तेलंगाना : राज्य के नाम पर सियासत

  • Sharebar

नए राज्य बनाने के लिए देश में अब तक कई आंदोलन हो चुके हैं. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इससे स्थानीय लोगों का विकास होगा और कानून व्यवस्था में सुधार भी. कभी सांस्कृतिक एकता की बात की जाती है तो कभी भाषाई एकता की. भाषा के ही नाम पर भारत में राज्यों का गठन हुआ है, लेकिन क्या ये तर्क सही हैं? इतिहास पर नज़र डालें तो इन तर्कों पर विश्वास करने की कोई वजह नहीं मिलती. नए राज्य के गठन से न विकास की गति तेज होती है और न क़ानून व्यवस्था में सुधार. केवल कुछ लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति होती है. राज्य या देश के विभाजन से जनता को कोई लाभ नहीं होता, केवल नेताओं को अपनी राजनीति चमकाने और महत्वपूर्ण पद पाने का मौक़ा मिल जाता है. भारत के विभाजन का कारण भी यही था और राज्यों को विभाजित कर नए राज्य बनाने की वजह भी यही रही है. आंध्र प्रदेश में तेलंगाना को राज्य बनाने के लिए जो आंदोलन हो रहा है, उसके पीछे भी केवल कोरी राजनीति है. विभिन्न राजनीतिक दल और राजनेता अपने फायदे के लिए इसका समर्थन कर रहे हैं या फिर विरोध. कांगे्रस को छोड़कर लगभग सभी राजनीतिक दलों ने तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का समर्थन किया है. ऐसा नहीं है कि उक्त राजनीतिक दलों को क्षेत्र विशेष के विकास की फिक्र है, बल्कि इस समर्थन के पीछे कारण कुछ और हैं.

विकास के लिए चाहिए राज्य-राष्ट्र के प्रति निष्ठावान जनता और ईमानदार नेतृत्व, न कि  आंदोलन. तेलंगाना आंदोलन के चलते प्रतिदिन 25-30 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. इसी धन से वहां स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोले जा सकते थे, जिनका फायदा आम जनता को होता, लेकिन यह चिंता किसे है? राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने नेताओं की आंखों पर पट्टी बांध दी है. अब जनता को फैसला करना है. आंदोलन करना है, लेकिन विकास के लिए.

तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की स्थापना ही इसी मुद्दे पर की गई थी. समिति के नेता चंद्रशेखर राव को उम्मीद है कि नए राज्य के गठन के बाद मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना पूरा हो जाएगा. 2009 के विधानसभा चुनाव में टीआरएस को 16 सीटों का नुक़सान हुआ. इसलिए उसे तेलंगाना का मुद्दा फिर से उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा. राव ने इसके लिए दिन-रात एक कर रखा है. उन्होंने डी श्रीरमालू का अनुकरण करते हुए अनशन भी किया, जिसके बाद तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की बात औपचारिक तौर पर मान भी ली गई. इसके लिए जस्टिस श्रीकृष्ण के नेतृत्व में एक समिति बनाई गई, जिसकी रिपोर्ट आ चुकी है, लेकिन राज्य बनने की नौबत अभी तक नहीं आई. तेलुगूदेशम पार्टी भी तेलंगाना की मांग का समर्थन कर रही है. तेलंगाना क्षेत्र के अपने सांसदों एवं विधायकों के दबाव में उसे यह समर्थन करना पड़ा. जब इन लोगों ने इस्ती़फा देना शुरू कर दिया तो चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि वह तेलंगाना राज्य बनने का समर्थन करेंगे.

चंद्रबाबू नायडू ने समर्थन इसलिए किया, क्योंकि कांग्रेस का कहना था कि आंध्र प्रदेश की विपक्षी पार्टियां तेलंगाना का समर्थन नहीं कर रही हैं. दरअसल बात यह है कि कोई भी पार्टी गेंद अपने पाले में नहीं रखना चाहती, सभी लोग दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर फायर करना चाहते हैं. नायडू भी अपनी स्थिति कमज़ोर नहीं करना चाहते और कांग्रेस पर हमला कर रहे हैं. यही हालत भारतीय जनता पार्टी की है. उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, जबकि पाने के लिए बहुत कुछ है. आंध्र प्रदेश विधानसभा में उसके दो सदस्य हैं. अगर भाजपा तेलंगाना राज्य का समर्थन करती है तो उसे उम्मीद है कि नए राज्य में उसकी स्थिति अभी से बेहतर होगी. भाजपा को ऐसे मौकों का लाभ पहले भी मिल चुका है. झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के गठन के बाद वहां भाजपा को लाभ हुआ. वर्तमान में तीनों राज्यों में उसकी सरकार है. भाजपा तेलंगाना में भी यही दांव आजमाना चाहती है. अगर आज केंद्र में उसकी सरकार होती तो तेलंगाना राज्य बन गया होता. कांग्रेस के लिए स्थिति अलग है. आंध्र प्रदेश और केंद्र मेंउसकी सरकार है. हालांकि कांग्रेस को आंध्र प्रदेश में कुछ सीटों का नुक़सान हुआ है, लेकिन सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत उसके पास है. कांगे्रस की सफलता में मुख्य भूमिका निभाने वाले राजशेखर रेड्डी भी अब नहीं हैं. इसके अलावा उनके निधन के बाद मुख्यमंत्री पद के मुद्दे पर कांग्रेस में काफी उठापटक हुई. अंतत: उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया.

अभी यहां कांग्रेस को एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में अगर वह तेलंगाना की मांग मान लेती है तो उसे दोनों राज्यों में ऩुकसान हो सकता है. आंध्र प्रदेश के लोग राज्य विभाजन के विरुद्ध हैं. जगन मोहन भी कांग्रेस के खिला़फ मोर्चा खोले हुए हैं. ऐसे में तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा देने से आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति कमज़ोर हो सकती है. दूसरी तरफ वह इस बात को जानती है कि तेलंगाना बनने के बाद उसका श्रेय टीआरएस को मिलेगा, क्योंकि उसी ने इसके लिए आंदोलन किया. यही वजह है कि कांग्रेस इसे टालने की कोशिश कर रही है. हालांकि सभी पार्टियों के नेता जो तेलंगाना क्षेत्र के हैं, नए राज्य के गठन का समर्थन कर रहे हैं. कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी इस्ती़फा दिया. उन्हें पता है कि तेलंगाना के विरोध का मतलब है अपने भविष्य को अधर में लटकाना. चाहे राज्य बने या न बने, चुनाव तो होंगे ही और तब यह मुद्दा ज़ोर-शोर से उठेगा. यही कारण है कि तेलंगाना क्षेत्र के नेता पार्टी के बजाय अपना भविष्य सुरक्षित करना चाह रहे हैं.

तेलंगाना हो या कोई अन्य राज्य बनाने का मुद्दा, सभी राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित होते हैं. एक दशक बीत गया तीन नए राज्यों का गठन हुए, लेकिन अभी तक वहां कोई सकारात्मक परिवर्तन होता नहीं दिखा. इन नवगठित राज्यों की कानून व्यवस्था का हाल किसी से छिपा नहीं है. झारखंड और छत्तीसगढ़ में क़ानून व्यवस्था में गिरावट आई है. उत्तराखंड की स्थिति भी अच्छी नहीं है. अगर विकास होता तो झारखंड और छत्तीसगढ़ में नक्सलवादी इतने सक्रिय नहीं होते. फायदा तो केवल नेताओं को होता है. मधु कोड़ा जैसे लोग मुख्यमंत्री बन जाते हैं. छोटे राज्यों को विकास का पर्याय नहीं कहा जा सकता. विकास के लिए चाहिए राज्य-राष्ट्र के प्रति निष्ठावान जनता और ईमानदार नेतृत्व, न कि  आंदोलन. तेलंगाना आंदोलन के चलते प्रतिदिन 25-30 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. इसी धन से वहां स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोले जा सकते थे, जिनका फायदा आम जनता को होता, लेकिन यह चिंता किसे है? राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने नेताओं की आंखों पर पट्टी बांध दी है. अब जनता को फैसला करना है. आंदोलन करना है, लेकिन विकास के लिए.

चौथी दुनिया के लेखों को अपने ई-मेल पर प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए बॉक्‍स में अपना ईमेल पता भरें::

Leave a Reply

कृपया आप अपनी टिप्पणी को सिर्फ 500 शब्दों में लिखें