दिल्‍ली का बाबूः कैसे घटेगा सरकारी खर्च

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वित्त मंत्री प्रणब दा इन दिनों खासे परेशान हैं. उनकी परेशानी की वजह विपक्षी दल नहीं, बल्कि बढ़ रहा सरकारी खर्च है. उन्होंने केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों के लिए एक सर्कुलर भी जारी किया है, जिसमें फिजूलखर्ची पर ध्यान देने की हिदायत दी गई है. वर्ष 2008-09 की वार्षिक खर्च समीक्षा की तुलना में मौजूदा चालू वित्तीय वर्ष ज़्यादा खर्चीला साबित हो रहा है, लेकिन यह अब तक साफ नहीं हुआ है कि इस संदर्भ में मंत्रालयों एवं मंत्रियों की कार्यशैली और कार्यक्षमता की समीक्षा होगी या नहीं. सूत्रों के मुताबिक, सरकार को यह पता चल गया है कि विभिन्न मंत्रालयों के प्रदर्शन की समीक्षा करना एक बेहद खर्चीला काम है. इसके लिए होने वाली बैठकों और टास्क फोर्स बनाने में लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं. सरकार ने इस काम के लिए कैबिनेट सचिवालय के भीतर ही एक विभाग बनाया है, जो मंत्रालयों की समीक्षा करने का काम करता है. अब इस बात पर निगाहें टिकी हैं कि क्या वित्तीय घाटे से उबरने के लिए प्रणब मुखर्जी द्वारा किए जा रहे उपायों का प्रभाव विभिन्न विभागों पर पड़ता है या नहीं.

बाबुओं में काम करने की चाहत

महाराष्ट्र में बाबुओं के ढेर सारे पद रिक्त हैं, लेकिन सरकार इन पदों को भरने के मामले में कछुआ चाल चल रही है. सूत्रों की मानें तो सरकारी महकमों की हालत ऐसी हो गई है कि बाबुओं को नए काम के लिए औसतन एक से तीन महीनों का इंतज़ार करना पड़ता है. 1976 बैच के आईएएस अधिकारी एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव जे एस साहनी को भी एक महीने से नए काम का इंतज़ार है. उसी तरह 1993 बैच के आईएएस अधिकारी एवं पुणे नगर निगम के पूर्व आयुक्त महेश जागड़े अपने वर्तमान पद से सात जून को हटने के बाद से अभी तक नया कम मिलने का इंतजार कर रहे हैं. वहीं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव राधेश्याम मोपालवर को भी इसी साल जून महीने से अपनी अगली नियुक्ति का इंतज़ार है. ऐसे में महाराष्ट्र सरकार की लापरवाही का अंदाज़ा सहज लगाया जा सकता है, जबकि वह खुद स्वीकार कर चुकी है कि राज्य में 50 वरिष्ठ पद खाली पड़े हैं.

दूषित ट्रैक रिकॉर्ड

भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे देशव्यापी जनांदोलन के बीच प्रधानमंत्री कार्यालय ने संसद में एक बड़ा खुलासा किया है और यह खुलासा भी भ्रष्टाचार से ही जुड़ा है. पीएमओ ने बताया कि वर्ष 2008 से अब तक केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने रिश्वत लेने के आरोप में केंद्र सरकार के 955 बाबुओं को गिरफ्तार किया है. दिलचस्प बात यह है कि भ्रष्टाचार के मामले में रेल विभाग पहले पायदान पर है, जिसके 156 बाबू सीबीआई के शिकंजे में फंसे. इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, राजस्व एवं सीमा शुल्क और केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभागों के अधिकारी भी शामिल हैं. हालांक़ि बाबूशाही पर नज़र रखने वालों का अभी भी मानना है कि यह आंकड़ा अधूरा है, क्योंकि कई ऐसे भ्रष्ट विभाग और अधिकारी हैं, जिन्हें सीबीआई ने क्लीन चिट दे दी है. इन आंकड़ों में दर्ज सारे मामले ऐसे हैं, जिनकी जांच सीबीआई ने की है और कई लोगों का मानना है कि जब सीबीआई खुद निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से जांच नहीं कर पाती है तो ऐसे में इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर कितना भरोसा किया जा सकता है.

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