चीन की सरकार डर गई है

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वर्ष 2010-11 दुनिया के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली की समृद्धि के लिए हुई क्रांतियों का गवाह रहा है. इस दरम्यान न सिर्फ आंदोलनकारी चर्चा में रहे, बल्कि कथित तानाशाह शासक भी. चीन में भी लोकतंत्र की बहाली के लिए जमीन तैयार की जा रही है. इसके लिए रणनीति मुख्य रूप से तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा एवं चीनी मानवाधिकार कार्यकर्ता तैयार कर रहे हैं, जिन्हें अमेरिका एवं भारत जैसे कुछ देशों का परोक्ष समर्थन भी प्राप्त है. लू श्याबाओ समर्थक मानवाधिकार कार्यकर्ता और दलाई लामा लोकतंत्र की स्थापना के लिए चीन के विरुद्ध न केवल बाहर, बल्कि देश के अंदर भी जनमत तैयार करने में लगे हुए हैं. यही वजह है कि चीन सरकार द्वारा उन्हें रोकने के लिए की जा रही तमाम कोशिशों के बावजूद उनका काम है. हाल में दलाई लामा ने  अफ्रीका में वीडियो लिंक के जरिए चीन के खिलाफ जमकर आग उगली.

मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में हो रहे राजनीतिक परिवर्तनों ने चीनी नेताओं को भी डरा दिया है. उन्हें इस बात का डर है कि कहीं चीन में भी ऐसा कोई आंदोलन शुरू न हो जाए. चीन में पहले भी लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन हुए, लेकिन सरकार ने उन्हें बेरहमी से कुचल दिया. चीन सरकार को फिर से वही आशंका है. इसलिए हर विरोधी स्वर दबाया जा रहा है. लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है, उन्हें हिरासत में लिया जा रहा है और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है.

दरअसल, दलाई लामा नोबेल पुरस्कार विजेता आर्चबिशप डेसमंड टूटू का जन्मदिन मनाने दक्षिण अफ्रीका जाने वाले थे, लेकिन बाद में उन्हें अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी, क्योंकि दक्षिण अफ्रीका सरकार ने समय रहते उन्हें वीज़ा नहीं दिया. उसने ऐसा चीन के दबाव में किया. हालांकि दक्षिण अफ्रीका कहता है कि उस पर चीन का कोई दबाव नहीं था. दोनों नोबेल पुरस्कार विजेताओं के बीच यूनिवर्सिटी ऑफ़ द वेस्टर्न केप में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बातचीत हुई. दलाई लामा यहीं पर डेसमंड टुटू के 80वें जन्मदिवस पर भाषण देने वाले थे. जब दलाई लामा को वीजा नहीं दिया गया तो आर्चबिशप ने दक्षिण अफ्रीका सरकार की तीखी आलोचना की. उन्होंने कहा कि वीज़ा न देना रंगभेद से भी खराब है. दक्षिण अफ्रीकी संसद के बाहर भी विरोध प्रदर्शन हुए. पिछले दो वर्षों में यह दूसरी बार है, जब दक्षिण अफ्रीका में दलाई लामा का दौरा रद्द हुआ. चीन दलाई लामा को एक ख़तरनाक पृथकतावादी मानता है, जो तिब्बत को चीन से अलग करना चाहता है. जबकि दलाई लामा बार-बार कहते हैं कि उनका मकसद तिब्बत को स्वायत्तता दिलाना है, आज़ादी नहीं. नोबेल पुरस्कार विजेता डेसमंड टूटू से चर्चा में लामा ने कहा कि सच बोलकर उन्होंने चीन को असहज महसूस कराया है. कुछ चीनी अधिकारी मुझे दैत्य कहते हैं. ज़ाहिर है, कुछ लोग इस दैत्य से डरते हैं. जो लोग सच बोलते हैं, उनसे चीन असहज महसूस करता है. लामा के वक्तव्य से चीन के हालात के प्रमाण मिल रहे हैं. इसके अलावा शांति के नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा समेत कई नेताओं ने चीन से लू श्याबाओ की रिहाई की अपील की. लू श्याबाओ को पिछले वर्ष शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नोबेल शांति पुरस्कार समिति ने कुछ दिनों पहले ही इस वर्ष के विजेताओं के नामों की भी घोषणा कर दी, पर लू श्याबाओ के जीवन में कुछ नहीं बदला. अक्टूबर 2010 से वह जेल में हैं और सत्ता को नुकसान पहुंचाने के जुर्म में 11 वर्ष की सज़ा काट रहे हैं. श्याबाओ को नोबेल पुरस्कार देते समय सोचा गया होगा कि इससे इस मानवाधिकार कार्यकर्ता के जीवन में कुछ बदलाव आएगा, उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाएगा अथवा उनकी सजा कम कर दी जाएगी, लेकिन हुआ इसके विपरीत. उन पर और भी कड़ी नजर रखी जाने लगी. उनकी पत्नी लूशिया को घर में ही नज़रबंद करके रखा गया है. कई चीनी सामाजिक कार्यकर्ता सरकार के निशाने पर हैं. ऐसा भी नहीं है कि चीन में मानवाधिकारों पर बहस ख़त्म हो गई हो. लू श्याबाओ समर्थक मानवाधिकार कार्यकर्ता देश में लोकतंत्र के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए अभियान छेड़े हुए हैं. लू श्याबाओ को वर्ष 2009 में क्रिसमस के दिन सज़ा सुनाई गई थी. उनका जुर्म था राजनीतिक बदलाव की पैरवी करने वाले एक घोषणापत्र को लिखने में सहायता देना. वह 20 वर्षों से इन मुद्दों पर आवाज़ उठाते आए थे, लेकिन उस वक्त वह चर्चित नहीं थे. उनके द्वारा लिखे घोषणापत्र और फिर उन्हें सुनाई गई कड़ी सज़ा ने अचानक उन्हें दुनिया की नज़रों में जगह दे दी. संयोगवश यह उस समय हुआ, जब नोबेल शांति पुरस्कार समिति चीन सरकार के ख़िलाफ आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ता की तलाश कर रही थी. समिति के स्थायी सचिव गीर लुंडेस्टैड ने कुछ दिनों पहले कहा था कि अपने अनुभवों से हम जानते थे कि चीन में सत्ता विरोधी स्वर बंटे हुए हैं. एक तरीके से चीन सरकार ने हमारे लिए फैसला आसान कर दिया. पुरस्कार की घोषणा होने तक लू श्याबाओ की पत्नी लूशिया नियमित रूप से उनसे जेल में मिलने जाती थीं, लेकिन फिर सब बदल गया. लूशिया अचानक ग़ायब हो गईं. बीजिंग में उनके घर के बाहर कड़ा पहरा हो गया. मनमानी नज़रबंदी पर संयुक्त राष्ट्र के वर्किंग ग्रुप ने पिछले वर्ष जब सवाल उठाए तो चीन सरकार ने कहा कि लूशिया पर कोई क़ानूनी रोक-टोक नहीं है, लेकिन चीन सरकार के इस कथन पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि लू श्याबाओ को पुरस्कार दिए जाने की घोषणा के बाद से उनकी पत्नी लूशिया सार्वजनिक स्थानों पर नहीं दिखाई देतीं. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और इंटरनेट के माध्यम से अपना विरोध प्रकट करने वालों के लिए ज़िंदगी काफी कठिन हो गई है.

मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में हो रहे राजनीतिक परिवर्तनों ने चीनी नेताओं को भी डरा दिया है. उन्हें इस बात का डर है कि कहीं चीन में भी ऐसा कोई आंदोलन शुरू न हो जाए. चीन में पहले भी लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन हुए, लेकिन सरकार ने उन्हें बेरहमी से कुचल दिया. चीन सरकार को फिर से वही आशंका है. इसलिए हर विरोधी स्वर दबाया जा रहा है. लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है, उन्हें हिरासत में लिया जा रहा है और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है. चाइनीज ह्यूमन राइट डिफेंडर के मुताबिक, एक चीनी नागरिक को पहली बार शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किए जाने से देश में मानवाधिकारों की स्थिति बदलेगी. हाल की घटनाओं से यही लगता है कि चीन सरकार डर गई है, उसे अब दलाई लामा से पहले से अधिक डर लगने लगा है. इसलिए वह दलाई लामा को भी भारत में ही कैद कर देना चाहता है. दक्षिण अफ्रीका सरकार द्वारा उन्हें वीजा उपलब्ध न कराना इसका ताजा उदाहरण है.

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