राय अलग-अलग थी. बिहार के पूर्वी चंपारण ज़िला अंतर्गत चकिया तहसील के मूल निवासी और दिल्ली में सॉफ्टवेयर इंजीनियर धीरज गौतम ने बताया कि मैंने न तो 1947 की आज़ादी की लड़ाई देखी और न 1975 का जेपी आंदोलन, लेकिन इतना ज़रूर है कि जन लोकपाल विधेयक की ख़ातिर अन्ना हज़ारे का संघर्ष देखकर मैं कह सकता हूं कि उस जमाने में हुए आंदोलन की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही रही होगी. धीरज ने कहा कि भ्रष्टाचार भारत की प्रगति के लिए एक बहुत बड़ी बाधा है. बिहार से ही केसरिया ब्लॉक के ढेकहां गांव से आए एमबीए के छात्र सुधांशु कुमार ने अपनी बात एक शेर से शुरू की, अगर सच कहना बग़ावत है तो समझो हम भी बाग़ी हैं. उन्होंने कहा कि अन्ना का आंदोलन यूपीए सरकार के लिए एक चेतावनी है, जिसने देश की जनता को महंगाई और भ्रष्टाचार के दलदल में ढकेल दिया है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर ज़िले के निवासी कंप्यूटर इंजीनियर आनंद मूर्ति श्रीवास्तव ने कहा, मैंने पिछले चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया था, लेकिन कांग्रेस राज में देश जिस कदर चौतरफ़ा समस्याओं से घिर गया है, उससे मुझे काफी निराशा हुई. लिहाज़ा यहां अन्ना के पक्ष में नारे लगाकर मैं प्रायश्चित कर रहा हूं. दिल्ली में एक होटल कंपनी से जुड़े अभिषेक कुमार ने कहा कि आंदोलन का असर काफी व्यापक है. संयोग से कैलेंडर भी अन्ना के समर्थकों का साथ दे रहा है, क्योंकि बीच-बीच में छुट्टियां होने की वजह से यहां आना हमारे लिए आसान हो गया.

अन्ना के आंदोलन में विविध आयाम देखने को मिले. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जनमानस को खड़ा करने के अलावा इस आंदोलन ने यह भी बताया कि अगर कोई चरित्रवान व्यक्ति देशहित में किसी मुहिम की अगुवाई करे तो उसके साथ हर पीढ़ी के लोग न केवल जुड़ सकते हैं, बल्कि अनुशासित भी रह सकते हैं.

जिन लोगों ने 1990 में पूरे उत्तर भारत में फैले आरक्षण विरोधी आंदोलन को देखा है, उन्हें पता है कि उस समय गुस्से से भरे नौजवानों ने राष्ट्रीय और निजी संपत्ति को कितना नुक़सान पहुंचाया था. आंदोलनकारी युवाओं की एक ही कोशिश होती थी कि कब मौक़ा मिले और कब वे अपना क्रोध सरकारी संपत्ति पर निकालें. यह सच है कि उस आंदोलन का एक सर्वमान्य नेतृत्व नहीं था. ध्यान देने योग्य बात यह है कि नब्बे के दशक में आंदोलनरत पीढ़ी उदारवाद के दौर की पीढ़ी नहीं थी. उनमें से ज़्यादातर का जन्म साठ के दशक के अंत और सत्तर के दशक की शुरुआत में हुआ था. अन्ना हजारे के आंदोलन में हर उम्र के लोगों ने भाग लिया. जनता ने इसके ज़रिए भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर सरकार के ख़िला़फ अपनी भड़ास निकाली. अन्ना को जेल भेजने के बाद राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश में जोरदार आंदोलन हुआ. रामलीला मैदान आने वालों में किसानों की तादाद देखने लायक़ थी. एक ऐसे ही किसान थे महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले में रहने वाले सतीश राउत. सतीश ने कहा कि देश के किसानों को अन्ना के आंदोलन से काफी उम्मीदें हैं. पंचायत, तहसील और ज़िलाधिकारी कार्यालय में भी भ्रष्टाचार व्याप्त है. किसान क्रेडिट कार्ड बनवाना हो या खेती के लिए कर्ज़ लेना हो, बग़ैर रिश्वत दिए कोई काम नहीं होता. सतीश का कहना था कि यूपीए सरकार बिना शर्त अन्ना की मांग पूरी करे, वरना उसे इसकी एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी. हरियाणा के गुड़गांव ज़िले से आए किसानों ने कहा कि सरकारी दफ्तरों में फैले भ्रष्टाचार की वजह से किसान तंगहाली के दौर में पहुंच चुके हैं. किसान तेज सिंह एवं रोहताश सिंह ने बताया कि पटवारी से लेकर तहसीलदार तक बग़ैर पैसा लिए कोई काम नहीं करते. ऐसे में हम लोग अन्ना हज़ारे के रूप में एक दूसरा गांधी देख रहे हैं. जयपुर से आए बुज़ुर्ग सुमन कुमार गुप्ता ने कहा कि वह जन लोकपाल और अन्ना हजारे का समर्थन करने दिल्ली आए हैं, लेकिन जन लोकपाल विधेयक तब तक कारगर साबित नहीं होगा, जब तक देश की युवा पीढ़ी इसके प्रति जागरूक नहीं होगी. हमें आज़ादी भी काफी क़ुर्बानियों के बाद मिली थी, लेकिन हमारी उदासीनता और आत्मकेंद्रित सोच की वजह से आज़ादी के 64 सालों बाद अन्ना हज़ारे जैसे वृद्ध आदमी को स्वाधीनता की दूसरी लड़ाई लड़नी पड़ रही है. पंजाब के होशियारपुर ज़िले के धूतकलां गांव निवासी और पेशे से ट्रक ड्राइवर अनिल कमल सिंह ने कहा कि तारीख़ गवाह है कि अधिकार कभी भी थाली में सजाकर नहीं मिला है. मुग़लों के जमाने से लेकर अंग्रेजों तक देश के लोगों को अपने हक़ों के लिए हुक्मरानों से लोहा लेना पड़ा. लिहाज़ा, जन लोकपाल आने से ही देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा. होशियारपुर ज़िले के ही एक किसान अजैब सिंह ने कहा कि यूपीए सरकार में किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं. सरकार किसानों की क़ीमत पर पूंजीपतियों का भला करने में लगी है. ऐसे में अन्ना हज़ारे देश की जनता के बीच एक फरिश्ता बनकर सामने आए हैं. राजधानी दिल्ली के सरोजनी नगर निवासी सब्जी विक्रेता महेंद्र प्रसाद अपना धंधा छोड़कर रामलीला मैदान में डटे हुए थे. उन्होंने कहा कि भूखे पेट सोना मंजूर है, लेकिन अन्ना के इस आंदोलन में वह अंतिम क्षणों तक साथ रहेंगे. वह सड़क किनारे सब्जी बेचते हैं, लेकिन पुलिस और एनडीएमसी वाले उनसे अवैध वसूली करते हैं, मना करने पर धंधा तबाह करने की धमकी देते हैं. केरल से आईं पप्पनी अय्यर ने कहा कि अन्ना जो लड़ाई लड़ रहे हैं, उससे देशवासियों का काफी भला होगा और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा. जन लोकपाल विधेयक पर यूपीए सरकार से निर्णायक लड़ाई लड़ने वाले अन्ना हज़ारे और उनकी टीम को जैसा अपार समर्थन मिला, उसे देखकर राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक भी हैरत में थे. उनका कहना था कि अन्ना को मिले इस जन समर्थन के लिए कहीं न कहीं मौजूदा सरकार ही ज़िम्मेदार है, क्योंकि यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जनता जिस क़दर महंगाई और भ्रष्टाचार का शिकार हुई है, उसे देखते हुए उसकी नाराज़गी स्वाभाविक है.

अजब गज़ब नारे

दुनिया भर के आंदोलनों पर नज़र डालें तो हर जगह आंदोलनकारियों ने सरकार के ख़िला़फ गीतों, दोहों और नारों का जमकर इस्तेमाल किया. भारत में 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान राष्ट्रकवि दिनकर रचित सिंहासन खाली करो कि जनता आती है… काफी लोकप्रिय हुआ था. उसी तरह 37 वर्षों के बाद एक मज़बूत क़ानून जन लोकपाल की ख़ातिर आंदोलन कर रहे अन्ना हज़ारे के समर्थन में भी राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश भर में अन्ना के पक्ष में और सरकार के ख़िला़फ कई तरह के नारे सुनने को मिले. अन्ना को तिहाड़ जेल भेजने पर एक नारा चहुंओर लगा,  वाह रे कांग्रेस तेरा खेल, कसाब को बिरयानी, अन्ना को जेल. सबसे लोकप्रिय नारे थे-मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना और सोनिया जिसकी मम्मी है, वह सरकार निकम्मी है. इसी तरह अन्ना के हैं चार सिपाही, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और भरी है अन्ना ने हुंकार, जेल जाएंगे गद्दार जैसे नारों से समूचा रामलीला मैदान गूंज रहा था. कुछ ने तो अपने कपड़ों, कलाइयों एवं बैनरों पर नारे लिख रखे थे. अन्ना की तस्वीर के साथ नारे लिखी टी-शर्ट की मांग भी काफी बढ़ गई थी. अमूमन 15 अगस्त और 26 जनवरी को लहराने वाला तिरंगा अन्ना के आंदोलन के दौरान पूरे देश में बराबर लहराता रहा. राहुल गांधी को देश का युवा चेहरा कहने वाली कांग्रेस से भी आंदोलन में शामिल लोग नारे के ज़रिए पूछ रहे थे, सारा यूथ यहां है, राहुल गांधी कहां है. आंदोलनकारियों के निशाने पर कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी और दिग्विजय सिंह भी थे.

अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

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अभिषेक रंजन सिंह

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की. जर्नलिज्म में करियर की शुरूआत इन्होंने सकाल मीडिया समूह से किया. उसके बाद लगभग एक साल एक कारोबारी पत्रिका में बतौर संवाददाता रहे. वर्ष 2009 में दिल्ली से प्रकाशित एक दैनिक अखबार में काम करने के बाद यूएनआई टीवी में असिसटेंट प्रोड्यूसर के पद पर रहे. इसके अलावा ऑल इंडिया रेडियो मे भी कुछ दिनों वार्ताकार रहे। आप हिंदी में कविताएं लिखने के अलावा गजलों के शौकीन हैं. इन दिनों चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार में वरिष्ठ संवाददाता है।

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