इक और जहां मुमकिन है

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कैमूर क्षेत्र के जनपद सोनभद्र, मिर्जापुर एवं चंदौली के दलितों-आदिवासियों ने पिछले 8 वर्षों में जंगल की खाली और बंजर पड़ी क़रीब 30,000 एकड़ ज़मीन पर दोबारा अपना दख़ल क़ायम करते हुए 25 से ज़्यादा नए गांव बसाकर एक नया इतिहास रचने का काम कर दिया है. दरमा, हर्रा बिलरूआ, झिरगाडंडी, तलैयाबीर, कोदवनिया, मगरदाह, जोरूखाड़, बोम, परासपानी, हरना कछार, केवटन, पटवध, दमनभरी, बसधाटोटा, पतदड़ी गुरमुरा, चरगढ़ा भुलई एवं औरहउआ आदि ग्रामीण क्षेत्रों में बसाए गए इन गांवों में आदिवासियों एवं अन्य वनाश्रितों द्वारा स्वयं सामूहिक सहयोग से बनाई गई सड़कें और खोदे गए कुएं सरकार द्वारा करोड़ों रुपये ख़र्च करके चलाए जा रहे विकास कार्यक्रमों को चुनौती दे रहे हैं.

ग़ौरतलब है कि क्षेत्रफल के मामले में कैमूर उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा वन क्षेत्र है, लेकिन यहां हरे-भरे जंगल कुल वन भूमि के 50 प्रतिशत के बराबर भी नहीं हैं. यहां के पुराने लोग बताते हैं कि एक समय वह था, जब एक पेड़ को काटना होता था तो उसे नीचे गिराने के लिए आसपास के चार-पांच पेड़ों को भी गिराना पड़ता था. समय के साथ-साथ यहां फैले वन मा़फियाओं के जाल और वन विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से होने वाली अवैध कटान के चलते आज यहां हरियाली बीते समय की बात हो चली है. आज़ादी से पहले यानी अंग्रेजी हुकूमत रहने तक यहां का मूल निवासी दलित आदिवासी इन ज़मीनों पर अपने आधे-अधूरे हकूक के साथ खेती करके और जंगल से प्राप्त होने वाली लघु वनोपज के सहारे गुजर-बसर करता चला आ रहा था. आज़ादी का फल भले ही देश के रजवाड़ों, सरमाएदारों और सत्ता पर क़ाबिज होने वाले राजनेताओं के लिए मीठापन लिए रहा हो, लेकिन दलित आदिवासियों एवं वनों पर आश्रित समुदायों के लिए वह कसैला ही साबित हुआ. आज़ादी के बाद ख़ास तौर पर देश का संविधान बनने के बाद जंगल से आदिवासियों एवं अन्य वनाश्रित समुदायों की बेतहाशा बेदखली की शुरुआत जो आज़ाद हिंदुस्तान की सरकारों ने की, वह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है.

वन विभाग को ज़मीनों के हस्तांतरण, दबंग समुदायों एवं बड़ी कंपनियों के वर्चस्व और वन विभाग एवं पुलिस द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न के कारण इस क्षेत्र में फैले असंतोष के चलते यहां नक्सलवाद को पनपने के लिए ज़मीन तो मिली, लेकिन पिछले एक दशक के दौरान क्षेत्र में जैसे-जैसे जनवादी आंदोलनों की जड़ें मज़बूत हुईं और यहां के दलित आदिवासियों ने लोकतांत्रिक रास्ता अपनाते हुए छिनी हुई ज़मीनों पर वापस अपने दखल क़ायम करने शुरू किए हैं, वैसे-वैसे उनका हथियारबंद आंदोलनों से भी मोहभंग होता चला गया.

अपने पुरखों की ज़मीनों पर रहने वाले लोग-समुदाय सरकार और वन विभाग की भाषा में अतिक्रमणकारी हो गए हैं. काग़ज़ों पर वन क्षेत्र बढ़ाने की अंधी दौड़ में सरकारों ने यहां के लोगों की कृषि योग्य, निवास और सामुदायिक इस्तेमाल की लाखों हेक्टेयर ज़मीन आरक्षित जंगल एवं सुरक्षित जंगल आदि में परिवर्तित करके वन विभाग को प्रबंधन के लिए सौंप दी है. एक तऱफ इस प्रक्रिया ने जहां वन विभाग को सबसे बड़े जमींदार के रूप में स्थापित कर दिया, वहीं दूसरी ओर इन ज़मीनों के असली हक़दार यहां के दलित आदिवासी और अन्य वनाश्रित समुदाय अतिक्रमणकारी घोषित होते चले गए.

वन विभाग को ज़मीनें हस्तांतरित करने की यह प्रक्रिया यूं तो देश भर में चलाई गई, लेकिन केवल उत्तर प्रदेश में हुए इस हस्तांतरण का जायज़ा लिया जाए तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं. राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच द्वारा किए जा रहे एक अध्ययन में यह आंकड़ा 25 लाख हेक्टेयर से भी ऊपर जाता दिखाई दे रहा है. सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि ऐसे हस्तांतरण जनपद मिर्जापुर, सोनभद्र एवं चंदौली और तराई क्षेत्र जनपद लखीमपुर खीरी में सबसे अधिक हुए हैं. एक ही अधिसूचना में एक-एक लाख एकड़ के कई इंद्राज अभिलेखों में दर्ज हैं. आज़ादी के बाद से लेकर अब तक वन विभाग को ज़मीन हस्तांतरण के संबंध में प्रदेश के राज्यपालों द्वारा जारी की गईं इन अधिसूचनाओं के दस्तावेज़ अन्याय की गाथा बयान करते हुए सरकारी पुस्तकालयों में अभी भी मौजूद हैं. ग़ौरतलब है कि सोनभद्र सहित पूरे कैमूर को प्रदेश का सर्वाधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र माना जाता है. आए दिन इस क्षेत्र में नक्सलवाद से निपटने के लिए करोड़ों रुपये के सरकारी पैकेज की घोषणाएं होती रहती हैं.

वन विभाग को ज़मीनें हस्तांतरित करने की यह प्रक्रिया यूं तो देश भर में चलाई गई, लेकिन केवल उत्तर प्रदेश में हुए इस हस्तांतरण का जायज़ा लिया जाए तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं. राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच द्वारा किए जा रहे एक अध्ययन में यह आंकड़ा 25 लाख हेक्टेयर से भी ऊपर जाता दिखाई दे रहा है. सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि ऐसे हस्तांतरण जनपद मिर्जापुर, सोनभद्र एवं चंदौली और तराई क्षेत्र जनपद लखीमपुर खीरी में सबसे अधिक हुए हैं.

क़रीब तीन वर्ष पूर्व इसके लिए क्षेत्र में दस हेलीपैड बनाने की योजना को मंजूरी मिली है. हास्यास्पद तथ्य यह है कि हेलीपैड बनाने की मंजूरी के साथ-साथ पुलिस के एक मंडल स्तरीय आला अधिकारी का बयान भी आता है कि पिछले चार वर्षों में इस क्षेत्र में नक्सलवाद से संबंधित कोई बड़ी घटना नहीं घटी. इस उच्चाधिकारी का बयान एकदम दुरुस्त है, लेकिन सवाल यह है कि अगर पिछले सात वर्षों में इस क्षेत्र में नक्सलवाद से संबंधित कोई बड़ी घटना नहीं घटी है, तो फिर किस नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकार को यहां करोड़ों रुपये के पैकेज या हेलीपैड बनाने जैसी योजनाओं को मंजूरी देने की ज़रूरत महसूस होती है, क्यों आएदिन यहां के गांवों में बसे सीधे-सादे दलित आदिवासियों को नक्सली बताकर उनकी गिरफ्तारियां करने की कवायद छिड़ी हुई है?

वन विभाग को ज़मीनों के हस्तांतरण, दबंग समुदायों एवं बड़ी कंपनियों के वर्चस्व और वन विभाग एवं पुलिस द्वारा किए जाने वाले उत्पीड़न के कारण इस क्षेत्र में फैले असंतोष के चलते यहां नक्सलवाद को पनपने के लिए ज़मीन तो मिली, लेकिन पिछले एक दशक के दौरान क्षेत्र में जैसे-जैसे जनवादी आंदोलनों की जड़ें मज़बूत हुईं और यहां के दलित आदिवासियों ने लोकतांत्रिक रास्ता अपनाते हुए छिनी हुई ज़मीनों पर वापस अपने दख़ल क़ायम करने शुरू किए हैं, वैसे-वैसे उनका हथियारबंद आंदोलनों से भी मोहभंग होता चला गया. इसलिए आला अधिकारियों को यह बयान देने का मौक़ा मिलता है कि यहां पिछले चार वर्षों में नक्सलवाद से जुड़ी कोई बड़ी घटना नहीं हुई. यहां के दलित आदिवासियों, खासकर महिलाओं ने स्थानीय वन विभाग एवं पुलिस से निपटने के लिए किस कदर जनवादी तौर-तरीक़े अपना रखे हैं, इसका उदाहरण गांव हरना कछार में घटी एक घटना है. हुआ यह कि ज़मीनों पर स्थानीय दलित आदिवासियों द्वारा क़ायम किए गए दखल को खारिज करने की नीयत से कई स्थानीय अधिकारी बड़ी संख्या में पुलिस बल लेकर यहां पहुंचे. पुलिस ने अपने पुराने हथकंडे अपनाते हुए यहां बसाए गए झोपड़ीनुमा घरों को उजाड़ना शुरू कर दिया. आदिवासी महिलाओं ने जब विरोध किया तो उनके साथ बदसलूकी करते हुए पुलिसकर्मियों ने उनकी साड़ियां खींचना शुरू कर दिया. क्षुब्ध होकर इन आदिवासी वीरांगनाओं ने पूर्ण रूप से जनवादी तरीक़ा अपनाते हुए अपनी साड़ियां स्वयं खोल-खोलकर पुलिस पर फेंकना शुरू कर दिया. इस जनवाद के आगे पुलिस भौचक्की रह गई और वहां टिक नहीं सकी. नतीजतन उसे वहां से बैरंग वापस लौटना पड़ा. आदिवासियों एवं अन्य वनाश्रितों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की दुहाई देता नया वनाधिकार क़ानून 2006 मौजूद है, बावजूद इसके वन विभाग और पुलिस द्वारा अंजाम दी जाने वाली ऐसी कार्रवाइयां कई सवाल छोड़ जाती हैं.

जिस जनवादी आंदोलन के चलते आज यह पूरा क्षेत्र हथियारबंद आंदोलनों की चपेट में जाने से बचा हुआ है, उसी को कुचलने के लिए यहां का वन विभाग, पुलिस-प्रशासन, उनका संरक्षण प्राप्त दबंग समुदाय और एनजीओ चलाने वाले कई तथाकथित समाजसेवी हर व़क्त कमर कसकर तैयार बैठे रहते हैं. आज ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय असंतुलन को लेकर विश्व भर के पर्यावरणविद् एवं वैज्ञानिक चिंता में डूबे हुए हैं. उन्हें भी मालूम है कि ऐसा हरे जंगलों के लगातार घटने के कारण हो रहा है. अभी जापान की एक संस्था ने जाइका के नाम से जंगल में पेड़ लगाने के लिए भारत सरकार से एक क़रार के तहत क़रीब डेढ़ अरब रुपये का एक प्रोजेक्ट लिया है. यह पैसा वन विभाग के माध्यम से जंगल की खाली पड़ी ज़मीनों पर उसके हिसाब से पेड़ लगाने के लिए ख़र्च किया जा रहा है. योजना के तहत यूकेलिप्टस, सफेदा एवं साल जैसे पेड़ भी लगाए जा रहे हैं, जिनसे न ज़मीन का भला होने वाला है, न जंगल का और न पर्यावरण का. वन विभाग पौधारोपण के मामले में हमेशा नाकाम सिद्ध हुआ है और उसकी गवाही विभाग द्वारा तैयार किए जाने वाले दस्तावेज़-वर्किंग प्लान चीख-चीखकर एक-एक आंकड़े के साथ देते हैं. सरकारें उसी वन विभाग के साथ मिलकर नए पेड़ लगाने के जाइका जैसे कार्यक्रम परोसती रहती हैं.

दूसरी तऱफ क्षेत्र की महिलाओं ने जंगल की ज़मीन पर अपनी मर्जी के फल और ऑक्सीजन देने वाले ऐसे पेड़ों का पौधारोपण शुरू कर दिया है, जो न स़िर्फ जंगल और यहां रहने वाले समुदायों को, बल्कि पूरी पृथ्वी पर जीवन बचाने में सहायक साबित हो सकते हैं. शर्त यही है कि दुनिया के तथाकथित पर्यावरणविद् और वन वैज्ञानिक अपने किताबी ज्ञान का सिंहासन छोड़कर वन समुदायों पर यक़ीन करते हुए वनों को वापस उनके हवाले कर दें. पर्यावरणीय असंतुलन के कारण पृथ्वी से जीवन नष्ट हो जाने की दुहाई देते हुए घड़ियाली आंसू बहाना आम हो चला है. दूसरी तऱफ जब आदिवासी वन विभाग के क़ब्ज़े की खाली एवं अधिकांशत: बंजर हो चली अपनी ज़मीनों पर वापस दख़ल क़ायम करता है और अपने ख़ून-पसीने से सींचकर उसे उपजाऊ, हरा-भरा करके न स़िर्फ अपने जीने के साधन जुटा लेता है, बल्कि पूरी मानवता को बचाने की कोशिश भी करता है तो वह अपराधी कैसे हो जाता है? इस सवाल पर हर कोई ख़ामोश है. जबकि इस पर न स़िर्फ सरकारों, बल्कि शहरी समाज के अन्य तबकों को भी आज पूरी गंभीरता के साथ विचार करना होगा.

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2 thoughts on “इक और जहां मुमकिन है

  • October 14, 2011 at 8:43 PM
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    एक महत्वपूर्ण सवाल ये है की देश की आबादी के केवल आठ प्रतिशत बनवासियों(आदिवासियों) के छेत्र में ही अस्सी प्रतिशत से अधिक नक्सलवादी आतंक क्यों है?

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    • October 24, 2011 at 12:10 PM
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      अनिल जी आपकी जानकारी के लिए बताना चाहता हु कि देश कि ८ प्रतिशत नहीं करीब २३ प्रतिशत आबादी वन क्षेत्रों में बसी हुई है दूसरे ८० प्रतिशत आदिवासी नक्सली होने कि बात सरकारों और देशी विदेशी बड़ी कंपनियों द्वारा आम नागरिक समाज को भ्रमित करने के लिए फैलाया गया आंकड़ा है, सच्चाई जानने के लिए आपको इन क्षेत्रों में जाकर लोगों से बात करनी होगी आपको खुद ब खुद जानकारी हो जाएगी कि आतंक ka asli कारण कौन है आपकी yeh बात durust है कि इन ilakon में ८० प्रतिशत आतंक है लेकिन वो आतंक वन विभाग , पुलिस और कम्पनियों द्वारा लोगों पर कायम किया जा रहा आतंक है वो भी ८० नहीं १०० प्रतिशत है – रजनीश

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