पाकिस्तान की विदेश नीति भारत को केंद्र में रखकर बनाई जाती है. उसने यह सोच रखा है कि जो भारत के हित में हो, वह उसका विरोध करेगा, चाहे उसके हित में हो अथवा नहीं. लेकिन उसे अभी तक यह समझ में नहीं आ रहा है कि केवल भारत को कमज़ोर करने के लिए वह जो कर रहा है, उससे सबसे ज़्यादा नुकसान उसी को हो सकता है. अभी कुछ दिनों पहले भारत के थलसेना अध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने कहा कि पाक अधिकृत कश्मीर में 4000 चीनी मौजूद हैं, जिनमें सैनिक भी हैं. हालांकि जनरल सिंह के इस बयान का पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने खंडन किया. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तहमीना जंजुआ ने एक पत्रकार वार्ता में कहा कि आजाद कश्मीर में जो काम हो रहा है, वह केवल विकास के लिए है और उसमें चीन के आम शहरी भाग ले रहे हैं, न कि सैनिक. तहमीना ने यह भी कहा कि उन्होंने जनरल सिंह का बयान नहीं सुना. जनरल सिंह ने यह भी कहा था कि पाक अधिकृत कश्मीर में निर्माण कार्यों में जो चीनी इंजीनियर लगे हुए हैं, उनका संबंध सेना से है और ऐसा भारतीय सेना में भी होता है कि इंजीनियरों के पास लड़ाकू क्षमता होती है. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि पाक अधिकृत कश्मीर में काम करने वाले इंजीनियर चीनी सेना से जुड़े हुए हैं. भारतीय सेनाध्यक्ष के बयान पर अविश्वास करने की कोई वजह नहीं दिखाई देता, लेकिन पाकिस्तान इंकार करता है कि इस इलाके में चीनी सैनिक नहीं हैं, यह सोचने की बात है. आखिर पाकिस्तान ने ऐसा क्यों कहा, क्या उसे जनरल सिंह के बयानों का खंडन करने की आवश्यकता थी.
अब प्रश्न यह है कि पाकिस्तान में चीनी सैनिकों की उपस्थिति से नुकसान किसे है. भारत को इससे चिंतित नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह तय है कि अगर भविष्य में कभी भी भारत विरोधी गतिविधियों के लिए चीन को पाकिस्तान की आवश्यकता होगी तो पाकिस्तान चीन के प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं करेगा, लेकिन पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि चीन को अपने यहां प्रश्रय देना उसके लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है.
पहली बात तो यह है कि जिस कश्मीर में चीनी सैनिक होने की बात जनरल ने कही, उसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है. अगर वह आजाद है तो फिर उसकी तरफ से पाकिस्तान ने ऐसा क्यों कहा कि वहां चीनी सेना नहीं है. आजाद कश्मीर के प्रतिनिधियों की तरफ से अगर यह कहा जाता तो बात कुछ और थी. इस बयान से पाकिस्तान ने यह साबित किया है कि कश्मीर का वह हिस्सा आजाद नहीं है, बल्कि उस पर उसका कब्जा है. भारतीय कश्मीर में रहने वाले पृथकतावादी लोग जो आजाद कश्मीर की बात करते हैं, उन्हें भी पाकिस्तान के इस बयान पर ध्यान देना चाहिए. दूसरी बात यह है कि अगर चीनी सैनिक पाक अधिकृत कश्मीर में हैं तो पाकिस्तान को इस बयान के खंडन की क्या आवश्यकता है. अगर उस क्षेत्र का प्रशासन पाकिस्तान संभालता है और वहां के निर्माण कार्यों में चीन सहयोग कर रहा है तो इसमें बुराई क्या है. अगर चीन अपने इंजीनियरों या अन्य कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए अपने कुछ सैनिक वहां रखता भी है तो इसमें ग़लत क्या है. पाकिस्तान अगर कहता कि चीनी सैनिक अपने कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए हैं, तो भी कोई परेशानी वाली बात नहीं थी. चीनी सैनिक कोई आतंकवादी तो हैं नहीं, जिनकी उपस्थिति की बात से हंगामा हो जाएगा. पाकिस्तान एक संप्रभु देश है और उसे अपनी सीमा के भीतर किसी भी देश के सैनिकों को रखने की पूरी आजादी है, बशर्ते वह कश्मीर के इस क्षेत्र का अपना भाग स्वीकार कर ले.
अब प्रश्न यह है कि पाकिस्तान में चीनी सैनिकों की उपस्थिति से नुकसान किसे है. भारत को इससे चिंतित नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह तय है कि अगर भविष्य में कभी भी भारत विरोधी गतिविधियों के लिए चीन को पाकिस्तान की आवश्यकता होगी तो पाकिस्तान चीन के प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं करेगा, लेकिन पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि चीन को अपने यहां प्रश्रय देना उसके लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है. चीन के जिनजियांग प्रांत में विद्रोह हो रहा है. कुछ दिनों पहले जब इस प्रांत में तुर्कीस्तान इस्लामिक मूवमेंट के लोगों ने आतंकवादी कार्रवाई की थी तो चीन ने पाकिस्तान को चेतावनी दी थी, जिसके बाद पाक के नेताओं के होश उड़ गए थे. अगर चीन के इस प्रांत में पृथकतावादी ताकतें ज्यादा बढ़ जाती हैं और पाकिस्तान के कट्टरपंथी उन्हें समर्थन देते हैं तो ऐसी स्थिति में चीन के प्रकोप का सामना पाकिस्तान को करना पड़ेगा और उस समय पाकिस्तान स्थित चीनी सेना और उसके द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी पाकिस्तान को महंगी पड़ेगी. अंतरराष्ट्रीय राजनीति कब, किस ओर करवट ले लेगी, कहा नहीं जा सकता. पाकिस्तान को भी इस पर ग़ौर करना चाहिए और भारत केंद्रित अपनी विदेश नीति बदलनी चाहिए, वरना इसका खामियाजा उसे ही भुगतना पड़ेगा.
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