सियासत को हमेशा अभिनय से जोड़ा जाता है और अभिनय में कई दफा सियासत करनी पड़ती है. बिहार के दिग्गज राजनीतिज्ञ, पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सदस्य रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान फिल्म मिले ना मिले हम के ज़रिए बॉलीवुड में अपनी पारी शुरू की है. एक कहावत है, दिल मिले न मिले, हाथ मिलाते रहिए, लेकिन रामविलास पासवान कहते हैं कि जब तक दिल न मिले, हाथ न मिलाइए. पिता की इसी बात से जोड़ते हुए बेटे चिराग पासवान ने अपनी पहली फिल्म का नाम रख दिया, मिले ना मिले हम. हालांकि इसका नाम पहले मी एंड ओनली रखा गया था. पिछले दिनों चौथी दुनिया की एडिटर (इंवेस्टिगेशन) रूबी अरुण ने उनसे एक लंबी बातचीत की. पेश हैं मुख्य अंश:
चिराग, यह शुरुआत अभिनय से सियासत की ओर है या सियासत से अभिनय की ओर?
मैं किसी को भी माध्यम नहीं बना रहा हूं, न सियासत और न अभिनय को. सियासत तो मेरी रगों में है. मैं राजनीति से दूर नहीं था और मुझे ख़ुद लोगों से मिलने का शौक रहा है. मैं ख़ुशनसीब हूं कि मुझे एक ऐसा प्लेटफॉर्म मिला, जहां मैं अपनी इस ख्वाहिश को पूरा कर सकता हूं. पापा के साथ चुनावी दौरे पर जाने या रैलियों में जाकर लोगों से सीधे मिलने का मौक़ा मिलता है, लेकिन अभिनय का शौक बचपन से रहा और इसी शौक को पूरा करने के लिए मैं यहां हूं.
जब आप जनप्रतिनिधि होते हैं, तब तमाम लोगों से रूबरू होते हैं. जब फिल्मों में हीरो का किरदार निभाते हैं तो ग्लैमर का टैग लग जाता है. आप उसमें भी लोगों से मिलते हैं, लेकिन उसमें एक दूरी आ जाती है. इस दूरी को आप कैसे पाटेंगे?
मुझे ऐसा नहीं लगता कि ग्लैमर का टैग मुझ पर लगेगा, इसकी वजह से मुझे लोगों से दूर होना पड़ेगा या होने की कोशिश करनी पड़ेगी. आज भी मैं उतना ही साधारण हूं और आने वाले पांच वर्षों तक ऐसा ही रहूंगा. मैंने आपको बताया भी कि लोगों से मिलना मेरा शौक है, अगर अपने आसपास भीड़ नहीं दिखती या लोग नहीं दिखते तो मुझे घबराहट होती है, क्योंकि मैं ऐसे घर में पला-बढ़ा हूं, जहां आदत सी हो गई है लोगों के बीच रहने की. उनसे दूर रहना या उन्हें अवाइड करने की बात मैं सोच भी नहीं सकता.
आप बिहार चुनाव में गए, पापा की पार्टी के लिए आपने प्रचार भी किया. उस व़क्त कहा जा रहा था कि आप और तेजस्वी मिलकर राहुल के ख़िला़फ लामबंदी करेंगे, इसमें आप लोग थोड़े सफल भी हुए, लेकिन अभिनय के क्षेत्र में आना उस चीज के लिए बंदिशें तो नहीं पैदा करेगा?
नहीं, बिल्कुल नहीं. उस व़क्त भी हम राहुल के ख़िला़फ नहीं थे. मैं पार्टी लाइन से हटकर कहूंगा कि मैं राहुल जी का बहुत आदर करता हूं. उन्होंने युवाओं को राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया, यह बहुत अच्छा काम है. कहीं न कहीं युवाओं का राजनीति से विश्वास उठता जा रहा था. जो मुहिम उन्होंने शुरू की है, मैं उसमें उनका हाथ बंटाना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि ज़्यादा से ज़्यादा युवा राजनीति से जुड़ें. हम युवा मिलकर अपनी पार्टी भूलकर यह काम करें तो यह देशहित में होगा.
यह आपने बहुत अच्छी बात कही कि पार्टी लाइन भूलकर किसी फिल्म में ऐसा किरदार करने की ख्वाहिश है, जिसके ज़रिए आप लोगों को संदेश दे सकें कि देश के लिए कुछ करना है…
बिल्कुल, ऐसा किरदार करने की ख्वाहिश ज़रूर है, लेकिन मुझे पता नहीं कि मैं राजनीतिज्ञ का किरदार पर्दे पर निभाना चाहूंगा या नहीं. अगर निभाना चाहूंगा तो वह अलग होगा. जिस तरह इंडस्ट्री में राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों और सरकारी नौकरीपेशा लोगों की जो छवि बना दी गई है, कहने का मतलब यह कि पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, अच्छे-ग़लत लोग हर क्षेत्र में होते हैं, इसलिए केवल राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को ही फोकस क्यों किया जाता है. मेरी कोशिश रहेगी कि मैं उस छवि को सुधारूं.
फिल्म में मुख्यत: दो धाराएं चलती हैं, सार्थक सिनेमा और कमर्शियल सिनेमा. इन दो चीजों को, चूंकि आपको पढ़ने का शौक रहा है और जो पढ़ने का शौक रखता है, वह उसे अपनी कल्पना में उतारता है. कभी आपके जेहन में ऐसा कोई किरदार आता है या जब आप एक्टिंग करते हैं तो ऐसा लगता है कि जो चीज आपने पढ़ी है, वह आपके किरदार से मैच करती है और इस चीज को जिस तरह निर्देशक कह रहा है, वैसे पेश न करके किसी दूसरे तरीक़े से पेश किया जाए, जो लोगों के दिलों को छुए. क्या इस तरह की कभी कशमकश होती है?
कई बार ऐसी कशमकश रही कि हमारे डायरेक्टर ने यह बोला, लेकिन पर्सनली मैं उसे दूसरी तरह करने में कंफर्टेबल हूं. मेरी पहली फिल्म मिले ना मिले हम में एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो एक ब्रोकेन फैमिली से आता है और मैं एक संयुक्त परिवार से हूं. कितनी बार यह किरदार एक वेयर्ड वे में रिएक्ट करता था, जो मुझे समझ में नहीं आता था कि यह इस तरह क्यों रिएक्ट कर रहा है, क्योंकि मैं उसकी जगह होता तो नहीं कर पाता, लेकिन एक्टर का काम यही है कि वह अपने किरदार में जान डाल दे, उसे समझे और उसकी ज़िंदगी जिए. मैंने इस फिल्म में यही कोशिश की और आगे भी यही करूंगा.
मुश्किलें क्या आती हैं, क्योंकि आपने कहा कि आप एक अनुशासित परिवार से आते हैं, तीनों भाई साथ रहते हैं, बड़े मर्यादित तरीक़े से आपका पालन-पोषण हुआ. ऐसे में उस परिवेश में जाना, जहां बिल्कुल खुलापन है, वहां आप कैसे तालमेल बैठाते हैं?
इसका पूरा श्रेय मेरे परिवार को जाता है, जिसने मुझे बहुत सपोर्ट किया. परिवार का प्रोत्साहन ही मुझे हर संघर्ष और विषम परिस्थितियों से निपटने में काफी मदद करता है. पारिवारिक सहयोग-समर्थन के चलते सारी चीजें मेरे लिए काफी सरल सी हो जाती हैं.
मैं फिर राजनीति और अभिनय को जोड़ रही हूं, चूंकि अभी जो स्थिति है, उसमें कहीं ऐसा तो नहीं कि आप अपने शौक यानी अभिनय के सहारे अपने पेशे यानी पार्टी को मज़बूत बनाना चाहते हों, उसे एक मज़बूत जमीन देना चाहते हों?
नहीं, मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं है. अगर ऐसा कुछ होता है तो ग़लत भी नहीं है. लेकिन ऐसी मंशा रखकर, यह सोचकर मैंने कोई योजना नहीं बनाई कि पहले एक्टिंग के क्षेत्र में उतरूं, जिससे पार्टी को फायदा मिले. अभिनय मेरा शौक है और राजनीति मेरा पेशा, यह दोनों चीजें अच्छी तरह चलें, यही कामना है.
|
|
|









