आरटीआई का दुश्मन कौन है

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इस अंक में हम उन कारणों की चर्चा कर रहे हैं, जिनकी वजह से जनता के लोकतांत्रिक हथियार सूचना के अधिकार क़ानून को कमज़ोर बनाने की साजिश रची जाती है. आज ऐसे कारणों और उनके समाधान के बारे में जानना बेहद ज़रूरी है.

जुर्माना नहीं लगता

केंद्र और राज्यों के लगभग तमाम सूचना आयुक्त सूचना न देने वाले अधिकारियों पर जुर्माना लगाने से बचते रहे हैं. यहां तक कि जनता की मांग पर आयुक्त बनाए गए शैलेष गांधी भी अपनी श्रेष्ठता एक दिन में अधिक से अधिक मामले निपटा कर दिखाने में लगे हैं, जबकि यह साफ हो चुका है कि यदि जुर्माने का प्रावधान न होता तो सूचना अधिकार क़ानून के तहत सूचना कभी मिलती ही नहीं.

दुरुपयोग बताना ग़लत

भ्रष्ट अफसरों और नेताओं के साथ-साथ देश के लगभग सभी सूचना आयुक्त यह कहते मिल जाएंगे कि सूचना अधिकार क़ानून का इस्तेमाल अच्छे लोग नहीं कर रहे हैं, ग़लत लोग इसका दुरुपयोग कर रहे हैं. क्या एक आदमी जो रिश्वत नहीं देता, उसे यह जानने का हक़ नहीं है कि उसके पासपोर्ट आवेदन का क्या हुआ? क्या किसी ग़रीब को यह जानने का हक़ नहीं है कि उसके हिस्से का राशन कहां जा रहा है?

लंबित मामलों की संख्या

सूचना आयोगों की सुस्ती का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग ने सात सूचना आयुक्त होने के बावजूद 2008 में मात्र 880 मामलों की सुनवाई की. महाराष्ट्र सूचना आयोग का ऑडिट करने पर पता चला कि आयोग के छह सूचना आयुक्त प्रतिदिन औसतन 5 अपीलों या सुनवाइयों को निस्तारित करते हैं. कर्नाटक सूचना आयोग की स्थिति यह है कि मार्च 2009 के अंत तक वहां लंबित मामलों की संख्या 5200 थी. पश्चिम बंगाल सूचना आयोग ने तीन सालों में मात्र 116 मामलों की सुनवाई की.

जेल का डर

सूचना आयुक्त आवेदकों या कार्यकर्ताओं पर झूठा मुकदमा दर्ज कराने से लेकर उन्हें जेल भिजवाने में भी नहीं हिचकते. महाराष्ट्र सूचना आयोग के तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त सुरेश जोशी के आदेश पर मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता कृष्णराज राव और उनके 11 साथियों के ख़िला़फ झूठा मुकदमा दर्ज कर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था.

सूचना के बदले पैसों की मांग

गाज़ियाबाद के कुलदीप सक्सेना ने बिजली विभाग से अपने इलाक़े के बिजलीघर की क्षमता और तीन महीने की सप्लाई के बारे में जानकारी मांगी तो विभाग ने उनसे कहा कि यह सूचना देने के लिए उसे एक कर्मचारी लगाना पड़ेगा, जिस पर 5000 रुपये का ख़र्च आएगा. इसी तरह भोजपुर ज़िले के गुप्तेश्वर सिंह ने राशन विभाग से अनाज और मिट्टी के तेल के बारे में सूचना मांगी तो उनसे 78 लाख रुपये की मांग की गई. यह हथकंडा देश के सैकड़ों लोक सूचना अधिकारी आज़मा रहे हैं.

कैसे-कैसे बहाने

सूचना क़ानून के तहत सूचना न देने के लिए लोक सूचना अधिकारी ऐसे अजीबोग़रीब तर्क देते हैं, जिनका कोई मतलब नहीं होता. उत्तर प्रदेश सूचना आयोग किसी संस्था के लेटरहेड पर सूचना मांगने पर आवेदन निरस्त कर देता है. जम्मू-कश्मीर निर्वाचन आयोग की तरफ़ से एक आवेदक को पत्र मिला, जिसमें कहा गया कि आवेदन हिंदी के बजाय अंग्रेजी में भेजें और कहीं-कहीं उर्दू में दिया गया आवेदन स्वीकार नहीं किया जाता.

आवेदन शुल्क का पेंच

आवेदन के संदर्भ में शुल्क का पेंच इस तरह फंसा है कि उसने एक सामान्य से क़ानून का इस्तेमाल भी पेचीदा बना दिया है. एक तरफ़ हरियाणा जैसे राज्यों में सूचना अधिकार क़ानून के तहत आवेदन करने के लिए 50 रुपये देने पड़ते हैं, वहीं अरुणाचल में यह शुल्क 10 रुपये से 500 रुपये तक है. उच्च न्यायालयों में तो यह शुल्क 500 रुपये कर ही दिया गया है. जहां 10 रुपये शुल्क है, वहां भी हाल बेहाल है. नकद की रसीद नहीं, डिमांड ड्राफ्ट या पोस्टल ऑर्डर किस नाम से बनेगा, यह भी कोई बताने को तैयार नहीं.

पीआईओ या बदमाश

जागरूक आदमी जेल में सड़ते हैं या किसी गली में मरे पड़े मिलते हैं. यह बात उत्तर प्रदेश के एक पुलिस अधिकारी ने लखनऊ के  सलीम बेग से कही थी. बेग ने सूचना अधिकार कानून के तहत कांस्टेबल पद के लिए चयनित उम्मीदवारों के संबंध में जानकारी मांगी थी. बीएसएनएल आजमगढ़ के अधिकारी-कर्मचारी आरटीआई आवेदनों से इस कदर परेशान हो गए कि उन्होंने सूचना मांगने वाले स्थानीय निवासी रवि कुमार मौर्य की कार्यालय में ही पिटाई कर दी, साथ ही झूठा मुकदमा भी दर्ज करा दिया.

धारा 8 का दुरुपयोग

तमिलनाडु के सी. रमेश ने जब आरटीआई के तहत फरवरी 2002 से मार्च 2002 के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुए पत्र व्यवहार की प्रतिलिपि मांगी तो सूचना क़ानून की धारा 8 (1)(ए) का हवाला देते हुए उन्हें सूचना देने से मना कर दिया गया. कहा गया कि इसे सार्वजनिक किए जाने से देश की एकता और अखंडता पर विपरीत असर पड़ सकता है. दिल्ली के प्रमोद सरीन ने दिल्ली कॉलेज और इंजीनियरिंग की संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिणाम से असंतुष्ट होकर आरटीआई के तहत प्रश्नपत्र और ओएमआर शीट की छाया प्रति मांगी. विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह कहते हुए सूचना देने से मना कर दिया कि प्रश्नपत्र और उनके जवाब विश्वविद्यालय की बौद्धिक संपदा हैं, इसलिए उन्हें क़ानून की धारा 8 (1)(डी) के तहत नहीं दिया जा सकता.

सरकारी कर्मचारियों को धमकी

मध्य प्रदेश के देवास में केंद्रीय विद्यालय के प्राइमरी शिक्षक मांगीलाल कजोडिया ने अपने ही विद्यालय से सूचनाएं मांगीं तो पहले उन्हें कारगिल भेज दिया गया और बाद में नौकरी से ही निकाल दिया गया. रेलवे प्रोटेक्शन स्पेशल फोर्स में चालक पद पर कार्यरत ओंकार गुप्ता के साथ भी यही हुआ, जब उन्होंने अपने विभाग की तानाशाही को आरटीआई के माध्यम से उजागर किया. सूचना के बदले मिले जवाब में ओंकार की तनख्वाह ही कम कर दी गई. इसी तरह साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड लिमिटेड में कार्यरत मुजीबुर्रहमान ने जब अपनी ही कंपनी से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जमा किए गए धन की जानकारी मांगी तो उन्हें कंपनी के निदेशक की तरफ़ से धमकियां मिलनी शुरू हो गईं और उनके ख़िलाफ़ तमाम तरह की जांच बैठा दी गई.

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