इंतज़ार आ़खिर कब तक…

प्रसिद्ध लेखक टी एस इलियट ने सही कहा था कि दुनिया का अंत किसी धमाके से नहीं होगा, बल्कि इसका अंत धीरे-धीरे रिरियाहट के साथ होगा. बेशक धमाका पहले होना है, लेकिन इसके कारण अचानक दुनिया का अंत नहीं होने वाला है. भारत में लगातार धमाके हो रहे हैं. मई में दिल्ली में हुए, जुलाई में मुंबई में हुए और फिर सितंबर में दिल्ली में धमाके हुए. हमारे पास ख़ु़फिया तंत्र है. हम लोग दोषी को ढूंढ लेंगे. धमाके करने वाले पहले से ही एफबीआई की सूची में हैं और हम उन्हें शिकागो या न्यूयॉर्क की अदालत में खड़ा करेंगे. इस बात पर कोई विवाद न हो कि किसने क्या किया, इस समय हम सरकार के साथ एकजुट होकर खड़े हों, लेकिन यह धमाका फिर से होगा. हो सकता है, यह धमाका नवंबर में मुंबई में हो या जनवरी में दिल्ली में हो जाए, क्योंकि आतंकवादी हमारी कमज़ोरी को जानते हैं. उन्हें पता है कि इस जानकारी के बावजूद कि कुछ जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाना ज़रूरी है, जिससे ऐसे धमाके रोके जा सकते हैं, सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए जाएंगे.

कौन सी ऐसी बाधाएं हैं, जो विकास के इस आंकड़े को हासिल करने का रास्ता रोकती हैं? क्या हम लोग पैसा बर्बाद कर रहे हैं और उन जगहों पर धन ख़र्च कर रहे हैं, जो अनुत्पादक हैं? क्या हमारा उद्देश्य केवल राजनेताओं की वाहवाही लूटना रह गया है, क्या केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने अपने-अपने वित्तीय अपव्यय के कारण विकास दर के मार्ग में अवरोध खड़ा कर रखा है, क्या यूपीए गठबंधन के अंदर आपसी सामंजस्य का अभाव है या कांग्रेस अकेले ही उच्च विकास दर की रणनीति बनाना चाहती है?

मई में दिल्ली हाईकोर्ट में हुए धमाके के बाद से ही इस परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, लेकिन नहीं लगाए गए. मुंबई में भी यही हुआ और सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाए गए. आख़िर ऐसा क्यों किया जाता है? वजह स्पष्ट है, सीसीटीवी कैमरा कोई बहुत महंगा सामान नहीं है कि इसे लगाने से भ्रष्ट अधिकारियों या नेताओं को कोई ज़्यादा लाभ होगा. वे तो वही काम करेंगे, जिससे उनकी जेब में ज़्यादा से ज़्यादा पैसा आए. लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है. जब भी बम विस्फोट होगा, आपके हमदर्द नेता अस्पताल में आपसे सहानुभूति जताने ज़रूर आएंगे. उन्हें जेड श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है, जिस पर होने वाला ख़र्च हम लोगों की सुरक्षा पर होने वाले ख़र्च से कई गुना अधिक है. लेकिन आप समझ नहीं सकते न! वे नेता हैं, सरकार हैं, माई-बाप हैं और आप केवल विश्व के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के साधारण से नागरिक हैं. आपकी गिनती स़िर्फ चुनाव के समय की जाती है. सबसे महत्वपूर्ण बात जो आपको याद रखनी है, वह यह है कि किसी को इसके लिए दोषी नहीं ठहराना है. आप अपने ही लोगों से, जो अस्पताल में भर्ती हैं, नहीं मिल सकते, क्योंकि नेता जी को उनसे मिलने जाना है. जब नेताजी आएंगे तो उनकी सुरक्षा तो सबसे महत्वपूर्ण है. फिर आपको अपने ही लोगों से, जो अस्पताल में अंतिम सांस ले रहे हैं अथवा उनके मृत शरीर से दूर रखा जाएगा. जब सारे पार्टी के नेता अपना प्रचार कर लेंगे, मीडिया से मुखातिब हो लेंगे, तभी आपका नंबर आएगा.

भारत एक सॉफ्ट स्टेट है और केंद्र सरकार कमज़ोर हो गई है. आतंकवादी जानते हैं कि भारत पर बिना किसी भय के आक्रमण किया जा सकता है. अमेरिका की निगरानी क्षमता भारत से काफी बेहतर है, वहां आक्रमण करना बहुत मुश्किल है. चीन भी जानता है कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट है और इसी कारण उसने बल्टीस्तान, बर्मा एवं बांग्लादेश से होकर हमारी पूर्वी सीमा पर सड़क और रेल मार्ग बनाए. तीन हज़ार सालों से भारत में जो होता रहा है, वह अभी भी घट रहा है. उस समयभी केंद्र सरकार कमज़ोर होती थी और क्षत्रप ताक़तवर होते थे. आज भी केंद्र कमज़ोर है और राज्य सरकारें मनमानी कर रही हैं. अभी ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के साथ बांग्लादेश जाने से मना कर दिया और तीस्ता नदी के जल के बंटवारे से संबंधित संधि अवरुद्ध कर दी. ख़ैर, वह यूपीए के सहयोगी दल की हैं. अगर नहीं होतीं तो क्या होता. यदि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के साथ किसी संधि के लिए बलूचिस्तान जाने से मना कर दिया होता तो क्या होता, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. बेशक आधुनिक भारत मौर्य या गुप्त साम्राज्य की तरह नहीं है. तीन या चार पीढ़ियों के बाद उनका पतन हो गया. भारत तो एक ही रहेगा, लेकिन राज्य धीरे-धीरे कुछ ज़्यादा ही स्वायत्त होंगे. तमिलनाडु हमेशा मनमानी करता रहा है और पिछले दिनों आंध्र प्रदेश भी वैसा ही दिखा, जब जगन ने अपना अलग रास्ता तय कर लिया और केंद्रीय नेतृत्व की अवहेलना की. पश्चिम बंगाल में भी ग़ैर कांग्रेसी सरकार है, जो कांग्रेस विरोधी सरकार बन सकती है. उत्तर प्रदेश और बिहार में भी ग़ैर कांग्रेसी सरकार है. यह बात ग़ौर करने वाली है कि राज्य सरकारें केंद्र से केवल बहुत सारा धन चाहती हैं और यह भी चाहती हैं कि केंद्र सरकार उन्हें धन देकर भूल जाए और फिर उनसे किसी प्रकार का कोई प्रश्न न करे. लेकिन इससे समस्या का समाधान तो नहीं होगा. भारत को स्थायी विकास की आवश्यकता है. मैं बजट के समय से ही इस बात का अनुमान लगाता रहा हूं कि 2011-2012 में मुद्रा स्फीति की दर वास्तविक जीडीपी से अधिक होगी. मैं दु:ख के साथ इसे सही साबित करने वाला था. इस स्थिति में भी मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने 9 फीसदी विकास दर होने की बात कही, जो कि हिंदू विकास दर 1950-1980 से तीन गुना अधिक है. आख़िरकार हमारे यहां दो अंकीय विकास दर हासिल करना इतना मुश्किल क्यों है.

कौन सी ऐसी बाधाएं हैं, जो विकास के इस आंकड़े को हासिल करने का रास्ता रोकती हैं? क्या हम लोग पैसा बर्बाद कर रहे हैं और उन जगहों पर धन ख़र्च कर रहे हैं, जो अनुत्पादक हैं? क्या हमारा उद्देश्य केवल राजनेताओं की वाहवाही लूटना रह गया है, क्या केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने अपने-अपने वित्तीय अपव्यय के कारण विकास दर के मार्ग में अवरोध खड़ा कर रखा है, क्या यूपीए गठबंधन के अंदर आपसी सामंजस्य का अभाव है या कांग्रेस अकेले ही उच्च विकास दर की रणनीति बनाना चाहती है? राष्ट्रीय सलाहकार परिषद कहीं यह तो नहीं सोचती कि समावेशी विकास के लिए विकास दर का बढ़ाया जाना आवश्यक नहीं है, क्या ग़रीबों को हमेशा इंतज़ार करना पड़ेगा. कई सारे सवाल एक साथ खड़े हो जाते हैं, जिनका उत्तर ढूंढना ज़रूरी हो गया है.

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