प्रत्येक काम की मर्यादा

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समान वित्त-वितरण की योजना में क्या कमी है? इस योजना पर जब विचार किया जाता है, तो जो आपत्तियां बताई जाती हैं या ध्यान में आती हैं, वे इसी कोटि में हैं कि यह चीज नई है, हम और आप इसके अभ्यस्त नहीं है. इसीलिए यह चलेगा कैसे? क्या होगा? इस भय से संत्रस्त हैं. अब जो मुख्य प्रश्न या आपत्ति बाक़ी रह जाती है, वह यह है कि अगर किसी को अधिक श्रम करने का या कठिन मेहनत करने का कुछ पुरस्कार विशेष न मिले तो वह क्यों परिश्रम करेगा? किसी काम के लिए उसे प्रलोभन कौन सा है? इसका एक उत्तर तो यह है कि राष्ट्रीय काम में किसी को भी दूसरों से ज़्यादा श्रम या कठिन मेहनत करने की आवश्यकता नहीं है. कौन कहता है कि आप देश के लिए दूसरों से ज़्यादा श्रम कीजिए? उल्टा यही वांछनीय है कि देश के वित्त के साथ-साथ राष्ट्र का काम भी उसी तरह समान रूप से वितरित हो. कई लोग ऐसे होते हैं, जिनको तब तक शांति या सुख नहीं मिलता, जब तक कि वे बहुत काम में व्यस्त न हों और ज़्यादा से ज़्यादा श्रम या कठिन से कठिन मेहनत न करें. ऐसे व्यक्तियों के लिए यही जवाब है कि आप अपने मन की तुष्टि के लिए ज़्यादा श्रम करते हैं, इसका भार समाज पर क्यों लादते हैं? स्वान्त: सुखाय, आप जो काम करें, उसके लिए यह बहाना बनाने की ज़रूरत ही क्या है कि हम राष्ट्र के लिए दूसरों से ज़्यादा काम कर रहे हैं?

कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो काम करना बिल्कुल पसंद नहीं करते, आलस्य में ही रहना चाहते हैं. इन्हें उक्त सामाजिक आदर्श के अनुसार अपराधी क़रार कर दिया जाना चाहिए. जिस तरह राष्ट्र की कोई भी चीज, सार्वजनिक काम में आने वाली कोई भी वस्तु, यदि कोई आदमी चुरा ले तो चोरी के अपराध में वह सज़ा पाने योग्य है, उसी तरह कामचोर या अपने हिस्से का काम न करने वाला आदमी भी अपराधी है और उसे दंडित होना ही चाहिए. कुछ व्यक्ति यह कहेंगे कि हम तो काम कम ही करेंगे, भले हम ग़रीब बने रहें, हमसे ज़्यादा काम न होगा. हम अपनी दरिद्रता में ही सुखी हैं, आप क्यों हमें फिजूल परेशान करते हैं. राष्ट्र का कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से ग़रीब नहीं रह सकता.

जो लोकप्रिय धंधे हैं, उनको करने के लिए 8 घंटे रोज़ाना की ड्यूटी सप्ताह में 6 दिन की रहनी चाहिए और ज़्यादा परिश्रम के काम या निम्न कोटि के कामों के लिए अपेक्षाकृत कम घंटों की ड्यूटी और ज़्यादा छुट्टियां हों तो अपने आप सब काम लोकप्रिय बन जाएंगे. धन का विशेष आकर्षण है सापेक्षिक. अगर आपके पड़ोसी के पास या दूसरे जान-पहचान वाले के पास अथवा दुश्मन के पास लाखों रुपये हैं और आपके पास नहीं हैं तो स्वाभाविक रूप से आपकी तमन्ना होगी कि आपके पास भी लाखों रुपये हों.

पूंजीवादियों द्वारा जबरन लादी गई दरिद्रता या स्वेच्छा से स्वीकार की हुई दरिद्रता, दोनों समान ही घृणित और अनापेक्षित हैं. राष्ट्र के किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वे चाहें तो भी मैले-कुचैले गली-मोहल्ले में ही रहें. हमें समृद्धि नहीं चाहिए, ऐसा कहने वालों को क़ानूनन बाध्य किया जाए, ताकि वे राष्ट्र के पुनर्निर्माण में अपने हिस्से का काम करें, हाथ बटाएं.

वर्तमान युग में व्यक्ति अपनी इच्छा से कम या ज़्यादा काम कर भी तो नहीं सकता. उसमें भी कई कठिनाइयां हैं. उद्योग में, फैक्ट्री-कारखानों में, सब जगह सामूहिक कार्य होते हैं. अगर फैक्ट्री में काम करने का समय 8 घंटे निर्धारित है तो कोई मज़दूर चाहकर भी 10 घंटे काम नहीं कर सकता. कारण, मशीन चलाने के लिए साथी श्रमिकों की ज़रूरत है. काम के अनेक प्रकार इस तरह से एक-दूसरे पर आधारित हैं कि एक, दो या पांच मज़दूर चाहें तो भी अपने नियत समय से ज़्यादा काम कर नहीं सकते. सारा राष्ट्र ज़्यादा काम करने के लिए यदि कटिबद्ध हो जाए तो उसका नतीजा ही दूसरा होगा. दुनिया में ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जहां सारा का सारा राष्ट्र 12-12 या 16-16 घंटे प्रतिदिन काम करने को उद्यत हो गया और फलस्वरूप बड़े जटिल संघर्षों का सूत्रपात हुआ. ख़ैर, कहना यही है कि देश के हर व्यक्ति को अपने-अपने हिस्से का ही काम करना है. अब आप कहेंगे कि जब सब बराबर हैं, तब कौन सा काम कौन करे, इसका निर्णय कैसे होगा? हल्के, हल्के निम्न कोटि के या गंदे काम करने को कोई तैयार ही न होगा. सब लोग साफ-सुथरा, इज़्ज़तदार या प्रतिष्ठा का काम ही करना चाहेंगे. जहां तक काम का सवाल है, कोई भी काम हल्का या गंदा नहीं है. काम हल्का या गंदा हम अपनी भावनाओं से बना लेते हैं.

उदाहरणस्वरूप डॉक्टर या सर्जन चीरफाड़, ऑपरेशन करते हैं, मरने के बाद लाशों को भी चीरफाड़ करके देखते हैं, मृत शरीर के हर एक अवयव का परीक्षण करते हैं. बहुत से डॉक्टर मल-मूत्र-रक्त इत्यादि सब चीजों का सूक्ष्म यंत्रों द्वारा गहन परीक्षण करते हैं. सैकड़ों आदमियों के मल-मूत्र दिन भर में वे अपनी आंखों से कुछ ही इंच दूर रखकर देखते हैं. फिर भी कोई यह नहीं कहता कि डॉक्टर-सर्जन निम्न कोटि का काम करता है. इसी तरह आप नर्सों को ले लीजिए. रोगी की परिचर्या में वे टट्टी-पेशाब सब साफ करती हैं, कपड़े बदलती हैं, रोगी को नहलाती-धुलाती हैं, साफ-सफाई करती हैं, फिर भी उनका पेशा ऑफिस में काम करती किसी टाइपिस्ट से या सेक्रेटरी से कम इज़्ज़त का या हैसियत का नहीं है. मल-मूत्र सफाई का काम, पाखाने साफ करने का काम शताब्दियों से भंगी या मेहतर करते आए हैं, इसलिए इस काम को हल्का या नीचा काम मान लिया गया है. ये लोग काफी दरिद्र या गंदे रहते हैं, इसलिए इस काम को इन लोगों से संबंधित और हेय मान लिया जाता है. बच्चों का पाखाना साफ करने का काम घर में माता-बहिन वग़ैरह करती हैं, तब कोई इस काम को गंदा या घृणित नहीं मानता. इस काम को करने में कोई आपत्ति भी नहीं करता. स़िर्फ लोगों की मान्यता जो हो गई है कि यह काम निम्न कोटि का है, यही भावना बाधक है. आप अपने घर में झाड़ू-बुहारी देने में या बाथरूम साफ करने में खास एतराज नहीं करेंगे, पर वही काम करते हुए मेहतर लोग जिस तरह झाड़ू-टोकरी लेकर सड़कों पर घूमते नज़र आते हैं, उस तरह से झाड़ू टोकरी उठाना आपको निश्चय ही बहुत बुरा लगेगा. इसके सिवाय ये सब काम जिन्हें निम्न कोटि का समझा जाता है, वे आधुनिक यांत्रिक युग में बिल्कुल मिटाए भी जा सकते हैं. शहरों में जहां-जहां स्वचालित फ्लश सिस्टम के पाखाने बने हुए हैं, मैला साफ करने के लिए कोई भंगी-मेहतर या आदमी की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. इसी तरह और भी अनेक काम जिनको आज का मानव हल्का या घृणित मानता है, उन्हें मिटाने के आविष्कार मानव बुद्धि द्वारा संपादित हो ही रहे हैं और होंगे ही. मोटर गाड़ी को चलाने के लिए आज समाज का बहुत बड़ा आदमी या करोड़पति का लड़का भी कोई आपत्ति नहीं करता, बल्कि शौक से चलाता है. पर उसे कहा जाए कि मोटर ड्राइवर की वर्दी या टोपी पहन कर मोटर चलाए तो वह कतई पसंद नहीं करेगा. तात्पर्य यही हुआ कि काम कोई हेय या बुरा नहीं है, पर वर्षों से जो आदमी उसको करते हैं, उन्हें समाज में निम्न कोटि का या हेय मान लिया गया है. अतएव कोई दूसरा व्यक्ति उसी काम को उसी रूप या परिस्थिति में करने में हिचकता है. अगर सबको समान रूप से ही वित्त मिलता है, कुछ भी ऊहापोह नहीं है तो स्वाभाविक ही है कि हर आदमी ऑफिस में क्लर्क-बाबू या इसी तरह का अन्य काम करना पसंद करेगा. पुस्तकालय में पुस्तकाध्यक्ष या स्कूल में अध्यापक बनना पसंद करेगा. कोई भी गटर साफ करने वाला या झाड़ू-बुहारी देने का काम करने वाला नहीं बनना चाहेगा. इसी तरह स्त्रियां भी ऑफिस में सेक्रेटरी या टाइपिस्ट या सिनेमा-अभिनेत्री ही बनना पसंद करेंगी, कोई भी स्त्री रसोई बनाने वाली नौकरी या आंगन साफ करने का काम करना नहीं चाहेगी. उन्हें क्या प्रलोभन है, जो वे इन कामों को करें? प्रश्न ज़रूर गंभीर है. रुपये के अलावा दूसरी चीज जो आदमी को बहुत ज़्यादा पसंद है, वह है अवकाश या फुरसत. अगर ऑफिस में या पुस्तकालय में कलम-काग़ज़ का काम करने वाले कारकुन को रोज़ाना 8 घंटे काम करना पड़े और सप्ताह में 1 दिन रविवार को छुट्टी मिले और झाड़ू-बुहारी देने वाले व्यक्ति को मान लें, स़िर्फ 2 घंटे ही काम करने को कहा जाए और हफ्ते में स़िर्फ 4 दिन की उसकी ड्यूटी हो तो आप निश्चित जानिए, लोग कारकुन न होकर साफ-सफाई करने वाला बनना ज़्यादा पसंद करेंगे.

जब वित्त वितरण समान है या आमदनी में कोई फर्क़ ही नहीं है तो दूसरा सबसे ज़्यादा प्रलोभन मानव को अवकाश का है. मान लीजिए, आप ऑफिस में काम करते हैं, 8 घंटे की आपकी ड्यूटी है. बाक़ी 16 घंटे में 8 घंटे आप सोएंगे या आराम करेंगे और 4 घंटे नहाने-धोने खाने-पीने इत्यादि में लग जाएंगे. आपके पास स़िर्फ 4 घंटे का अवकाश ही दैनिक शेष रहेगा, जिसमें आप अपने शौक पूरे करना चाहेंगे या मौज करना पसंद करेंगे. आप वह समय घर पर स्त्री-बच्चों के साथ खेल-कूद, आमोद-प्रमोद में बिताने का विचार करते होंगे, जबकि आपकी पत्नी, जिन्हें ज़्यादा अवकाश प्राप्त है, चाहेंगी कि आप उस अवकाश के समय को उनके साथ बाहर घूमने-फिरने, नाटक-सिनेमा इत्यादि मनोरंजन करने में बिताएं. आपके पास रविवार या सार्वजनिक छुट्टी ही इस काम के लिए अवशेष है. अगर कहीं आपको दिन में 2 या 4 घंटे ही काम करना पड़े तो बाक़ी समय अपने शौक पूरे करने लिए आपको सुलभ रहेगा.

कहीं ज़्यादा शारीरिक परिश्रम करने वाला लोहार भारी घण या हथौड़ा चलाता है, तप्त भट्टी के सामने मेहनत करता है. बोझा ढोने वाला कुली भारी बोझ लेकर मीलों चलता है. और कहीं बिजली के पंखे के नीचे बाबू या अफसर लोग कागजी कार्यवाही ही करते रहते हैं. निश्चय ही कामों के प्रकारों में भारी अंतर रहेगा. सब लोग आरामदेह, लोकप्रिय काम करना चाहेंगे और ज़्यादा श्रम वाला काम शायद कोई न चाहे, जब वित्त वितरण समान रूपेण है. आमदनी हर पेशे में लगभग एक सी है तो हर व्यक्ति लोकप्रिय काम ही करना क्यों न पसंद करे? जैसा कि मैंने ऊपर बताया, काम करने के टाइम में बेसी-कमी करके तज्जनित कमियों को दूर करना होगा.

जो लोकप्रिय धंधे हैं, उनको करने के लिए 8 घंटे रोजाना की ड्यूटी सप्ताह में 6 दिन की रहनी चाहिए और ज़्यादा परिश्रम के काम या निम्न कोटि के कामों के लिए अपेक्षाकृत कम घंटों की ड्यूटी और ज़्यादा छुट्टियां हों तो अपने आप सब काम लोकप्रिय बन जाएंगे. धन का विशेष आकर्षण है सापेक्षिक. अगर आपके पड़ोसी के पास या दूसरे जान-पहचान वाले के पास अथवा दुश्मन के पास लाखों रुपये हैं और आपके पास नहीं हैं तो स्वाभाविक रूप से आपकी तमन्ना होगी कि आपके पास भी लाखों रुपये हों. पर मान लीजिए, यह समान वित्त वितरण की योजना कार्यान्वित हो गई तो फिर धन संग्रह का कोई आकर्षण नहीं रह जाएगा. उस हालत में रुपयों से ज़्यादा आकर्षण अवकाश का या काम न करना पड़े, इसकी स्वतंत्रता का ही रह जाएगा. मानव स्वभाव से ही स्वच्छंदता प्रेमी है, किसी ज़िम्मेदारी से बंधना उसे कम ही बर्दाश्त होता है. इसलिए जो मेहनत के काम हैं या जो हल्के किस्म के काम हैं, उन्हें करने वालों को ज़्यादा से ज़्यादा स्वतंत्रता रहेगी.

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

महावीर प्रसाद आर मोरारका

महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.

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