बालाराम धुरंधर और भगवान पांडुरंग

सांताक्रूज, बंबई के बालाराम धुरंधर प्रभु जाति के एक सज्जन पुरुष थे. वह बंबई उच्च न्यायालय में एडवोकेट थे और किसी समय शासकीय विधि विद्यालय बंबई के प्राचार्य भी थे. उनका संपूर्ण कुटुंब सात्विक एवं धार्मिक था. बालाराम ने अपनी जाति की ख़ूब सेवा की और इस संबंध में एक पुस्तक भी प्रकाशित कराई. इसके बाद उनका ध्यान आध्यात्मिक एवं धार्मिक विषयों पर गया. उन्होंने ध्यानपूर्वक गीता, उसकी टीका ज्ञानेश्वरी एवं अन्य दार्शनिक ग्रंथों का अध्ययन किया. वह पंढरपुर के भगवान विठोबा के परम भक्त थे. 1912 में उन्हें साई बाबा के दर्शनों का लाभ हुआ. छह माह पूर्व उनके भाई बाबुल जी और वामनराव ने शिरडी आकर बाबा के दर्शन किए थे और उन्होंने घर लौटकर अपने मधुर अनुभव भी बालाराम एवं परिवार के अन्य लोगों को सुनाए. तब सब लोगों ने शिरडी जाकर बाबा के दर्शन करने का निश्चय किया. यहां शिरडी में उनके  पहुंचने के पूर्व ही बाबा ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि आज मेरे बहुत से दरबारीगण आ रहे हैं. अन्य लोगों द्वारा बाबा के उपरोक्त वचन सुनकर धुरंधर परिवार को काफी आश्चर्य हुआ. उन्होंने अपनी यात्रा के संबंध में किसी को भी इसकी पहले से सूचना नहीं दी थी. सभी ने आकर उन्हें प्रणाम किया और बैठकर वार्तालाप करने लगे. बाबा ने अन्य लोगों को बताया कि ये मेरे दरबारीगण हैं, जिनके संबंध में मैंने तुमसे पहले कहा था. फिर वह धुरंधर भाइयों से बोले कि मेरा और तुम्हारा परिचय 60 जन्म पुराना है. सभी नम्र और सभ्य थे, इसलिए वे सब हाथ जोड़े हुए बैठे-बैठे बाबा की ओर निहारते रहे. उनमें सब प्रकार के सात्विक भाव जैसे अश्रुपात, रोमांच एवं कंठावरोध आदि जागृत होने लगे और सबको बड़ी प्रसन्नता हुई. इसके बाद वे सब भोजन के लिए गए और थोड़ा विश्राम लेकर पुन: मस्जिद आकर बाबा के पांव दबाने लगे. उस समय बाबा चिलम पी रहे थे. उन्होंने बालाराम को भी चिलम देकर एक फूंक लगाने का आग्रह किया. यद्यपि अभी तक उन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया था, फिर भी चिलम हाथ में लेकर बड़ी कठिनाई से उन्होंने एक फूंक लगाई और आदरपूर्वक बाबा को लौटा दी. बालाराम के लिए तो यह अनमोल घड़ी थी. वह 6 वर्षों से श्वांस रोग से पीड़ित थे, पर चिलम पीते ही रोगमुक्त हो गए. उन्हें फिर कभी यह कष्ट नहीं हुआ. 6 वर्षों के बाद उन्हें एक दिन पुन: दौरा पड़ा. यह वही दिन था, जब बाबा ने महासमाधि ली थी. वह गुरुवार के दिन शिरडी आए थे. भाग्यवश उसी रात्रि को उन्हें चावड़ी उत्सव देखने का अवसर मिल गया. आरती के समय बालाराम को चावड़ी में बाबा का मुखमंडल भगवान पांडुरंग सरीखा दिखाई पड़ा. दूसरे दिन कांकड़ आरती के समय उन्हें बाबा के मुखमंडल की प्रभा अपने परम इष्ट भगवान पांडुरंग के सदृश ही पुन: दिखाई दी.