दिल्ली हाईकोर्ट के निकट हुए बम विस्फोट ने एक बार फिर से एक बड़े खतरे के तौर पर आतंकवाद की ओर लोगों का ध्यान खींचा है. इसी तरह के बम विस्फोट मुंबई, पुणे एवं जयपुर आदि शहरों में भी हुए थे. लेकिन 9/11 के बाद अमेरिका में कोई बड़ा बम धमाका नहीं हुआ और न 2005 के विस्फोट के बाद ब्रिटेन में ही ऐसी कोई घटना घटी. आखिर हमारे देश में ही बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं? इसका कारण है, हमारे यहां मज़बूत पुलिस व्यवस्था का अभाव. किसी समय मुंबई पुलिस का नाम था और उसकी तुलना स्कॉटलैंड पुलिस से की जाती थी, लेकिन अब स्थिति वैसी नहीं है. आज मुंबई पुलिस की बरसों पुरानी मु़खबिर व्यवस्था समाप्त हो चुकी है और बम विस्फोट होने के बाद इस संबंध में किसी प्रकार का कोई सुराग पुलिस को नहीं मिल पाता. इसका एक कारण यह भी है कि हमारे यहां पुलिस फोर्स की कमी है और जितनी पुलिस है, उसमें भी बहुतों को वीआईपी सुरक्षा में लगा दिया गया है. यहां तक कि एक सांसद भी पुलिस जीप के साथ चलता है, चाहे उसे जान का कोई खतरा हो या नहीं. यह एक स्टेटस सिंबल बन गया है.
अब समय आ गया है, जबकि हमें पुलिस का इस्तेमाल सही तरीके से करना होगा. कहां कितने पुलिस वालों की तैनाती की जानी चाहिए, इस पर समुचित विचार करना होगा. यही नहीं, यह भी देखना होगा कि पुलिस अपना काम सही तरीके से करे, न कि जनता को परेशान करने में अपना क़ीमती समय बर्बाद करे. किरण बेदी ने एक बार कहा था कि पुलिस तुरत न्याय कर सकती है. उदाहरण के लिए अगर कोई चोर किसी से चेन छीन लेता है और पुलिस उसे पकड़ लेती है तो वह छीनी हुई चेन तुरंत पीड़ित को वापस दिला सकती है. किरण बेदी का कहना सही है, लेकिन आजकल कितने पुलिस वाले ऐसा करेंगे? सच्चाई तो यह है कि अगर चोर पकड़ा भी जाए तो पीड़ित को अपना ही सामान लेने के लिए पुलिस स्टेशन के कई चक्कर लगाने पड़ेंगे. पुलिस व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए ज़रूरी है कि एक पुलिस कोड हो. आज एक सामान्य नागरिक भी यह देख सकता है कि हमारे यहां की पुलिस कितनी ढीली-ढाली है. बड़े पेट वाले पुलिसकर्मियों से आप भला क्या उम्मीद कर सकते हैं. जो खुद ही फिट नहीं हैं, वे हमारी सुरक्षा कैसे करेंगे? ऐसे पुलिस वाले तो किसी अपराधी को पकड़ने के लिए दौड़ भी नहीं सकते हैं. हमारे यहां ऐसे हज़ारों युवा हैं, जो पुलिस की नौकरी करने के लिए तैयार हैं और वे इसके लिए फिट भी हैं. अगर पुलिस में नौकरी करने वाले लोगों की कार्यक्षमता का क्षरण हो गया है तो हमें युवाओं को भर्ती करने की आवश्यकता है, ताकि हम भी ब्रिटेन और अमेरिका की तरह आतंकवाद से लड़ने में सफल हो सकें. कुछ ही महीनों के अंतराल पर हमारे यहां कोई न कोई आतंकवादी घटना हो जाती है और हर बार एक ही तरह की बातें सुनने को मिलती हैं.
आज समय आ गया है कि यदि सामान्य नागरिकों से प्राप्त संसाधनों को पुलिस पर खर्च किया जा रहा है तो पुलिस को भी ज़िम्मेदार होना चाहिए. इसमें कोई संदेह नहीं है कि खु़फिया तंत्र से युक्त सशक्त पुलिस इस तरह की आतंकवादी घटनाओं को रोकने में सहायक हो सकती है. इतना तो कम से कम जनता के लिए किया ही जाना चाहिए.
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