अन्ना को समर्थन की वजह

  • Sharebar

पिछले दिनों जब दिल्ली में अन्ना हजारे का अनशन हुआ तो रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ देखकर अचंभा हुआ था. दिल्ली में लाखों लोग एक जगह किसी ख़ास मक़सद को लेकर जमा हो जाएं, यह लगभग अविश्वसनीय था. लेकिन ऐसा हुआ और लोग ख़ुद अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने चले आए. अन्ना के समर्थन में रामलीला मैदान में स़िर्फ दिल्ली की जनता ही नहीं पहुंची थी, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग वहां जमा हुए थे. वहां जाकर मैंने यह समझने की कोशिश की कि ऐसी कौन सी वजह है, जो लोगों को खींचकर ला रही है. लोगों से बातचीत करके कुछ समझ में आया, लेकिन जिस निष्ठा और कनविक्शन के साथ लोग वहां पहुंच रहे थे, उसे समझ नहीं पा रहा था. कई लोगों से बात की. एक मित्र ने बताया कि एक दिन उनकी पत्नी घर से उनके दफ्तर पहुंचीं और रिसेप्शन पर कार की चाबी के साथ एक चिट छोड़ी, जिसमें लिखा था, मैं अन्ना हजारे के आंदोलन में शरीक होने के लिए रामलीला मैदान जा रही हूं. अगर तुमको व़क्तमिले तो मुझे लेने आ जाना, वरना मैं मेट्रो से घर आ जाऊंगी. मैं उन दोनों (पति-पत्नी) को कई वर्षों से जानता हूं. पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करने के बारे में भाभी सोच भी सकती हैं, यह मेरी समझ से परे था. मेरे मित्र ने बाद में बताया कि वह अन्ना इफेक्ट था. इस तरह के कई वाकए मेरे सामने आए तो मेरे मन में यह जानने की जिज्ञासा और प्रबल हो गई कि अन्ना में ऐसा क्या जादू है, जिससे लोग खिंचे चले जाते हैं. कई लोगों से बात की, काफी लेख पढ़े, फिर भी वजह का पता नहीं चल पाया. लेकिन अचानक मेरे ज्ञानचक्षु खुल गए. वाकया बेहद मजेदार है, आप भी सुनिए.

तक़रीबन चार महीने पहले किसी काम की वजह से स्टैंप पेपर ख़रीदना पड़ा था. ग़लत गणित की वजह से तक़रीबन दस हज़ार रुपये के स्टैंप पेपरों की ज़्यादा ख़रीद हो गई. हमें लगा कि पैसे बर्बाद हो गए, लेकिन हमारे वकील ने बताया कि स्टैंप पेपर वापस लौटाने का भी प्रावधान है.

तक़रीबन चार महीने पहले किसी काम की वजह से स्टैंप पेपर ख़रीदना पड़ा था. ग़लत गणित की वजह से तक़रीबन दस हज़ार रुपये के स्टैंप पेपरों की ज़्यादा ख़रीद हो गई. हमें लगा कि पैसे बर्बाद हो गए, लेकिन हमारे वकील ने बताया कि स्टैंप पेपर वापस लौटाने का भी प्रावधान है. उसके लिए एडीएम कार्यालय जाना पड़ेगा. वकील साहब ने आनन-फानन इस बाबत एक आवेदनपत्र तैयार कर दिया और कहा कि इसे एडीएम कार्यालय में जमा करा दीजिए. मैं रजिस्ट्रार कार्यालय से एडीएम कार्यालय पहुंचा. वहां संबंधित बाबू से मिला तो उन्होंने बताया कि जिस वेंडर से स्टैंप पेपर ख़रीदा गया है, उससे प्रमाणित कराकर लाना होगा कि उक्त स्टैंप पेपर उसने ही बेचा है. मैंने उन्हें यह बताने की कोशिश की कि स्टैंप पेपर के पीछे बेचने वाले वेंडर की मुहर लगी है और उसका पूरा पता भी अंकित है, लिहाज़ा फिर से प्रमाणित कराने की आवश्यकता नहीं है. लेकिन बाबू तो ठहरे बाबू, लकीर के फकीर, टस से मस नहीं हुए और फिर अपनी बात दोहरा दी. मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, सो घर लौट आया.

हफ्ते भर बाद जब दफ्तर से साप्ताहिक अवकाश मिला तो सुबह तक़रीबन ग्यारह बजे रजिस्ट्रार कार्यालय पहुंचा. वहां स्टैंप विक्रेता से मिला तो उसने कहा कि दो बजे आइए. मेरे पास इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं था. तपती दोपहरी में कचहरी परिसर में इंतज़ार करता रहा. ठीक दो बजे उसके पास पहुंचा तो उसने वादे के मुताबिक़ स्टैंप पेपर पर लिखकर दे दिया. अब मैं विजेता के भाव से कचहरी परिसर से निकला और तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित एडीएम कार्यालय पहुंचा और वहां बाबू की मेज पर उसी विजयी भाव से स्टैंप पेपर रखा और कहा कि चलिए इसे लौटाने की कार्रवाई शुरू करिए. मेरे उत्साह पर चंद पलों में पानी फेरते हुए उन्होंने कहा कि आप पोस्ट ऑफिस से एक रजिस्ट्री का लिफाफा ख़रीद कर और उस पर अपना पता लिखकर दे दीजिए.

मैं भागकर नीचे पोस्ट ऑफिस पहुंचा, तब तक पोस्ट ऑफिस बंद हो चुका था. मैं हारे हुए योद्धा की तरह बाबू के पास पहुंचा और उनसे बताया कि पोस्ट ऑफिस बंद हो चुका है. बाबू साहब जल्दी में लग रहे थे. उन्होंने बेहद अनौपचारिक अंदाज़ में कहा कि कोई बात नहीं, कल दे जाना. मेरे बहुत अनुरोध करने पर वह इस बात के लिए राजी हो गए कि मैं किसी और से लिफाफा भिजवा दूंगा. मैंने अपने एक मित्र से अनुरोध किया और उनसे वह लिफाफा भिजवा दिया. मेरे मित्र को साहब बहादुर ने बताया कि अब तीन महीने बाद आकर रिफंड ले जाएं. मुझे संतोष हुआ कि चलो तीन महीने बाद पैसे मिल जाएंगे. तब तक कचहरी और एडीएम कार्यालय के चार चक्कर लग चुके थे.

तक़रीबन साढ़े तीन महीने बाद एक दिन मेरी पत्नी ने मुझे याद दिलाया कि हमें स्टैंप पेपर का कुछ रिफंड मिलना है. मैं अगले ही साप्ताहिक अवकाश में एडीएम कार्यालय पहुंचा. बाबू साहब अपनी सीट पर मौजूद थे. मैंने नमस्कार कर अपना नाम बताया. बेहद ही तत्परता से उन्होंने फाइल निकाली और कहा कि मैं अपने किसी परिचय पत्र की फोटो कॉपी उन्हें दूं. मैं मूर्ख-अज्ञानी बग़ैर फोटो कॉपी लिए वहां चला गया था. ख़ैर पास की एक दुकान से फोटो कॉपी कराकर उन्हें सौंप दी. उन्होंने भी मुझे स्टैंप पेपर के पीछे लिखकर दे दिया और कहा कि नीचे की मंजिल पर कोषागार कार्यालय है, वहां जाकर इसे जमा करा दूं. जब मैं उठने को हुआ तो बाबू साहब ने मुझे रजिस्ट्री वाला लिफाफा पकड़ा दिया और कहा कि रख लो, तुम्हारे काम आएगा. मैं हैरान कि अगर वापस ही करना था तो फिर मंगवाया क्यों, लेकिन यह बात पूछने का साहस नहीं था, सो लिफाफा लेकर नीचे उतर आया. नीचे आकर मैं कोषागार के काउंटर पर पहुंचा और वहां मौजूद साहब को स्टैंप पेपर देकर कहा कि मेरा रिफंड दे दीजिए. उन्होंने मेरी तऱफ ऐसे देखा, जैसे मैंने कोई जुर्म कर दिया हो. उन्होंने कहा कि आपके रिफंड का चेक बनेगा और उसके लिए आपको बैंक से अपना दस्तख़त प्रमाणित कराकर लाना पड़ेगा.

मैं झल्ला कर बोला कि अगर आप अकाउंट पेयी चेक बना रहे हैं तो दस्तखत प्रमाणित कराने की क्या ज़रूरत है. बाबू बहस करने के मूड में नहीं था. उसने मुझे सहायक कोषाधिकारी के पास भेज दिया. वहां पहुंचा तो सफारी सूट में एक बुज़ुर्ग शख्स बैठे थे. मैंने उनसे अपनी व्यथा सुनाई और अनुरोध किया कि रिफंड का चेक बनवा दें. उन्होंने बड़े रौब से और एहसान जताने वाले अंदाज़ में कहा कि बैंक से प्रमाणित कराकर ला दीजिए तो दो-एक दिन में चेक बनवा दूंगा. अब तक मेरा धैर्य साथ छोड़ने लगा था. मैंने सहायक कोषाधिकारी से पूछा कि वह किस नियम के तहत ऐसा कर रहे हैं, मुझे नियम दिखाएं. मेरे इतना पूछते ही वह भड़क गए, बोले, पंद्रह साल पहले का शासनादेश है, मैं कहां से लाऊं. बहस होते-होते गर्मागर्मी हो गई. मैंने कहा कि मैं आठ चक्कर लगा चुका हूं, लेकिन अभी तक रिफंड नहीं मिला. लिफाफे की बात भी उन्हें बताई. उनका तर्क था कि मैं उनके विभाग में तो पहली बार आया हूं, इसलिए मेरी नाराज़गी जायज़ नहीं है. वह सरकारी नियमों का हवाला देकर बैंक से दस्तखत प्रमाणित कराकर जमा कराने पर अड़े रहे. इसी बहस के दौरान मैंने उनसे कहा कि आप जैसे लोगों की वजह से ही अन्ना हजारे को अनशन करना पड़ता है. इतना सुनते ही वह ऐसे भड़के,  जैसे सांड को लाल कपड़ा दिखा दिया गया हो. अन्ना के नाम पर ही वह अड़ गए. उनकी इच्छा थी कि मैं अन्ना वाली बात वापस लूं, लेकिन मैं उस पर क़ायम रहा. लाख बहस करने के बाद भी वह नहीं माने. मुझे दो चक्कर और लगाने पड़े, तब जाकर रिफंड का चेक मिला. मेरे घर से कोषागार कार्यालय की दूरी बारह किलोमीटर है. मैं इस चक्कर में बुरी तरह खिन्न हो चुका था, लेकिन इस बात की ख़ुशी थी कि मुझे मेरे प्रश्न का जवाब मिल चुका था कि अन्ना हजारे को समर्थन क्यों मिला और हर तबके के लोग उनके साथ क्यों जुड़े. अन्ना का विरोध करने वालों को न यह वजह समझ में आएगी और न जनता का मिज़ाज.

 (लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

चौथी दुनिया के लेखों को अपने ई-मेल पर प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए बॉक्‍स में अपना ईमेल पता भरें::

8 Responses to “अन्ना को समर्थन की वजह”

  • Sahil Chadha says:

    अन्ना क आन्दोलन की वजह से काफी दफ्तरों में सुधर भी हुआ है! मेरा रतो ऑफिस में काम बिना किसी झंझट क हुआ! ठाणे में फिर भी आराम से हुआ!

  • Vivek Kumar says:

    हा हा … इतनी मेहनत में आप चार बार गोवर्धन परिक्रमा कर लेते.

  • nishar siddiqui says:

    आपकी कहानी अच्छी लगी .. लेकिन उसमें बाबू का क्या दोष ? वह तो नियम के मुताबिक ही काम रहा है .. आपको नियमों की जानकारी होनी चाहिए .. अगर आपको नियमों की जानकारी होती तो आप इतने परेशान नहीं होते .. अगर वही बाबू बगैर नियम के आपका काम कर देता तो वह भ्रष्ट हो जाता .. आपका काम निकल जाता तो वह सही होता .. नहीं तो वह अब ख़राब हो गया .. यह बात सच है कि आज है पूरे देश में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है .. पर इसके लिए भी ज़िम्मेदार हम और आप ही है .. हम ही अधिकारी और बाबू को घूसखोर बनाते है .. ज़रूरत पहले हमें सुधरने की .. गांधी जी ने कहा था .. पहले खुद सुधर जाओ देश अपने आप सुधर जाएगा ..

    • Vivek Kumar says:

      वह बाबू एक बार में सब कुछ बता सकता था… ये बार बार दौडाना क्या है भाई?

  • Raj says:

    आपका रूपया जो किसी नेता की विदेश यात्रा, सुरक्षा या सेवा में खर्च होना था या स्विस बैंक में जाना था आप उसे वापस मांग रहे थे , परेशानी तो होनी ही थी.

  • Himanshu Rattan says:

    एक दिन में इन्कोमे टैक्स ऑफिस में अपना पैसे लेन के लिए गया. इन्कोमे टैक्स ऑफिसर ने मेरे करीब ५ चक्कर पहले ही लगवा दिए थे. जब भी जाओ तो कहते थे की एक हफ्ते या अगले महीने आना. एक दिन मैंने जाकर के बोला पैसे चाहिए तो मुघे ऑफिसर बोलता है मेरी तनख्वा ३० तारिख को मिलेगी तब आना. हमारे बीच में काफी बहस हुई, उसके ऑफिसर ने बोला अपनी बैंक स्तातेमेंट लेकर के आना. रेटूर्ण देते हुए भी मुघे २ चक्कर और लगवा दिए. विदेशों में तो आइसे नहीं होता. सरकारी लोग काम भी नहीं करना चाहते और दौस्रों को परेशान और करते हैं.

  • Praful says:

    Its real and everybody facing the same problem.
    Great post!

  • dr riaz pathan says:

    बहोत खूब कही आपने इस कहानी में …..मुजे आपकी कहानी पढ़कर अच्छा लगा की आप लोग आन्नाजी का आदर करते है और उन्हें समर्थन करते है ….जय हो अन्नाजी जय janlokpal

Leave a Reply

कृपया आप अपनी टिप्पणी को सिर्फ 500 शब्दों में लिखें