आईडीबीआई बैंक लिमिटेडः वित्तीय समावेशन की अनोखी पहल

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पिछले दशक के दौरान भारत ने दुनिया में तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में ख़ुद को स्थापित किया है. ऐसे ही समय में वहां उच्च विकास दर की स्थिरता के बारे में एक नई बहस की शुरुआत भी हुई है. इस बहस में अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई के बारे में एक रिपोर्ट भी जारी की गई है. दरअसल, विकास के मामले में भारत नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है. देश हर क्षेत्र में आशातीत लक्ष्य हासिल कर रहा है. वित्तीय क्षेत्र में तो भारत दुनिया के तमाम विकसित देशों के मुक़ाबले बेहतर स्थिति में है. हालांकि विकास की यह गुणवत्ता सही मायनों में अगर समावेशी नहीं है तो विकास की गति में स्थायित्व संभव नहीं है. नीति के  नज़रिए से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है. सरकार ने सतत विकास के साथ-साथ सतत विकास दर हासिल करने के लिए इस पर ध्यान केंद्रित करते हुए विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत की है. हाल के वर्षों में सरकार ने वित्तीय समावेशन की एक ऐसी पहल की है, जिसके तहत जनता को बैंकिंग सुविधा का लाभ मिल सके. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग क्षेत्रों का विस्तार बड़े पैमाने पर किया गया है, जिससे ग्रामीण आबादी सीधे तौर पर बैंकिंग से जुड़ सके. इस संदर्भ में वित्तीय समावेशन समान विकास को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक शर्त बन गया है.

महाराष्ट्र के ही सतारा ज़िले के कई गांवों में ग्रामीणों के बीच स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के प्रति जागरूकता कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसके तहत लोगों को नए स्वयं सहायता समूह खोलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. इन गांवों में स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया. प्रशिक्षण कार्यशाला में ग्रामीणों में बचत की भावना विकसित करने, जन भागीदारी से विकास कार्य कराने, स्वरोज़गार की स्थापना, बैंक से ऋण लेने की प्रक्रिया और उत्थान संबंधी कई अत्याधुनिक तरीक़े सुझाए गए.

आईडीबीआई बैंक इस सार्थक पहल में अपनी भागीदारी निभा रहा है. मौजूदा समय में बैंक ने वित्तीय वर्ष 2011 के माध्यम से अपनी वित्तीय समावेशन योजना का शुभारंभ किया है. इस योजना के तहत बैंक ने 2000 की आबादी वाले 119 गांवों का चयन किया है और वहां वित्तीय वर्ष 2012 योजना के मुताबिक़ पहुंच बनाई जा रही है. इसी तरह 2000 से लेकर 5000 की आबादी वाले गांवों में आईडीबीआई बैंक अपनी स्वर्णिम योजना वित्तीय वर्ष 2013 के तहत वित्तीय समावेशन शुरू करेगा. इस पूरी प्रक्रिया में बैंक द्वारा सूचना और संचार प्रौद्योगिकी की आधुनिक तकनीक पर आधारित स्मार्ट कार्ड का उपयोग करके वित्तीय समावेशन के कार्य किए जा रहे हैं. आईडीबीआई बैंक प्रबंधन की मानें तो इस योजना को गांवों में चरणबद्ध तरीक़े से लागू किया जा रहा है. आईडीबीआई बैंक प्रबंधन के मुताबिक़, अन्य विनिर्देशी कार्यक्रमों के लिए भी एक बॉयोमीट्रिक स्मार्ट कार्ड प्रदान किया जा रहा है. इन कार्यक्रमों के लागू होने के बाद देश के गांव भी सीधे तौर पर अत्याधुनिक बैंकिंग सेवाओं से जुड़ सकेंगे. इन गांवों के बैंकिंग ग्राहकों को काफी फ़ायदा मिलेगा. एक लिहाज़ से देखें तो यह उनके लिए एक मंच जैसा ही होगा.

आईडीबीआई बैंक ने मुंबई के 46 ग़ैर बैंकिंग गांवों में ग़रीबों के लिए वित्तीय समावेशन कार्यक्रम के तहत अपने बैंकिंग कार्यान्वयन की औपचारिक शुरुआत की. इन गांवों में संबंधित लाभकारी कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है. इन योजनाओं की डीएमडी और प्रवर्तन निदेशालय द्वारा भी समीक्षा की गई. प्रारंभिक चरण में जमा, नगदी और बैंकिंग सेवाओं के बारे में पूछताछ की जा रही है. अगले वित्तीय वर्ष में बैंक के माध्यम से ऋण, बीमा मूल्य का भुगतान, सूक्ष्म बीमा एवं प्रीमियम जैसे अन्य बैंकिंग कार्यक्रमों के ज़रिए ग्राहकों को सेवा प्रदान करके उन्हें जोड़ने की पेशकश की गई है. हालांकि इस वित्तीय पहल के लिए साक्षरता और जागरूकता का प्रयास किया जाना बेहद ज़रूरी है. महाराष्ट्र के जलगांव ज़िले के 137 गांवों में नाबार्ड की मदद से जगह-जगह पर नुक्कड़ नाटकों का मंचन करके ग्रामीणों को वित्तीय लेनदेन और बैंकिंग प्रणाली के बारे में जागरूक किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि ग्रामीण विकास में नाबार्ड लगातार अहम किरदार निभा रहा है, क्योंकि गांवों के विकास में उसकी योजनाएं महत्वपूर्ण भूमिका रखती हैं. ग्रामीण विकास, किसानों का उत्थान, कृषि उत्पादन में वृद्धि और महिला सशक्तिकरण सहित तमाम उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इस संस्था का उदय हुआ. यह आज देश की अस्सी प्रतिशत ग्रामीण जनता को लाभ पहुंचा रही है. इस मुहिम में आईडीबीआई बैंक ने भी अहम भूमिका निभाई है.

महाराष्ट्र के ही सतारा ज़िले के कई गांवों में ग्रामीणों के बीच स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के प्रति जागरूकता कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसके तहत लोगों को नए स्वयं सहायता समूह खोलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. इन गांवों में स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया. प्रशिक्षण कार्यशाला में ग्रामीणों में बचत की भावना विकसित करने, जन भागीदारी से विकास कार्य कराने, स्वरोज़गार की स्थापना, बैंक से ऋण लेने की प्रक्रिया और उत्थान संबंधी कई अत्याधुनिक तरीक़े सुझाए गए. स्वयं सहायता समूह को पंजीकृत संस्थान के रूप में परिवर्तित करने के प्रयास किए जा रहे हैं. ऐसा करने के बाद समूह अपने सदस्यों के अलावा अन्य लोगों को भी ऋण मुहैय्या करा सकेगा, इससे समूह को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलेगा. अन्य लोग भी समूह की बचत राशि से ऋण लेकर अपना कारोबार शुरू कर सकेंगे. आईडीबीआई बैंक प्रबंधन की मानें तो ग्रामीण क्षेत्रों के नवयुवक स्वयं सहायता समूह बनाकर स्वरोज़गार करने की ठान लें तो उनके लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं है, बस उन्हें शुरुआती मार्गदर्शन एवं सहयोग की ज़रूरत है. ग़ौरतलब है कि स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना की शुरुआत ग्रामीण विकास मंत्रालय के माध्यम से ग़रीबों को स्वरोज़गार उपलब्ध कराने के लिए की गई थी. इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले ग़रीबों को स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से या व्यक्तिगत रूप से रोज़गार शुरू करने के लिए सरकार द्वारा मदद की  जाती है. प्रत्येक स्वयं सहायता समूह में 10 से 20 सदस्य शामिल हो सकते हैं. प्रत्येक स्वयं सहायता समूह को अपने ब्लॉक में 4-5 महत्वपूर्ण गतिविधियों का चयन करना होता है. इन चुनी गई गतिविधियों से समूह को कम से कम 2000 रुपये मासिक आय अवश्य होनी चाहिए.

इन गतिविधियों के चयन में बैंक के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मदद ली जा सकती है. स्वयं सहायता समूहों को अनुदान दिया जाता है और तकनीकी प्रशिक्षण और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. साथ ही विपणन (मार्केटिंग) संबंधी प्रशिक्षण भी दिया जाता है. उन्हें एनजीओ, समुदाय आधारित संगठनों, बैंकों, पंचायती राज संस्थाओं एवं ज़िला ग्रामीण विकास संस्थाओं से संबंधित ग़रीबी उन्मूलन के मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए सक्षम बनाया जाता है. आईडीबीआई बैंक बैंकिंग सुविधाओं से वंचित गांवों और शहरी ग़रीबों के लिए निर्माण, निवेश एवं बचत जैसे कार्यक्रमों के अवसर प्रदान कर रहा है, ताकि आने वाले दिनों में गांवों और शहरों के बीच दूरियां कम हो सकें.

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