खनिज संसाधनों के मामले में देश के सबसे धनी सूबे झारखंड में शायद ही ऐसी कोई योजना है, जो समय पर पूरी हुई हो. एक वर्ष के भीतर पूरी हो जाने वाली योजनाएं 3 से लेकर 5 साल तक खिंच जाती हैं. योजना के लिए प्राक्कलित राशि भी दोगुनी से तीन गुनी हो जाती है. राजनीतिक अस्थिरता, सुस्त एवं भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी, असामाजिक तत्वों का हस्तक्षेप और शासन में इच्छाशक्ति का अभाव जैसे कारण इस समस्या के मूल में हैं. झारखंड की जनता का यह दुर्भाग्य है कि यहां राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा संचालित अधिकांश विकास योजनाएं अधर में लटक जाती हैं. हम बात कर रहे हैं रेलवे की. राज्य में रेलवे के विकास से जुड़ी कई छोटी-बड़ी योजनाएं पैसेंजर की तरह मंद रफ़्तार से चलने के कारण सफलता के स्टेशन तक नहीं पहुंच सकी हैं.
रेलवे राष्ट्रीय स्तर का महकमा है और विकास का एक अहम मापदंड भी, मगर झारखंड में इसके विकास के पहिए की गति बहुत धीमी है. यहां वर्ष 2002 में इसकी आठ परियोजनाएं शुरू की गई थीं. उनके लिए प्राक्कलित राशि उस समय 1997 करोड़ रुपये थी. कई कारणों से लगभग सारी योजनाएं आज भी लटकी हुई हैं. सूबे में इन आठ नई रेल परियोजनाओं के अतिरिक्त एक अमान (गेज) परिवर्तन, दस दोहरी लाइनें (डबलिंग) और विद्युतीकरण आदि कार्यों पर पिछले तीन वर्षों के दौरान 1055.86 करोड़ रुपये ख़र्च किए जा चुके हैं, परंतु अमान परिवर्तन को छोड़कर सारी की सारी परियोजनाएं-योजनाएं अभी तक अधूरी पड़ी हैं. समस्या यह भी है कि इनके पूरा होने का समय भी निश्चित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि व़क्त-बेव़क्त इनकी लागत में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं. ऐसा मूल्य सूचकांक और निर्माण के स्टैंडर्ड में बदलाव के कारण भी होता रहता है. सरकार संवेदक की विफलता और क़ानून व्यवस्था की समस्या आगे रखकर परियोजनाओं के पूरा होने में देरी के मुद्दे को सफाई से टाल जाती है.
विकास की संवाहक इन परियोजनाओं के लटकने के कई कारण हैं, इनमें जहां-तहां वन भूमि के संदर्भ में क्लियरेंस न मिलना और रैयती ज़मीन के विवाद आदि प्रमुख रूप से शामिल हैं. बार-बार इन्हीं बहानों को सरकार द्वारा उलट-पलट कर दोहराया जाता है. बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसा संभव नहीं है कि रेल जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं की जब शुरुआत हो तो कम से कम वन भूमि संबंधी फैसले तुरंत कर लिए जाएं. इससे फायदा यह होगा कि परियोजनाएं लटकेंगी तो नहीं. यह सर्वविदित है कि स्वर्ण रेखा जैसी अत्यंत महंगी, आवश्यक और उपयोगी परियोजना में तक़रीबन तीस वर्षों के लंबे अंतराल के बावजूद अभी तक केवल फुटकर काम हो सका है. इसका कारण यह बताया जाता है कि उसमें वन भूमि संबंधित क्लियरेंस का मामला फंसा है. इन अधूरी परियोजनाओं एवं कार्यों के बीच विभिन्न स्थानों को मिलाकर कुल 113 किलोमीटर रेल लाइन पर अमान परिवर्तन का कार्य किसी प्रकार संपन्न हो जाना एक सुखद संकेत है. रेलवे के विकास से किसी भी राज्य को काफी लाभ हुआ करता है. ख़ासकर, झारखंड के पहाड़ों और जंगलों से आच्छादित पठारी भू-भाग में तो रेलें सामान ढुलाई से लेकर लोगों के आवागमन का सर्वोत्तम ज़रिया हैं. ग्रैंड कार्डलाइन को छोड़ दें तो सीआईसी सेक्शन प्राय: परेशानी में ही रहता है, वहीं राज्य में आधे से अधिक इलाक़े रेल लाइन से अछूते हैं. जिन आठ परियोजनाओं पर काम होना है, अगर वे पूरी हो गईं तो कई ज़िलों की न केवल आपसी दूरियां घट जाएंगी, बल्कि आवागमन भी सरल हो जाएगा. यह तो अब केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर निर्भर करता है कि वे इसके लिए कितने प्रभावी क़दम उठाती हैं.
नक्सलियों की दखलंदाज़ी
प्रदेश के लिए नासूर बन चुका नक्सलवाद रेल परियोजनाओं के पूरा होने में सबसे बड़ी बाधा साबित हो रहा है. नक्सलवादी इन परियोजनाओं के कार्य में खलल डालते हैं, लेवी लेने के लिए अक्सर कामगारों की पिटाई करते हैं, जिससे सारा कामकाज ठप्प हो जाता है. अभी हाल में नक्सलियों ने कोडरमा-हजारीबाग-रांची रेल परियोजना के एक मुंशी की हत्या कर दी. नक्सलियों के फरमानों की अनदेखी करने वाले ठेकेदारों एवं कामगारों पर जब-तब हमले होते रहते हैं. उल्लेखनीय है कि 31 दिसंबर, 2005 को रीच नंबर दस पर एरिया कमांडर कृष्णा यादव के नेतृत्व में माओवादी दस्ते ने छह डंफर और एक पोकलेन मशीन को फूंक दिया, जिनकी अनुमानित राशि लगभग 2 करोड़ रुपये बताई गई. इस घटना के महज़ छह माह बाद मई 2006 में मंझगावा स्थित रीच नंबर पांच में जेएलटी प्रमुख सिकंदर यादव के नेतृत्व में दो रोलरों, पांच डंफरों, दो जेसीबी मशीनों और चार ट्रैक्टरों को आग के हवाले कर दिया गया. परिणामस्वरूप तक़रीबन चार करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. इसी तरह 29 मई, 2008 को बेस रेशाम स्थित रीच नंबर 21 पर माओवादियों ने रेलवे के चार कामगारों की पिटाई करने के साथ-साथ लगभग तीन करोड़ रुपये की संपत्ति फूंक दी. एक पखवारे के बाद उसी रीच पर नक्सलियों ने फिर आगजनी की घटना को अंजाम दिया, जिसमें क़रीब एक करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. 5 अप्रैल, 2009 को रीच नंबर तेरह में पुन: कृष्णा यादव के नेतृत्व में माओवादियों ने चार हाइवा, चार डंफरों और तीन पोकलेन को आग के हवाले कर दिया. इस घटना में लगभग पांच करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. 17 अक्टूबर, 2010 को भी नक्सलियों द्वारा रेलवे परियोजना में काम कर रहे लोगों की पिटाई करने का मामला प्रकाश में आया. नक्सलियों द्वारा लेवी वसूलने के उद्देश्य से अंजाम दी जाने वाली इस तरह की घटनाएं रेलवे की विभिन्न परियोजनाओं पर व्यापक असर डालती हैं.
विभिन्न परियोजनाओं के अधूरे कार्य |
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कहां से कहां तक ( रेल लाईन का निर्माण ) |
दूरी |
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कोडरमा से तिलैया के बीच |
68 किमी |
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गया से चतरा के बीच |
97 किमी |
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गिरिडीह से कोडरमा के बीच |
102.5 किमी |
| मंदार हिल से रामपुर हाट के बीच |
130 किमी |
| बांका से भीतिया के बीच |
147 किमी |
| देवघर-सुल्तानगंज-बांका-बरहेट |
149 किमी |
| कोडरमा से रांची के बीच |
189 किमी |
अपूर्ण दोहरीकरण कार्य (डबलिंग)
1. बिमलगढ़-राजाबेड़ा
2. चंद्रपुरा-भंडारडीह
3. गोयलकेरा-मनोहरपुर
4. पाड़ा पाथर-बनासपानी
5. राजखरसावां-सोनी
6. तीन पाथर-भागलपुर
7. डागापासी-राजखरसावां
8. सीनी-आदित्यपुर
9. साहिबगंज-पीरपैंती
10. मुरी नॉर्थ आउटर केबिन के पास से स्वर्ण रेखा नदी के ऊपर दूसरे पुल तक
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