अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि समान वित्त वितरण में कोई कठिनाई नहीं है. यह योजना शाश्वत चल सकने वाली और संभव है. आपने देख लिया होगा कि वर्तमान अर्थव्यवस्था से किसी को भी संतोष नहीं है. समाजवाद शब्द की व्याख्या किए बिना ही या मतलब समझे बिना ही आपको जंच गया होगा कि समान रूप से सबको धन का बंटवारा हो जाए तो वह ही अति उत्तम मार्ग है. अगर आपको यह नहीं जंचा है तो कोई भी दूसरा मार्ग जो अच्छा और संतोषप्रद हो, आप ही सुझाइए. शायद आपका बताया मार्ग ज़्यादा ठीक हो. अगर आपके पास कोई मार्ग नहीं है तो फिर आप भी समाजवादी बन जाइए. जो समाजवादी राजनीतिक पार्टी है, उससे और इस विचारधारा से कोई लाग-लगाव नहीं है. उस राजनीतिक पार्टी में सब तरह के व्यक्ति हैं, जैसे सब पार्टियों में हुआ करते हैं. उनमें ऐसे भी हैं जो लंबी-लंबी तकरीरें झाड़ते हैं और अगर कहीं आप अपने घर उन्हें दावत पर बुला लें तो शायद आपके जूते चोरी कर ले जाएं. अच्छे हैं, उनमें से काफी लोग अच्छे भी हैं. जब उनको आप कहेंगे कि भाई हमने समाजवाद का जो तथ्य समझा है, उसके हिसाब से राष्ट्र के संपूर्ण धन का समान बंटवारा करना है. चाहे वृद्ध हो या युवा, स्त्री हो या पुरुष, चोर, डाकू, धोबी, मोची, कुम्हार, शराबी, जुआरी सबके लिए समान रूप से वित्त वितरण करना होगा. आपकी बात सुनकर वह स़िर्फ हंसेगा, मानो आपने बहुत नादानी की या मूर्खतापूर्ण बात कह दी हो.
वर्तमान अर्थव्यवस्था से संत्रस्त होकर कतिपय नेताओं ने जो अलग-अलग आवाजें उठाईं, उसी में समूहवाद, आतंकवाद, अराजकतावाद, राष्ट्रवाद या साम्यवाद, कई तरह के वाद आ गए. वस्तुत: समाजवाद को समाजवाद के रूप में व्यवस्थित चलाने के लिए उनमें एक भी वाद संसार में कहीं भी सफल नहीं हो पाया. यों तो सृष्टि के आदि से ही वैदिक काल में समाजवाद जीवित रहो और जीने दो के सिद्धांत में निहित है. भगवान से वैदिक प्रार्थना है, सर्वे संतु: निरामया: यानी सारी प्रजा सुखी रहे, किसी तरह की कमी या कष्ट महसूस न करे.
फिर आप उनसे पूछिए कि भाई आप समाजवादी हैं, आप बताइए, आप कैसा समाजवाद चाहते हैं? तो उनका जवाब जो नपा-तुला है, वह यह है कि हर मानव को समान अवसर मिले, यही समाजवाद है. उनका कहना है कि अगर पूंजीवादी भी हो तो बुरा नहीं, पर पूंजीवादी बनने का सबको समान अवसर मिलना चाहिए. आप कहेंगे, भाई यह संभव कैसे है, बिना समान अवसर वित्त के समान अवसर कैसे बन पड़ेगा? इसका जवाब अधिकतर समाजवादी दे नहीं पाते हैं. आपने कई पुस्तकें पढ़ी होंगी, नहीं तो देखिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र या महाभारत काल की अर्थव्यवस्था, वहां समाजवाद का चित्रण सुलभ है. कार्ल मार्क्स की पुस्तक दास कैपिटल पढ़ने लायक महत्वपूर्ण पुस्तक है. वर्तमान अर्थव्यवस्था से संत्रस्त होकर कतिपय नेताओं ने जो अलग-अलग आवाज़ें उठाईं, उसी में समूहवाद, आतंकवाद, अराजकतावाद, राष्ट्रवाद या साम्यवाद, कई तरह के वाद आ गए. वस्तुत: समाजवाद को समाजवाद के रूप में व्यवस्थित चलाने के लिए उनमें एक भी वाद संसार में कहीं भी सफल नहीं हो पाया. यों तो सृष्टि के आदि से ही वैदिक काल में समाजवाद जीवित रहो और जीने दो के सिद्धांत में निहित है. भगवान से वैदिक प्रार्थना है, सर्वे संतु: निरामया: यानी सारी प्रजा सुखी रहे, किसी तरह की कमी या कष्ट महसूस न करे. इस भावना का बाद में अनेक ऋषियों या दार्शनिकों ने भी ख़ूब प्रतिपादन किया. महर्षि अरस्तु और सुकरात या प्लेटो ने घोषणा की कि सबको भगवान ने समान बनाया है, समान ही जीने का अधिकार है. गीता में भगवान कृष्ण भी कहते हैं, मानव ही नहीं, प्राणी मात्र इस माने में समान हैं.
विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी,
शुनि चैव श्वपा के च, पंडिता: समदर्शिन:.
अर्थात पढ़ा-लिखा ब्राह्मण हो, गाय हो, हाथी हो, कुत्ता हो या अंत्यज हो, इन सबको विद्वान लोग समान दृष्टि से देखते हैं, यही तो समाजवाद का उद्गम है, उस समय का समाजवाद यही तो था.
पृथ्वी पर स्वर्ग उतार लाने का स्वप्न इसी बात से ज़ाहिर है कि भौतिक पदार्थ जितने भी हैं, वे सब बराबर-बराबर उपभोग किए जाएं. स्वर्ग की कल्पना भी ऐसा ही कुछ बतलाती है. जिसने यह जान लिया कि भौतिक पदार्थों का बराबर-बराबर बंटवारा होना चाहिए, वही सच्चा समाजवादी है. चाहे इस निर्णय पर पहुंचने के लिए उसे किसी भी मार्ग का अनुसरण करना पड़ा हो. और जो यह नहीं जानता, वह समाजवादी नहीं है. वह चाहे कितने ही जोर से समाजवाद का नारा लगाए, चाहे हिमालय की चोटी से घोषणा करे कि मैं समाजवादी हूं और ऐसा करने में वह शहीद भी हो जाए, तो भी वह दरअसल में समाजवादी है नहीं. आपने जान लिया होगा कि तथाकथित समाजवादियों में और असली समाजवाद में कितना अंतर है. राजनीतिक पक्ष को प्रबल करने के लिए अलग-अलग पार्टियां अलग-अलग प्रचार करती हैं, पर तथ्यपूर्ण समाजवाद की स्थापना के लिए सच्चे मन से प्रयास कौन कर रहा है, यह विचारणीय है.
महावीर प्रसाद आर मोरारका का जन्म 12 अगस्त, 1919 को नवलगढ़ (झुंझनू) राजस्थान में हुआ था. उद्योगपति, स्वप्नदृष्टा और लेखक से कहीं अधिक वह उदात्त मानवीय मूल्यों के संवाहक थे. उनकी गणना भारत के प्रमुख उद्योगपतियों में की जाती है.
|
|
|









