जनरल वी के सिंह जन्म तिथि विवाद : टॉप सीक्रेट फाइल की कहानी क्या है?

थलसेना अध्यक्ष जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि पर सरकार किस तरीके से विवाद खड़ा कर रही है और तमाम हथकंडे अपना कर उन्हें ग़लत साबित करने पर तुली हुई है, इसका खुलासा जब चौथी दुनिया ने किया, तब देश के मीडिया और खासकर अंग्रेजी मीडिया से लेकर रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों तक ने एक बार फिर से इस विवाद को हवा देना शुरू कर दिया. जनरल वी के सिंह के खिला़फ सरकार, रक्षा मंत्रालय और वहां बैठे अधिकारी किस तरह साजिश रच रहे हैं, इसका बेहतरीन उदाहरण भारत के अटॉर्नी जनरल गुलाम ई वाहनवती की रिपोर्ट है, जिसमें उन्होंने जन्मतिथि विवाद पर अपनी ओपिनियन दी है. फाइल संख्या एफटीएस नंबर 1293/एलएस/11/डेट 11/5/2011 में वह लिखते हैं, मैंने रक्षा मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेटरी (जी एंड एआईआर) द्वारा 6 मई, 2011 को भेजे गए नोट और अन्य ज़रूरी नोट जैसे फाइल संख्या 23 (10)/2011, बी/एमएस नंबर 11 (9) 2007, जिसमें सभी संबंधित दस्तावेज हैं, को ध्यान से देखा. वाहनवती ने इस विवाद पर क्या ओपिनियन दी, सरकार ने इसके बारे में किसी को बताना ज़रूरी नहीं समझा. पांच सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों ने भी वाहनवती की ओपिनियन को देखना और पढ़ना चाहा, लेकिन सरकार ने इस ओपिनियन को टॉप सीक्रेट बना दिया. चौथी दुनिया के पास रक्षा मंत्रालय की यह टॉप सीक्रेट फाइल मौजूद है. 16 मई, 2011 को गुलाम ई वाहनवती की ओपिनियन उनके हस्ताक्षर के साथ मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड जस्टिस को भेजी गई, जहां से 16 तारी़ख को ही उसे रक्षा मंत्रालय भेज दिया गया. रक्षा मंत्रालय पहुंचते ही यह ओपिनियन टॉप सीक्रेट घोषित कर दी जाती है. इस पर लिखा है, डिफेंस सेक्रेटरी ऑफिस, डायरी नंबर-6046+5 फोल्डर्स.., डेट-8 मई 2011, कन्वर्टेड टू टॉप सीक्रेट, नंबर-48/टीएस/ डिफे.सेक्रेटरी/2011. इसके बाद इस रिपोर्ट (ओपिनियन) पर रक्षा सचिव प्रदीप कुमार ने अपने नोट में 18 मई को लिखा कि कृपया रक्षा मंत्री इस ओपिनियन पर ध्यान दें. इसके बाद 19 मई को इस ओपिनियन पर रक्षा मंत्री अपना नोट लिखते हैं कि इस ओपिनियन को प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा जा सकता है.

गुलाम ई वाहनवती की ओपिनियन उनके हस्ताक्षर के साथ मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड जस्टिस को भेजी गई, जहां से 16 तारी़ख को ही उसे रक्षा मंत्रालय भेज दिया गया. रक्षा मंत्रालय पहुंचते ही यह ओपिनियन टॉप सीक्रेट घोषित कर दी जाती है. इस पर लिखा है, डिफेंस सेक्रेटरी ऑफिस, डायरी नंबर-6046+5 फोल्डर्स.., डेट-8 मई 2011, कन्वर्टेड टू टॉप सीक्रेट, नंबर-8/टीएस/डिफे.सेक्रेटरी/2011.

इस ओपिनियन को टॉप सीक्रेट घोषित करने के बाद सरकार के एक महत्वपूर्ण अधिकारी ने किसी एक आदमी से कहा कि आप आरटीआई का इस्तेमाल करें, हम आपको यह फाइल उपलब्ध करा देंगे. किसी ने आरटीआई डाली और अंत में टॉप सीक्रेट घोषित हो चुकी यह फाइल सार्वजनिक कर दी गई. अब सवाल उठता है कि यह टॉप सीक्रेट फाइल रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने आरटीआई के तहत किसी को कैसे दे दी? क़ानूनन ऐसा नहीं किया जा सकता था और फिर ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट के तहत भी टॉप सीक्रेट दस्तावेज को आरटीआई के तहत नहीं दिया जाता. ज़ाहिर है, इन अधिकारियों ने क़ानून तोड़ने का काम किया है और वाहनवती की ओपिनियन को सार्वजनिक करने के पीछे उनका अपना इंटरेस्ट काम कर रहा था. ध्यान देने की बात है कि अपनी ओपिनियन में अटॉर्नी जनरल वाहनवती ने बताया है कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि में संशोधन तर्कसंगत नहीं होगा और इस स्टेज पर इस मुद्दे को किसी भी आधार पर फिर से नहीं खोला जा सकता है. जबकि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस जे एस वर्मा, चीफ जस्टिस जी वी पटनायक, चीफ जस्टिस वी एन खरे ने जनरल वी के सिंह की जन्म तिथि पर अपनी राय देते हुए उनकी असल जन्मतिथि 10 मई, 1951 ही मानी थी. जबकि सरकार चाहती है कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि 10 मई, 1950 मानी जाए, ताकि वह अपनी पसंद का नया सेनाध्यक्ष नियुक्त कर सके. ज़ाहिर है, टॉप सीक्रेट दस्तावेज को सार्वजनिक करके रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने क़ानून का उल्लंघन किया है. साथ ही नेचुरल लॉ को भी ग़लत साबित करने का अपराध किया है. नेचुरल लॉ यह कहता है कि जन्मतिथि वही सही है, जो किसी के जन्म के समय दर्ज की गई हो या हाईस्कूल के सर्टिफिकेट में दर्ज हो.

टॉप सीक्रेट फाइल रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने आरटीआई के तहत किसी को कैसे दे दी? क़ानूनन ऐसा नहीं किया जा सकता था और फिर ऑफिसियल सीक्रेट एक्ट के तहत भी टॉप सीक्रेट दस्तावेज को आरटीआई के तहत नहीं दिया जाता. ज़ाहिर है, इन अधिकारियों ने क़ानून तोड़ने का काम किया है.

शुरू में जब चौथी दुनिया ने जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि के विवाद से जुड़ी सच्चाई और असली जन्मतिथि के बारे में पड़ताल शुरू की तो उससे साबित हुआ कि इस पूरे मामले में सरकार जनरल को निशाना बना रही है और सच्चाई की अनदेखी कर रही है. चौथी दुनिया ने जब इस सरकारी घपलेबाज़ी को छापना शुरू किया, तब कुछ मीडिया वाले सरकार से मिल गए और पूरे माहौल को जनरल के खिला़फ बनाने की कोशिश में जुट गए. देश की एक महत्वपूर्ण और अपनी पसंदीदा न्यूज एजेंसी (पीटीआई) के एक वरिष्ठ संवाददाता से रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि जैसे हम बता रहे हैं, वैसे आरटीआई डालो. सेलेक्टिव सब्जेक्ट पर आरटीआई डाली गई और ऐसी-ऐसी खबरें निकाली गईं, जिनसे जन्मतिथि विवाद पर नेचुरल लॉ की उपेक्षा हुई. इंडिया टुडे पत्रिका ने भी सितंबर के अंक में लाइज ऑफ द जनरल के नाम से लेख छापा. दावा किया गया कि आरटीआई से मिले दस्तावेज के आधार पर यह लेख लिखा गया है, लेकिन चौथी दुनिया इस विवाद से जुड़ी सच्चाई को प्रमुखता से सामने लाता रहा. इसके बाद कई वरिष्ठ पत्रकार आगे आए. मेल टुडे के संपादक भारत भूषण ने अपनी संंपादकीय और लेखों के ज़रिए इस मुद्दे पर एक स्टैंड लिया और सरकार के उस तर्क को ़खारिज़ कर दिया, जिसमें कहा गया था कि जन्मतिथि में बदलाव से नए सेनाध्यक्ष की नियुक्ति पर असर पड़ेगा. आउटलुक पत्रिका ने भी रिटायर्ड मेजर जनरल जी डी बख्शी के लेख को प्रमुखता से छापा. इसमें जी डी बख्शी सरकार पर सवाल उठाते हुए लिखते हैं कि ऐसी हालत में, जबकि करोड़ों की आर्म्स डील पेंडिंग है, तिब्बत में चीन अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप कर रहा है, रक्षा मंत्रालय जनरल वी के सिंह को निशाना बना रहा है. पूर्व मिलिट्री इंटेलिजेंस अधिकारी एवं इंडियन डिफेंस रिव्यू के एसोसिएट एडिटर आर एस एन सिंह ने भी कई पत्रिकाओ में इस मुद्दे पर अपने विचार रखे. फर्स्ट पोस्ट में प्रकाशित एक लेख में वह सरकार और मीडिया के कुछ हिस्से द्वारा भारतीय थलसेना को राजनीति का शिकार बनाने का आरोप लगाते हैं.

दरअसल, जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि के विवाद में सरकार जानबूझ कर खुद को फंसाती जा रही है और धीरे-धीरे एक ऐसे विवाद में भागीदार बन गई है, जिसमें कोई तथ्य ही नहीं है. चौथी दुनिया की पड़ताल बताती है कि जनरल की जन्मतिथि 10 मई, 1951 है. ऐसा जनरल वी के सिंह के हाईस्कूल सर्टिफिकेट से लेकर सेना के एडजुटेंट जनरल ब्रांच के पास उपलब्ध जनरल से जुड़े सभी दस्तावेजों में दर्ज है. एजी ब्रांच ही सेना के अधिकारियों से जुड़े दस्तावेजों की कस्टोडियन होती है. बहरहाल, सरकार इस देश की बाकी संस्थाओं के साथ जो रवैया अपनाती है, वही वह भारत की थलसेना के साथ अपना रही है. सरकार वर्तमान थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह के खिलाफ जिस साजिश को अंजाम देने की कोशिश कर रही है, उससे एक गलत संदेश तो सेना को मिल ही रहा है, साथ ही सेना में इस चीज को लेकर रोष भी है. जरूरत इस बात की है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के पांच पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की राय को महत्व देते हुए इस विवाद को शीघ्र समाप्त करने की कोशिश करे.

क्या है पूरा मामला

चौथी दुनिया ने पड़ताल के बाद यह बताया था कि जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि का विवाद जनरल जे जे सिंह और जनरल दीपक कपूर ने जानबूझ कर पैदा किया. 2006 की बात है. जनरल जे जे सिंह को मालूम था कि जन्मतिथि 10 मई, 1950 हो या 10 मई, 1951, जनरल वी के सिंह चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ तो बनेंगे ही, लेकिन जनरल वी के सिंह की जन्मतिथि अगर 10 मई, 1951 रह जाती है तो लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ नहीं बन पाएंगे. हां, लेफ्टिनेंट जनरल के टी परनायक नए सेनाध्यक्ष बन जाएंगे. इसलिए जनरल जे जे सिंह ने लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह को देश का थल सेनाध्यक्ष बनाने की बिसात 2006 में बिछा दी. वी के सिंह की जन्मतिथि सभी सबूतों के अनुसार 10 मई, 1951 है. उनकी जन्मतिथि पर जल्दबाज़ी में फैसला इसलिए लिया गया, क्योंकि चौथी दुनिया ने यह सारी कहानी छाप दी थी. यह फैसला इसलिए भी लिया गया, ताकि एक ईमानदार जनरल को जल्द से जल्द उसके पद से हटाया जा सके, साथ ही एक ईमानदार और बेदाग़ लेफ्टिनेंट जनरल को नया सेनाध्यक्ष बनने से रोका जा सके. ज़ाहिर है, इस फैसले के पीछे अंतरराष्ट्रीय हथियार माफिया भी हो सकता है, जिसे ईमानदार सैन्य अधिकारियों से नुकसान पहुंचता है. नतीजतन, दबाव बनाने की बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है, जिसमें मीडिया और डिफेंस जर्नलिस्ट भी शामिल हो सकते हैं. इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह पूछा कि क्या भारत के थल सेनाध्यक्ष पद के भावी उम्मीदवार लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह की बहू यानी दुबई में काम करने वाले उनके बेटे की पत्नी पाकिस्तान की नागरिक है? अंबिका बनर्जी ने अपने खत के ज़रिए प्रधानमंत्री को यह भी बताया कि कश्मीर में कैसे दुकानों के आवंटन में धांधली हुई और कैसे लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह उस मामले में शामिल थे, लेकिन प्रधानमंत्री ने उस खत का जवाब नहीं दिया. अंग्रेजी के एक मशहूर साप्ताहिक ने रिपोर्ट छापी है कि जब यह कांगो में भारतीय शांति सेना के चीफ थे तो वहां रहे कुछ सिपाहियों और अफसरों पर यौन शोषण का आरोप लगा था, जिसकी जांच भारतीय सेना कर रही है. इसके अलावा जब बिल क्लिंटन राष्ट्रपति के रूप में भारत आए तो कश्मीर के छत्तीसिंह पुरा में सिखों की हत्याएं हुई थीं. जांच में पता चला कि इसमें का़फी संदेह है कि ये हत्याएं आतंकवादियों ने की हैं. जब जांच की बात आई, तब आरोपियों को बचाने और इस मामले की अनदेखी का आरोप भी लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह पर ही लगा. सवाल यह उठता है कि आ़िखर ऐसी कौन सी वजह है कि इतने गंभीर आरोपों में घिरे होने के बाद भी लेफ्टिनेंट जनरल बिक्रम सिंह को प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री भावी सेनाध्यक्ष बनाना चाहते हैं?

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