नंदा देवी महोत्सव : हर तरफ मां के जयकारे की गूंज

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उत्तराखंड के कई हिस्सों में नंदा देवी का उत्सव काफी धूमधाम से मनाया जाता है. नैनीताल में भी इस वर्ष 108वां उत्सव मनाया गया. ऐसी मान्यता है कि कंस ने जब देवकी की आठवीं संतान को मारने के लिए उसे उठाया तो वह ग़ायब हो गई और हिमालय में जाकर बस गई. उसी को बाद में नंदा के नाम से जाना गया. इसीलिए हिमालय की इस 7816 मीटर ऊंची चोटी का नाम नंदा देवी चोटी पड़ गया. यह उत्सव भादों के महीने में पंचमी से दशमी तक मनाया जाता है, जिसके लिए पहले मां को पारंपरिक लोक गीतों के साथ निमंत्रण दिया जाता है. फिर नज़दीक के किसी एक गांव का चयन किया जाता है और पंचमी के दिन वहां जाकर केले का एक पेड़ छांटा जाता है. पेड़ का चयन भी कुछ विशेष नियमों के तहत किया जाता है. षष्ठी के दिन केले के पेड़ की वैदिक विधि से पूजा की जाती है और उसे नगाड़े और बैंड बाजे के साथ पूरे शहर में घुमाया जाता है.

सप्तमी के दिन मूर्तियां बनाने का काम शुरू किया जाता है. मूर्तियां बनाने में 12 से 14 घंटे तक लग जाते हैं. मूर्तियां बनाने के लिए बांस की खप्पिचयों के ऊपर लुगदी लगाकर चेहरा बनाया जाता है. फिर रंगा हुआ कपड़ा चिपका कर आंख, नाक और मुंह को उभारा जाता है. केले के पेड़ की डंडियों को साफ करके उसके सफेद कपड़े में इन चेहरों को लपेटा जाता है और फिर उसके सहारे मूर्तियों को खड़ा किया जाता है, जो इसका सबसे अहम कार्य होता है. जब ये सारे कार्य हो जाते हैं तो उसके बाद मूर्तियों को गहनों से सजाया जाता है और उन्हें डोलों में रख दिया जाता है. मूर्तियां बनाने वाले कलाकार पीढ़ी दर पीढ़ी यह कार्य करते चले आ रहे हैं और इस कार्य के लिए पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं. ऐसा माना जाता है कि मूर्तियों के चेहरे का आकार नंदा देवी चोटी से मेल खाता हुआ दिखता है. हालांकि नैनीताल में बनाई जाने वाली मूर्तियों में अब काफी बदलाव आ गया है, पर कुछ स्थानों पर आज भी पारंपरिक तरीक़े से ही मूर्तियां बनाई जाती हैं. अष्टमी के दिन पूजा करके मूर्तियों को स्थापित कर दिया जाता है. यह पूजा सुबह चार बजे से शुरू हो जाती है. उसके बाद मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाता है. मूर्तियां कुछ दिनों तक मंदिर में ही रहती हैं. इस दौरान कई जगह शस्त्र पूजा भी की जाती है और मंदिर में प्रतिदिन एक बकरे की बलि दी जाती है. पहले से भैंस की बलि दी जाती थी, पर अब उसे बंद कर दिया गया है. अंतिम दिन मूर्तियों की पूजा करके उनका डोला पूरे शहर में घुमाया जाता है और शाम को उनकी पूजा करके उन्हें झील में विसर्जित कर दिया जाता है. इसके साथ ही उत्सव का भी समापन हो जाता है. इस दौरान एक मेला भी लगता है, जिसमें बाहर से आए व्यापारी भी अपनी दुकानें लगाते हैं. कई दुकानदार तो ऐसे होते हैं, जो साल भर जगह-जगह के मेलों में जाकर ही दुकानें लगाते हैं और अपनी आजीविका इसी तरह चलाते हैं. नैनीताल के अलावा अल्मोड़ा, बागेश्वर, भवाली, चंपावत एवं रानीखेत आदि में भी यह उत्सव काफी धूमधाम से मनाया जाता है. अल्मोड़ा में यह उत्सव लगभग साढ़े तीन सौ साल से मनाया जा रहा है.

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