कमल मोरारका का ब्‍लॉगः मुंबई को दिल्ली का अनुकरण करने की ज़रूरत है

  • Sharebar

भ्रष्टाचार मौजूदा समय का सबसे बड़ा मुद्दा है, जिसने देश के सभी लोगों को परेशानी में डाल दिया है. हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में इसकी चपेट में है. इस समस्या से तब तक नहीं निपटा जा सकता, जब तक कि इसकी वजह की पहचान कर उसे समाप्त करने की कोशिश नहीं की जाएगी. कहा भी गया है कि किसी रोग को तब तक ठीक नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके कारण की पहचान कर उसका निदान नहीं किया जाता. निचले स्तर पर बढ़ रहे भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए शीला दीक्षित सरकार ने एक घोषणा की है, जिसके अनुसार सरकारी विभागों में कौन सा काम कितने दिनों में होना चाहिए, इसके लिए समय निर्धारित किया जाएगा. जिन विभागों से जनता का सरोकार ज़्यादा है, उनमें यह नियम पहले लागू किया जाएगा.

आम जनता जिस भ्रष्टाचार का शिकार है, उसे ऐसे सुधारों के माध्यम से कम तो ज़रूर किया जा सकता है, भले ही पूरी तरह ख़त्म न किया जा सके. सभी प्रकार के भ्रष्टाचार काम रोकने या किसी भी वस्तु के कृत्रिम अभाव के कारण होते हैं. यदि इन दोनों पर काबू पाया जा सके तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल नहीं है. सबसे पहले उन भ्रष्टाचारों पर नियंत्रण ज़रूरी है, जिनसे जनता का सीधा संबंध होता है. दूसरे तरह के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए अन्य उपाय किए जा सकते हैं, लेकिन अभी जिसकी ज़रूरत है, उसे लागू किया जाना चाहिए.

दिल्ली सरकार ने यह भी कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी विभाग से कोई दस्तावेज़ चाहिए और वह विभाग संबंधित दस्तावेज़ निर्धारित समय सीमा के भीतर नहीं देता है तो संबंधित अधिकारी को जुर्माना देना होगा, जो उसके वेतन से काट लिया जाएगा. भ्रष्टाचार मिटाने के लिए शीला दीक्षित सरकार द्वारा उठाया गया यह क़दम सराहनीय है. एक सामान्य आदमी इस बात को जानता है कि उसे अपने परिवार को ख़ुश रखने के लिए, बच्चों को सही शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रतिदिन कम से कम दस घंटे काम करना पड़ेगा. दस घंटे काम करके ही वह इतना कमा सकता है, जिससे वह एक सामान्य स्तर का जीवन जी सके, लेकिन वहीं पर वह देखता है कि उसका पड़ोसी आसान तरीक़े से उससे कई गुना ज़्यादा पैसा कमा रहा है, क्योंकि उसके पास कुछ ऐसे अधिकार हैं, जो भ्रष्ट तरीक़े से धन कमाने के लिए काफी हैं. यह बात उस व्यक्ति को गुस्सा दिलाती है, जो दस घंटे प्रतिदिन काम करके किसी तरह अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहा है.

भ्रष्टाचार तो हल्का शब्द है, लेकिन एक ईमानदार आदमी हिंदी में इसे हराम की कमाई कहता है, जिसे सुनकर भ्रष्टाचारियों के भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मुंबई में भी दिल्ली की तरह प्रावधान होना चाहिए. वहां भी जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र, राशनकार्ड एवं ड्राइविंग लाइसेंस आदि के लिए एक समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए, जिसके भीतर लोगों को ये सब उपलब्ध हो सकें. यदि निर्धारित समय के भीतर काम नहीं होता है तो संबंधित अधिकारी पर जुर्माना लगाया जाए, जिसे उसके वेतन से काटा जाए. यह तरीक़ा भ्रष्टाचार मिटाने के किसी भी अन्य तरीक़े से ज़्यादा प्रभावी हो सकता है. कोई भी कर्मचारी किसी आदमी को इसीलिए परेशान करता है या उसका काम लटकाए रखता है, ताकि वह उससे पैसा ले सके. दिल्ली जैसा प्रावधान हो जाने से उल्टा हो जाएगा और रिश्वत के लालच में लोगों को परेशान करने वाले कर्मचारियों को ख़ुद ही नुक़सान उठाना पड़ेगा. यह कोई मुश्किल काम नहीं है, जिसे किया न जा सके.

प्रत्येक संस्था के अधिकारी को अपने यहां हो रहे भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए. अगर वह सही रहेगा तो उसके मातहत काम करने वाले कर्मचारी ख़ुद-बख़ुद ठीक हो जाएंगे. समस्या यह है कि अधिकारी या तो ख़ुद भ्रष्ट होते हैं या कमज़ोर, फिर वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को भ्रष्टाचार करने से कैसे रोक पाएंगे. काम करने के तरीक़े में परिवर्तन करना ज़रूरी है. निजी संस्थाओं में क्यों ज़्यादा प्रभावी ढंग से काम होता है. इसका कारण यही है कि जो अधिकारी होते हैं, उन पर इस बात की ज़िम्मेदारी होती है कि वे अपने सहायकों से कैसे काम लें. उस अधिकारी की अपनी नौकरी भी ख़तरे में पड़ जाएगी, अगर वह अपने मातहतों से सही ढंग से काम नहीं लेता है, लेकिन सरकारी विभागों में ऐसा नहीं है. वहां एक बार जिसकी नौकरी लग गई, उसे हटाना का़फी मुश्किल होता है. नौकरी की ऐसी सुरक्षा उन अधिकारियों के लिए नहीं होनी चाहिए, जिनके पास निर्णय का अधिकार हो. अगर सरकार के उन विभागों में सुधार किए जाएं, जिनसे जनता का अधिक वास्ता होता है तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है. आम जनता जिस भ्रष्टाचार का शिकार है, उसे ऐसे सुधारों के माध्यम से कम तो ज़रूर किया जा सकता है, भले ही पूरी तरह ख़त्म न किया जा सके. सभी प्रकार के भ्रष्टाचार काम रोकने या किसी भी वस्तु के कृत्रिम अभाव के कारण होते हैं. यदि इन दोनों पर काबू पाया जा सके तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल नहीं है. सबसे पहले उन भ्रष्टाचारों पर नियंत्रण ज़रूरी है, जिनसे जनता का सीधा संबंध होता है. दूसरे तरह के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए अन्य उपाय किए जा सकते हैं, लेकिन अभी जिसकी ज़रूरत है, उसे लागू किया जाना चाहिए.

चौथी दुनिया के लेखों को अपने ई-मेल पर प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए बॉक्‍स में अपना ईमेल पता भरें::

Leave a Reply

कृपया आप अपनी टिप्पणी को सिर्फ 500 शब्दों में लिखें