आस्था है तो सब कुछ है

काका साहेब दीक्षित के भ्राताश्री भाई जी नागपुर में रहते थे. जब वह 1906 में हिमालय गए थे, तब उनका गंगोत्री घाटी के नीचे हरिद्वार के समीप उत्तर काशी में सोमदेव स्वामी से परिचय हो गया. दोनों ने एक दूसरे के पते लिख लिए. पांच वर्ष पश्चात सोमदेव स्वामी नागपुर आए और भाई जी के यहां ठहरे. वहां श्री साई बाबा की कीर्ति सुनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उनके दर्शन करने की तीव्र उत्कंठा हुई. मनमाड और कोपरगांव निकल जाने पर वह एक तांगे में बैठकर शिरडी को चल पड़े. शिरडी के समीप पहुंचने पर उन्होंने दूर से ही मस्जिद पर दो ध्वज लहराते देखे. सामान्यत: देखने में आता है कि भिन्न-भिन्न संतों का बर्ताव, रहन-सहन और बाहृ सामग्रियों में प्राय: भिन्नता पाई जाती है, परंतु केवल इन वस्तुओं से ही संतों की योग्यता का आकलन कर लेना बड़ी भूल है. सोमदेव स्वामी कुछ भिन्न प्रकृति के थे.

वह स्वयं बाबा की परीक्षा करने का निश्चय करके अपने कुछ मित्रों सहित बंबई से शिरडी आए. उन्होंने सिर पर एक जरी की पगड़ी और पैरों में नए सैंडिल पहन रखे थे. उन्होंने बाबा को दूर से ही देखकर उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम तो करना चाहा, परंतु उनके नए सैंडिल इस कार्य में बाधक बन गए. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए? तब उन्होंने अपने सैंडिल मंडप के एक सुरक्षित कोने में रखे और मस्जिद में जाकर बाबा के दर्शन किए.

उन्होंने जैसे ही ध्वजों को लहराते देखा तो वह सोचने लगे कि बाबा संत होकर इन ध्वजों में इतनी दिलचस्पी क्यों रखते हैं, क्या इससे उनका संतपन प्रकट होता है? ऐसा प्रतीत होता है कि यह संत अपनी कीर्ति का इच्छुक है. अतएव उन्होंने शिरडी जाने का विचार त्याग कर सहयात्रियों से कहा कि मैं तो वापस लौटना चाहता हूं. तब वे लोग कहने लगे कि फिर व्यर्थ ही इतनी दूर क्यों आए? अभी केवल ध्वजों को देखकर तुम इतने उदिग्न हो उठे हो तो जब शिरडी में रथ, पालकी, घोड़ा और अन्य सामग्रियां देखोगे, तब तुम्हारी क्या दशा होगी? स्वामी को अब और भी अधिक घबराहट होने लगी और उन्होंने कहा, मैंने अनेक साधु-संतों के दर्शन किए हैं, परंतु यह संत कोई बिरला ही है, जो इस प्रकार ऐश्वर्य की वस्तुएं संग्रह कर रहा है. ऐसे साधु का दर्शन न करना ही उत्तम है, ऐसा कहकर वह वापस लौटने लगे.

तीर्थयात्रियों ने प्रतिरोध करते हुए उन्हें आगे बढ़ने की सलाह दी और समझाया कि तुम यह संकुचित मनोवृत्ति छोड़ दो. मस्जिद में जो साधु है, वह इन ध्वजाओं और अन्य सामग्रियों या अपनी कीर्ति का स्वप्न में भी सोच-विचार नहीं करते. यह सब तो उनके भक्तगण प्रेम और भक्ति के कारण ही उन्हें भेंट करते हैं. अंत में वह शिरडी जाकर बाबा के दर्शन करने को तैयार हो गए. मस्जिद के मंडप में पहुंच कर तो वह द्रवित हो गए. उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी और कंठ रुंध गया. उनके सारे दूषित विचार हवा हो गए और उन्हें अपने गुरु के शब्दों की स्मृति हो आई कि मन जहां अति प्रसन्न और आकर्षित हो जाए, उसी स्थान को ही अपना विश्राम धाम समझना. वह बाबा की चरण रज में लौटना चाहते थे, परंतु वह उनके समीप गए तो बाबा एकदम क्रोधित होकर जोर-जोर से चिल्ला कर कहने लगे कि हमारा सामान हमारे साथ रहने दो, तुम अपने घर वापस लौट जाओ. ख़बरदार, यदि फिर कभी मस्जिद की सीढ़ी चढ़े तो! ऐसे संत का दर्शन क्यों करना चाहि, जो मस्जिद पर ध्वजाएं लगाकर रखे, क्या यह संतपन के लक्षण हैं? एक क्षण भी यहां न रुको. अब उन्हें अनुभव हो गया कि बाबा ने उसके हृदय की बात जान ली और वह कितने सर्वज्ञ हैं. उन्हें अपनी योग्यता पर हंसी आने लगी और यह भी पता चल गया कि बाबा कितने निर्विकार और पवित्र हैं. उन्होंने देखा कि वह किसी को हृदय से लगाते और किसी को हाथ से स्पर्श करते हैं तथा किसी को सांत्वना देकर प्रेमदृष्टि से निहारते हैं. किसी को उदी प्रसाद देकर सभी प्रकार से सुख और संतोष पहुंचा रहे हैं तो फिर मेरे साथ ऐसा रूखा बर्ताव क्यों? अधिक विचार करने पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इसका कारण उनके आंतरिक विचार ही थे और इससे शिक्षा ग्रहण कर उन्हें अपना आचरण सुधारना चाहिए. बाबा का क्रोध तो उनके लिए वरदान स्वरूप है. अब यह कहना व्यर्थ ही होगा कि वह बाबा की शरण में आ गए और उनके परम भक्त बन गए.

इसी तरह बंबई के हरि कानोबा नामक एक महानुभाव ने अपने कई मित्रों और संबंधियों से साई बाबा की अनेक लीलाएं सुनी थीं, परंतु उन्हें विश्वास ही नहीं होता था, क्योंकि वह संशयालु प्रकृति के व्यक्ति थे. अविश्वास उनके हृदय पटल पर अपना आसन जमाए हुए था. वह स्वयं बाबा की परीक्षा करने का निश्चय करके अपने कुछ मित्रों सहित बंबई से शिरडी आए. उन्होंने सिर पर एक जरी की पगड़ी और पैरों में नए सैंडिल पहन रखे थे. उन्होंने बाबा को दूर से ही देखकर उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम तो करना चाहा, परंतु उनके नए सैंडिल इस कार्य में बाधक बन गए. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए? तब उन्होंने अपने सैंडिल मंडप के एक सुरक्षित कोने में रखे और मस्जिद में जाकर बाबा के दर्शन किए. उनका ध्यान सैंडिलों पर ही लगा रहा. उन्होंने बड़ी नम्रतापूर्वक बाबा को प्रणाम किया और उनसे प्रसाद एवं उदी प्राप्त कर लौट आए. पर जब उन्होंने कोने में दृष्टि डाली तो देखा कि सैंडिल तो ग़ायब हो चुके हैं. पर्याप्त छानबीन भी व्यर्थ गई और अंत में निराश होकर वह अपने स्थान पर वापस आ गए. स्नान, पूजन और नैवेद्य आदि अर्पित करके वह भोजन करने को बैठे, परंतु वह पूरे समय तक उन सैंडिलों के चिंतन में ही मग्न रहे. भोजन के बाद मुंह-हाथ धोकर जब वह बाहर आए तो उन्होंने एक मराठा बालक को अपनी ओर आते देखा, जिसके हाथ में डंडे के कोने पर नए सैंडिलों का एक जोड़ा लटका हुआ था. उस बालक ने हाथ धोने के लिए बाहर आने वाले लोगों से कहा, बाबा ने मुझे यह डंडा हाथ में देकर रास्तों में घूम-घूमकर हरि का बेटा, जरी का फेंटा की पुकार लगाने को कहा है और जो कोई कहे कि सैंडिल हमारे हैं, उससे पहले यह पूछना कि क्या उसका नाम हरि और उसके पिता का नाम क (अर्थात कानोबा) है. साथ ही यह भी देखना कि वह जरीदार साफा बांधे हुए है या नहीं, तब इन्हें उसे दे देना. बालक का कथन सुनकर हरि कानोबा को बेहद आनंद एवं आश्चर्य हुआ. उन्होंने आगे बढ़कर बालक से कहा कि ये हमारे ही सैंडिल हैं, मेरा ही नाम हरि और मैं ही कानोबा का पुत्र हूं. यह मेरा जरी का साफा देखो. बालक संतुष्ट हो गया और सैंडिल उन्हें दे दिए. उन्होंने भी सोचा कि मेरी जरीदार पगड़ी तो सबको ही दिख रही थी. हो सकता है कि बाबा की भी दृष्टि में आ गई हो, परंतु शिरडी यात्रा का यह मेरा प्रथम अवसर है, फिर बाबा को यह कैसे विदित हो गया कि मेरा नाम हरि है और मेरे पिता का नाम कानोबा. वह तो केवल बाबा के परीक्षार्थ वहां आए थे. उन्हें इस घटना से बाबा की महानता विदित हो गई. उनकी इच्छा पूर्ण हो गई और वह सहर्ष घर लौट गए.

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