दो अक्टूबर को गांधी जयंती मनाई जाती है. यह दिन पाखंड, अतिशयोक्ति और बड़बोलेपन का होता है. इस दिन बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं. राष्ट्रपिता को हम लोग दो दिन ही याद रखते हैं, एक उनके जन्मदिवस पर और दूसरे जिस दिन उनकी मृत्यु हुई थी. इसके बाद गांधी जी नोटों पर विराजमान होकर हम पर हंसते हुए दिखाई देते हैं. ये वही नोट होते हैं, जिनका इस्तेमाल काले धन के तौर पर हमारी राजनीति को भ्रष्ट करने के लिए किया जाता है. आजकल कौन चरखा चलाता है और खादी के वस्त्र बुनता है, लेकिन गांधी जी के नाम का इस्तेमाल दोनों ओर से किया जाता है. राजनीति में फैले भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए भी उनके नाम और उनके द्वारा सुझाए गए मार्ग का इस्तेमाल किया जाता है. अन्ना हजारे का उदाहरण हमारे सामने है. उन्होंने दिखा दिया कि किस प्रकार 21वीं शताब्दी में भी पूरे भारत में युवाओं की भीड़ जुटाई जा सकती है. यह भीड़ केवल शहरी मध्य वर्ग के युवाओं की नहीं थी, जैसा कि सरकार ने प्रचारित किया. इसके अलावा गांधी और उनके शिष्य जय प्रकाश नारायण के नाम का इस्तेमाल राजनेताओं द्वारा भी किया जाता है और वे भी इनके नाम का इस्तेमाल भीड़ जुटाने के लिए करते हैं. हालांकि उनका उद्देश्य कुछ और ही होता है.
गांधी जी और उनके शिष्यों विशेषकर जय प्रकाश नारायण की अपील संसदीय व्यवस्था के विरुद्ध रही है. गांधी जी ने उस समय बनाए गए संविधान को पसंद नहीं किया था. उनका विचार था कि भारत में सात लाख स्वशासित गांव होने चाहिए. उनका यह विचार अव्यवहारिक और अराजकतावादी दिखाई पड़ता है. अव्यवहारिक इसलिए, क्योंकि गांधी जी जिस आदर्श गांव की बात करते थे, वह आज तक संभव नहीं हो सका.
गांधी जी और उनके शिष्यों विशेषकर जय प्रकाश नारायण की अपील संसदीय व्यवस्था के विरुद्ध रही है. गांधी जी ने उस समय बनाए गए संविधान को पसंद नहीं किया था. उनका विचार था कि भारत में सात लाख स्वशासित गांव होने चाहिए. उनका यह विचार अव्यवहारिक और अराजकतावादी दिखाई पड़ता है. अव्यवहारिक इसलिए, क्योंकि गांधी जी जिस आदर्श गांव की बात करते थे, वह आज तक संभव नहीं हो सका. उनका गांव समानता पर आधारित गणतंत्र था, लेकिन आज का गांव उनके आदर्शों के विपरीत है. समानता की बात तो उसमें सोची ही नहीं जा सकती. गांव में दलितों एवं पिछड़े वर्ग के लोगों की स्थिति बदतर होती है. वे जानते हैं कि गांव उनके लिए जेल है, जहां से निकले बिना उनका कल्याण नहीं हो सकता है. इसी कारण वे गांव छोड़कर शहरों की ओर आते हैं, जहां उन्हें अपनी स्थिति सुधारने के अच्छे मौक़ेमिल जाते हैं. खाप पंचायतों के फैसलों ने यह बात साबित कर दी है कि वहां परंपराओं के निर्वहन के नाम पर लोगों को सताया जाता है. अंबेडकर इस बात को जानते थे और जवाहर लाल नेहरू उनके विचारों से सहमत थे. यही वजह थी कि इन लोगों ने ग्रामीण गणतंत्र के विचार का विरोध किया और पश्चिमी तरीक़े के निर्वाचन वाले संसदीय लोकतंत्र का समर्थन किया.
इसके बावजूद कि इन लोगों ने इस व्यवस्था को अच्छा समझा, अभी तक यह लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल ही दिखाई दी. भ्रष्टाचार में संलिप्तता के कारण आज के सांसदों की विश्वसनीयता लगातार घटती जा रही है. ऐसे समय में हमें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश है, जो हमारी समस्याओं का समाधान कर सके. अमेरिका में इसके लिए सफेद घोड़े पर बैठे एक आदमी की कल्पना की जाती है, लेकिन भारत में गांधी जी ने हमें दूसरी तस्वीर दिखाई है, एक कृशकाय संत की तस्वीर जो अनशन के माध्यम से दुनिया के दु:खों को दूर करने की ताक़त रखता है. लेकिन यह एक प्रकार से पूर्णत: लोकतंत्र विरोधी विचारधारा है. इसके तहत चुनी गई सरकार में अविश्वास किया जाता है, जबकि उस संत में विश्वास किया जाता है, जो हमारी समस्याओं का समाधान करेगा. यह वही रास्ता है, जिसका उपयोग गांधी जी ने कांगे्रस के माध्यम से भारत की आज़ादी के लिए किया था. वह ऐसे मज़बूत आदमी थे, जिसने अकेले ही कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए, चाहे वह चौरी-चौरा के कारण असहयोग आंदोलन स्थगित करने का मामला हो या भारत छोड़ो आंदोलन का या फिर सुभाष चंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्ती़फे का. गांधी जी के अलावा, जो कांग्रेस के चार आने वाले सदस्य तक नहीं थे, पूरी कांगे्रस पार्टी लोकतांत्रिक तरीक़े से काम करती थी, लेकिन स्वाधीनता के बाद भारत ने उस संत की छवि को अस्वीकार कर दिया, जो तानाशाह किस्म का था.
एक जन्मदिन, जो पता नहीं किस कारण से हम लोग नहीं मनाते हैं, वह है नेहरू का, लेकिन यह नेहरू जवाहर लाल नहीं, बल्कि उनके पिता मोती लाल नेहरू हैं. मोती लाल अपने घर के तो शासक थे, लेकिन अपने राजनीतिक व्यवहार में वह लोकतांत्रिक थे. वह महात्मा गांधी के अनशन एवं ब्रह्मचर्य आदि विचारों को स्वीकार नहीं करते थे. उन्होंने चौरी-चौरा के बाद गांधी का साथ छोड़ दिया और स्वराज पार्टी की स्थापना की. इस पार्टी के माध्यम से उन्होंने विधायिका में प्रवेश किया. साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए 1929 में जो आयोग बनाया गया, उसके अध्यक्ष भी मोतीलाल ही थे. इस आयोग का काम भारत के लिए संविधान बनाना था. अगर देखा जाए तो भारत के संविधान के असली जन्मदाता तो मोती लाल नेहरू थे. गांधी को याद करना और मोती लाल को भूलना हमारी राजनीति के लिए सही नहीं है. गांधी जी संत के रूप में सही हो सकते हैं. चौरी-चौरा के बाद असहयोग आंदोलन स्थगित करने का उनका निर्णय एकपक्षीय था. इस निर्णय ने कांग्रेस से मुस्लिमों को अलग करने में योगदान किया. इसी के बाद भारतीय मुसलमान कांग्रेस से अलग होने लगे. यह सही हो सकता है और गलत भी, लेकिन कांग्रेस आज़ादी मिलने तक उनके निर्णयों पर भरोसा करती रही. जब आज़ादी निकट थी, तब नेहरू और पटेल को पता हो गया था कि अब उन्हें निर्णय लेना है, न कि गांधी को, क्योंकि सरकार तो उन्हें ही चलानी है. अब यह कहना मुश्किल है कि नेहरू और पटेल ग़लत कर रहे थे.
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