शरणार्थी समस्या : सकारात्मक पहल की ज़रुरत

जनसंख्या विस्थापन के क्षेत्र में दक्षिण एशिया का एक अनूठा इतिहास रहा है. यहां युद्ध के बाद लोग या तो अपने देश की सीमाओं से बाहर निकाल दिए गए अथवा वे जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर देश छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. इसके बाद पर्यावरणीय या विकासात्मक प्रक्रिया भी विस्थापन की एक वजह बनी. भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी आज़ादी के दौरान बड़े पैमाने पर विस्थापन की समस्या के गवाह रहे. 1947 के विभाजन के बाद 7.5 मिलियन हिंदू और सिख शरणार्थी पाकिस्तान से भारत आए, वहीं 7.2 मिलियन मुस्लिम शरणार्थियों को भारत से पाकिस्तान में शरण लेनी पड़ी. इतिहास में दर्ज़ यह अब तक का सबसे बड़ा शरणार्थी विस्थापन था. इस व्यापक मानवीय संकट के समय में भी काफी कम अंतरराष्ट्रीय सहायता मिल पाई.

शरणार्थी समस्या के निदान के लिए क्षेत्रीय या राष्ट्रीय साधनों के हिसाब से सबकी राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि शरणार्थियों की समस्या के समाधान की दिशा में सरकारों को मार्गदर्शन देने के लिए एक ख़ास क़ानून होना चाहिए. दक्षिण एशियाई देश मौजूदा अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी क़ानून स्वीकार करना चाहें अथवा वे ख़ुद एक अलग क़ानून बनाएं, लेकिन उनके लिए अब फैसला लेने का व़क्त आ चुका है.

बाद में 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई के समय 10 मिलियन शरणार्थियों ने भारत का रुख़ किया. 1979 में सोवियत संघ के हस्तक्षेप के बाद 3.5 मिलियन अ़फग़ानियों ने पाकिस्तान की शरण ली. ऐसा कहा जाता है कि इनमें 1.2 मिलियन शरणार्थी अभी भी गांवों में रह रहे हैं. 1970-1990 के दौरान बांग्लादेश में म्यांमार के राखिन ज़िले से 3,00,000 मुस्लिम शरणार्थियों की बाढ़ सी आ गई, जिसमें 30,000 शरणार्थी अभी भी वापस नहीं गए हैं. इसी तरह 90,000 नेपाली मूल के भूटानियों को निष्कासित कर दिया गया और उनमें से अधिकतर शरणार्थी नेपाल के झापा ज़िले में अभी भी रह रहे हैं. फिर भी संयुक्त राज्य उच्चायुक्त (शरणार्थी) द्वारा हाल में अधिकांश को तीसरी दुनिया के देशों में बसाया गया है.

तमिलों के बाहृय विस्थापन और सिंहली, तमिल एवं मुस्लिमों के आंतरिक विस्थापन की वजह से ही श्रीलंका को प्राय: शरणार्थी द्वीप कहा जाता है. हालांकि यह शरण देने वाला नहीं, बल्कि शरणार्थी पैदा करने वाले देशों में शुमार होता है. 1983 से श्रीलंका ने लाखों शरणार्थियों को पैदा किया. इसके अलावा 50,000 तमिल शरणार्थी पहले से ही पश्चिम देशों में शरण लिए हुए हैं. तमिलनाडु में शरण लिए अधिकांश श्रीलंकाई शरणार्थियों को स्वेच्छा से वापस भेज दिया गया, लेकिन उत्तर-पूर्व श्रीलंका में चल रहे सुरक्षा संकट की वजह से अभी भी 60,000 से अधिक शरणार्थी वापस जाने से हिचक रहे हैं. 1960 के दशक से ही भारत 1,00,000 से भी अधिक तिब्बती और 50,000 बांग्लादेशी बौद्ध शरणार्थियों की मेज़बानी कर रहा है, जिनमें कुछ ने तो हाल में भारत का रुख़ किया है. भारत ने यूएनएचआरसी को आश्वासन दिया है कि वह मानवीय आधार पर 12,000 अ़फग़ानियों की भी मदद करेगा. मालदीव पहला सार्क देश है, जो न शरणार्थी पैदा करता है और न उन्हें शरण देता है. इन वर्तमान और अतीत के शरणार्थी संकट तथा शरण देने की पुरानी मानवीय परंपरा के बावजूद किसी भी सार्क देश ने 1951 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन या 1967 के प्रोटोकॉल को स्वीकार नहीं किया, जिन्हें दुनिया के 136 देशों में मान्यता मिल चुकी है. फिर भी भूटान और नेपाल के अलावा सभी सार्क देशों ने शरणार्थियों की सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएचसीआर के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहयोग के आधार पर मदद करने का संकल्प दोहराया है. 1951 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन या 1967 के प्रोटोकॉल और सार्क देशों के बीच इस मसले पर असहमति के कारण काफी समान थे. उनका तर्क है कि शरण देने की उनकी परंपरा अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में काफी बेहतर है. कभी-कभी बेहतर संसाधन वाले देशों से भी. इसीलिए वे शरणार्थी मुद्दे से द्विपक्षीय नीति के आधार पर ही निपटेंगे, लेकिन इस समस्या को साझा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायताओं का वे स्वागत करते हैं.

सार्क देशों का यह भी तर्क है कि उत्पीड़क आधारित 1951 का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन या 1967 का प्रोटोकॉल इस क्षेत्र में मौजूदा शरणार्थी समस्या से व्यापक तौर पर निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है. अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी समस्या से निपटने के साधनों को अपर्याप्त बताते हुए वे अफ्रीकी शरणार्थी व्यवस्था, 1958 के अफ्रीकी एकता संगठन सम्मेलन, लैटिन अमेरिकी शरणार्थी और 1984 की कर्टेजेना शरणार्थी घोषणा जैसी व्यवस्था की मांग करते हैं, जो शरणार्थियों को व्यापक रूप से परिभाषित भी करती है. दक्षिण एशिया में शरणार्थी समस्या काफी हद तक स्थायी हो चुकी है. राज्यों द्वारा मानवीय आधार पर इन मसलों का हल न करने की वजह से यह राष्ट्रीय और अंतरराज्यीय सुरक्षा के लिए चिंता का सबब बन चुकी है. चूंकि तकनीकी तौर पर सभी शरणार्थियों को अवैध विस्थापक माना जाता है, इसलिए क़ानूनी तौर पर उनके पास सुरक्षा का कोई अधिकार नहीं होता. इस स्थिति में सार्क देशों द्वारा क्षेत्रीय सम्मेलन या घोषणा प्रासंगिक है. साथ ही इन बुनियादी सवालों पर सहमति, मसलन शरणार्थी की परिभाषा, शरण देने और स्वेच्छा से शरणार्थियों को बसाने जैसी बातें शरण देने वाले राज्यों के वार्ताकारों के बीच तनाव कम करके बातचीत का माहौल बनाने में मददगार साबित होंगी. सार्क शरणार्थी सम्मेलन अथवा घोषणा भी इस क्षेत्र में मानवीय संकट दूर करने की दिशा में एक अहम क़दम साबित हो सकता है. भारत के मामले में उच्च न्यायालयों ने संवैधानिक और मानवाधिकारों के आधार पर शरणार्थियों के मानवीय सरोकार के मसले पर अपनी राय दी है, लेकिन किसी भी सार्क देश में इस मुद्दे पर कोई पहल नहीं हुई है. वर्तमान राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े संदर्भ में प्रत्येक देश शरणार्थी समस्या का अपने द्वारा तय मानकों के हिसाब से समाधान करना चाहता है. हालांकि ये मानक समय और देशों के मुताबिक़ बदलते रहते हैं. शरणार्थी मसले पर एक क्षेत्रीय सम्मेलन या घोषणा द्वारा सार्क देश मौजूदा पारंपरिक मानवीय सहायता नीति को सुधार सकेंगे, साथ ही उन्हें ग़ैर विवादास्पद सिद्धांतों को भी विकसित करने में मदद मिलेगी. ऐसे सम्मेलन अथवा घोषणाओं के दस्तावेज़ इस आधार पर तैयार किए जाएंगे कि वे इस क्षेत्र में शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए उपयुक्त हों और यह सार्क देशों का अपना एक अंतरराष्ट्रीय क़ानून होगा.

शरणार्थी समस्या के निदान के लिए क्षेत्रीय या राष्ट्रीय साधनों के हिसाब से सबकी राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि शरणार्थियों की समस्या के समाधान की दिशा में सरकारों को मार्गदर्शन देने के लिए एक ख़ास क़ानून होना चाहिए. दक्षिण एशियाई देश मौजूदा अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी क़ानून स्वीकार करना चाहें अथवा वे ख़ुद एक अलग क़ानून बनाएं, लेकिन उनके लिए अब फैसला लेने का व़क्त आ चुका है. कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे बहुपक्षीय-क्षेत्रीय स्तर पर आसानी से निपटा जा सकता है. यह पहली बार है, जब दक्षिण एशियाई देशों ने शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए प्रशासनिक उपायों की जगह एक निर्णयात्मक फैसला लिया. इसीलिए इस मसले पर उनके पास एक क़ानून होना अनिवार्य है. शरणार्थियों से संबंधित विशेष क़ानून होने के कारण उक्त देश पहले से उन्हें शरण देते आ रहे हैं. ऐसे में उन्हें इन क़ानूनों को केवल औपचारिक रूप से लागू करने और एक ठोस शक्ल देने की ज़रूरत है. संबंधित क़ानूनों में राष्ट्रीय हितों का विशेष ध्यान रखा जाएगा, ताकि शीत युद्ध के दौरान बनाए गए इन क़ानूनों में बदलाव के तहत इस उप महाद्वीपीय क्षेत्र में शरणार्थियों की वास्तविकता से इसे अधिक प्रासंगिक बनाया जा सके, क्योंकि पहले के क़ानून मौजूदा समय में दक्षिण एशियाई शरणार्थियों की ज़मीनी हक़ीक़त को बयां नहीं करते. बुनियादी और सांगठनिक रूप से शरणार्थियों की समस्या से निपटने के लिए नए क़ायदे-क़ानून क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कस्टम व्यवस्था पर आधारित होंगे. ऐसी व्यवस्था शरणार्थी समस्या से निपटने के लिए अधिक तर्कसंगत होगी. साथ ही इन देशों को अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को निभाने में भी मदद करेगी. यूएनएचसीआर के नेतृत्व में मॉडल नेशनल लॉ और ड्राफ्ट रीज़नल डिक्लेरेशन का मसौदा तैयार किया जाना एक सकारात्मक क़दम है. उम्मीद की जाती है कि दक्षिण एशियाई देश शरणार्थियों से संबंधित विशेष क़ानून पर सकारात्मक रु़ख अपनाने के बाद अपनी आन (प्रतिष्ठा) को त्याग कर उदारता का परिचय देंगे.

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

सौमित्र मोहन

लेखक पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं

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