बिहारः बाढ़ का क़हर, पीडि़त भगवान भरोसे

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लगातार बारिश और नेपाल द्वारा पानी छोड़े जाने के कारण उत्तर बिहार के लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं. शहरी इलाक़ों में बाढ़ की स्थिति भयावह नहीं दिख रही है, लेकिन मधुबनी, समस्तीपुर, खगड़िया, बेगूसराय, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, अररिया, भागलपुर, कटिहार, मुंगेर एवं पूर्णियां सहित कई ज़िले बाढ़ की चपेट में हैं. प्रभावित लोग तटबंधों और अन्य ऊंची जगहों पर शरण ले रहे हैं. राज्य सरकार द्वारा समुचित राहत की कोई व्यवस्था नहीं है. शासन-प्रशासन की बेरुखी के कारण दर्जनों गांव के लोगों के समक्ष रोटी की समस्या उत्पन्न हो गई है. भूखे बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है. लोग मवेशियों के लिए चारा जुटाने के लिए कोई भी जोख़िम उठाने से नहीं हिचक रहे हैं. बावजूद इसके प्रशासन कई ज़िलों में बाढ़ की स्थिति सामान्य बता रहा है.

अररिया, भागलपुर एवं मुंगेर सहित कई अन्य जगहों पर भी बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है. बावजूद इसके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना कि स्थिति सामान्य है, निश्चित रूप से जले पर नमक छिड़कने के समान है. शासन-प्रशासन की इस बेरुखी के परिणामस्वरूप अगर बाढ़ प्रभावित लोग उग्र रूप धारण करने को मजबूर हो जाएं तो सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ राज्य के मुखिया को भी आश्चर्य में नहीं पड़ना चाहिए.

प्रभावित ज़िलों में भी कई स्थानों पर राहत सामग्री नहीं पहुंच सकी है, जिससे लोगों की परेशानी बढ़ गई है. स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका इस बार संदेह के घेरे में है, क्योंकि कुछ जगहों पर उन्होंने राहत शिविर का बैनर तो लगा दिया है, लेकिन राहत के नाम पर खानापूर्ति की जा रही है. मुट्ठी भर राहत देकर स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रशासन ने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रभावित इलाक़ों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद बाढ़ की स्थिति सामान्य बताते हुए कहा कि वहां राहत सामग्री के वितरण के साथ-साथ आवागमन के लिए पर्याप्त नौकाएं उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया है. इस आदेश का अधिकारियों पर कितना असर हुआ और यह कितना कारगर होगा, यह तो व़क्त बताएगा, लेकिन जब चौथी दुनिया द्वारा प्रभावित इलाक़ों का जायज़ा लिया गया तो प्रमाणित हो गया कि लोग शासन-प्रशासन से अधिक भगवान पर भरोसा करने को मजबूर हैं. ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार द्वारा बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में पर्याप्त नौकाएं उपलब्ध कराने का दावा तो किया गया, लेकिन हक़ीक़त कुछ और है. नौकाएं न होने के कारण लोग जान जोख़िम में डालकर यहां-वहां आने-जाने के लिए मजबूर हैं. अब तक दो दर्जन से अधिक लोग इस चक्कर में डूबकर अपनी जान गंवा चुके हैं. कई इलाक़ों में नावों की व्यवस्था तो की गई है, लेकिन वे इतनी जर्जर हैं कि लोग उन पर सवारी करने से बच रहे हैं. कोसी, बागमती, काली कोसी एवं करेह सहित कई नदियों के जलस्तर में अत्यधिक वृद्वि न होने से कुछ इलाक़े पूर्ण रूप से और कुछ आंशिक रूप से प्रभावित हुए हैं,  लेकिन गंगा एवं बूढ़ी गंडक की उफनती धार ने कई नए इलाक़ों में कोहराम मचा दिया है. बाढ़ आने के पूर्व एकत्र किए गए खाद्यान्न से ही कई परिवार किसी तरह अपनी भूख मिटा रहे हैं. अब जबकि खाद्यान्न लगभग ख़त्म होने को है, इसलिए बाढ़ का जायज़ा लेने पहुंच रहे प्रशासनिक अधिकारियों को प्रभावित लोगों द्वारा खदेड़ा जा रहा है. बेगूसराय ज़िले में गंगा नदी में आई भयंकर बाढ़ के कारण मटिहानी, बलिया, शाम्हो एवं सनहा सहित कई अन्य इलाक़ों के लोग तबाही झेलने को मजबूर हैं. सनहा गोरगामा बांध के कई हिस्सों में दरार पड़ने के कारण कई इलाक़ों में दहशत का माहौल है. गंगा की दहाड़ से सहमे लोगों के साथ-साथ प्रशासन द्वारा लगातार स्थिति पर नज़र रखी जा रही है. दियारा इलाक़े में रहने वाले लोगों के लिए जान बचाना मुश्किल होता जा रहा है. कई ऐसे प्रभावित गांव हैं, जहां अभी तक राहत वितरण की बात तो दूर, प्रशासनिक अधिकारी जायज़ा लेने भी नहीं पहुंचे हैं. समस्तीपुर ज़िले के मोहिउद्दीनगर एवं मोहनपुर सहित पटोरी प्रखंड की कई पंचायतों में सैलाब ने लोगों की ज़िंदगी पटरी से उतार दी है. घरेलू सामान और मवेशियों के साथ इलाक़े से पलायन कर चुके लोग सिर छिपाने के लिए इधर-इधर भटक रहे हैं. खगड़िया ज़िले के 59 गांवों में बाढ़ का कहर जारी है. गोगरी अनुमंडल के बाढ़ प्रभावित लोगों में प्रशासन के प्रति खासी नाराज़गी देखी जा रही है. राहत से वंचित लोगों का कहना है कि राहत वितरण के नाम पर जमकर धांधली बरती जा रही है. अभी तक नाव की व्यवस्था नहीं की गई है. कटघरा निवासी विनोद राय, सुमन राय, गौतम राय एवं बिनोद महतो और भूड़िया गांव निवासी अवधेश यादव एवं सूखो यादव आदि ने बताया कि सरकारी स्तर से नाव उपलब्ध न कराए जाने के कारण लोगों को निजी नावों पर सवारी करनी पड़ रही है. अधिक कमाई की चाहत में नाविकों द्वारा क्षमता से अधिक लोगों को नाव पर लादने के कारण हर समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. खगड़िया प्रखंड के रहीमपुर नया टोला, नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड नंबर 24 एवं 26 सहित अन्य इलाक़ों में भी कमोबेश यही स्थिति देखने को मिल रही है. नाव न होने के कारण लोग नाद (मवेशियों का भोजन पात्र) या अन्य साधनों का सहारा लेकर आ-जा रहे हैं. खगड़िया से होकर गुजरने वाले एनएच- 31 एवं रेलवे ब्रिज के पास बूढ़ी गंडक ख़तरे के निशान से ऊपर बह रही है. नतीजतन राष्ट्रीय राजमार्ग-31 पर भी ख़तरा मंडराने लगा है. यह अलग बात है कि कार्यपालक अभियंता का कहना है कि एनएच-31 से पानी पांच फीट नीचे है. कोसी नदी भी बलतारा, बसुआ और कुरसैला में खतरे के निशान से ऊपर बह रही है. गोगरी-नगरपाड़ा तटबंध एवं बदला-नगरपाड़ा तटबंध के कई हिस्सों पर बूढ़ी गंडक नदी का दबाव बना हुआ है, जबकि नारायणपुर लिंक बांध पर भी ख़तरा उत्पन्न हो गया है. गोगरी के साथ-साथ परबत्ता प्रखंड में गंगा एवं बूढ़ी गंडक ने जनजीवन प्रभावित कर दिया है. बन्नी, बौरना एवं गोगरी पंचायत सहित कई अन्य इलाक़ों में बाढ़ की स्थिति भयावह बनी हुई है. मधुआ गांव के पास बूढ़ी गंडक नदी का पानी बाएं तटबंध को भेद चुका है. परबत्ता प्रखंड के सौढ़ उत्तरी एवं सलारपुर पंचायत के लोगों का जीना मुहाल हो गया है. सुपौल, मधेपुरा एवं कटिहार में भी बाढ़ का कहर जारी है. मधेपुरा ज़िले के पास एनएच-107 पर बना बलुआहा डायवर्सन ध्वस्त हो जाने के कारण तीन ज़िलों का पटना मुख्यालय से सड़क संपर्क भंग हो गया है. खगड़िया-बेलदौर के बीच बना डुमरी पुल पहले ही ध्वस्त होने के कारण मधेपुरा, सहरसा एवं सुपौल के लोगों को पूर्णियां होकर पटना पहुंचना पड़ता था. मधेपुरा ज़िले के चौसा प्रखंड की आधा दर्जन पंचायतें पूरी तरह बाढ़ की चपेट में हैं. सुपौल ज़िले की कई पंचायतों में बाढ़ का पानी कहर बरपा रहा है. यहां के लोगों के लिए राहत की बात यह है कि अमहा के समीप नहर टूट जाने से पानी कम होने लगा है. बिहार-बंगाल सीमा के समीप बहने वाली नागर नदी के जलस्तर में वृद्वि होने के कारण कटिहार ज़िले के बारसोई एवं विघोर के कई गांव जलमग्न हो गए हैं. नजराबाड़ी, पीरासन एवं डेंगरापाड़ा में बाढ़ की स्थिति गंभीर बनी हुई है, जबकि कई गांवों पर ख़तरा मंडरा रहा है. अररिया, भागलपुर एवं मुंगेर सहित कई अन्य जगहों पर भी बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है. बावजूद इसके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह कहना कि स्थिति सामान्य है, निश्चित रूप से जले पर नमक छिड़कने के समान है. शासन-प्रशासन की इस बेरुखी के परिणामस्वरूप अगर बाढ़ प्रभावित लोग उग्र रूप धारण करने को मजबूर हो जाएं तो सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ राज्य के मुखिया को भी आश्चर्य में नहीं पड़ना चाहिए.

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