अफग़ानिस्तान इस व़क्त इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है. एक तरफ जहां अमेरिका ने यह घोषणा कर दी है कि दिसंबर 2014 तक सभी विदेशी सेनाएं अ़फग़ानिस्तान छोड़ देंगी, वहीं दूसरी तरफ भारत-पाक के बीच इस बात को लेकर होड़ मची है कि 2014 के बाद अ़फग़ानिस्तान पर किसका वर्चस्व रहेगा. पाकिस्तान चाहता है कि अमेरिका के जाने के बाद अ़फग़ानिस्तान पर उसका ही वर्चस्व रहे और वहां एक बार फिर तालिबानी शासन आए, ताकि वह अपनी मर्जी से अ़फग़ानिस्तान का भविष्य तय कर सके, लेकिन भारत ऐसा नहीं चाहता. भारत चाहता है कि अ़फग़ानिस्तान के लोगों को आतंकवाद से हमेशा के लिए छुटकारा मिले और इसीलिए वह पिछले कई वर्षों से अ़फग़ानिस्तान के निर्माण कार्यों में जी-जान से जुटा हुआ है. भारत ने वहां पर विश्व के किसी अन्य देश के मुक़ाबले निर्माण कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और इस दौरान अपने कई नागरिकों की जानें भी गंवाईं. यही नहीं, वह अब तक अ़फग़ानिस्तान के निर्माण कार्यों में 2 बिलियन डॉलर ख़र्च कर चुका है और सड़क, पुल, स्वास्थ्य केंद्रों एवं अन्य सरकारी इमारतों के निर्माण से लेकर बिजली उत्पादन जैसे कार्यों को अंजाम दिया. भारत के इन कार्यों की सराहना न स़िर्फ अ़फग़ानिस्तान की सरकार और वहां के नागरिक करते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इसका श्रेय भारत को देता है.
मिसाल के तौर पर इसी साल 18 जनवरी को काबुल स्थित राष्ट्रपति भवन पर उस समय हमला किया गया, जब वहां अ़फग़ानी मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था. इसके बाद अप्रैल में काबुल के इंटर कांटिनेंटल होटल पर हमला किया गया, जिसमें कई लोग हताहत हुए.
ऐसे में अचानक अ़फग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई का यह बयान भारत सहित पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चौंका देने वाला है कि अगर पाकिस्तान पर अमेरिका, भारत, चीन या किसी और देश की तऱफ से आक्रमण होता है तो अ़फग़ानिस्तान हमेशा पाकिस्तान के साथ खड़ा रहेगा. यह बात उन्होंने पिछले दिनों पाकिस्तान के एक निजी टीवी चैनल को दिए गए साक्षात्कार में कही. आख़िर हामिद करजई के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई, जिसके चलते वह ऐसा बयान देने के लिए मजबूर हो गए. इसका केवल एक ही जवाब है कि अ़फग़ानिस्तान के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियां पाकिस्तान को किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं हैं. वजह यह है कि बीते 4-5 अक्टूबर को हामिद करजई ने दिल्ली आकर भारत के साथ राजनीतिक, व्यापारिक, आर्थिक, शिक्षा, संस्कृति, सुरक्षा, विज्ञान एवं तकनीक आदि क्षेत्रों में सहयोग के लिए क़रार किए तो पाकिस्तान को लगा कि अफगानिस्तान उसके हाथों से निकलता जा रहा है. ज़मीनी हक़ीक़त भी इसी ओर इशारा कर रही है कि पाकिस्तान को लगता है कि अ़फग़ानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद उसे एक बार फिर वहां की सत्ता हथियाने का अवसर मिलने वाला है. शायद इसीलिए पाकिस्तान की ख़ु़फिया एजेंसी आईएसआई ने तालिबान द्वारा वहां हमले तेज कर दिए हैं.
मिसाल के तौर पर इसी साल 18 जनवरी को काबुल स्थित राष्ट्रपति भवन पर उस समय हमला किया गया, जब वहां अफगानी मंत्रियों का शपथ ग्रहण समारोह चल रहा था. इसके बाद अप्रैल में काबुल के इंटर कांटिनेंटल होटल पर हमला किया गया, जिसमें कई लोग हताहत हुए. उक्त हमले बताते हैं कि अ़फग़ानिस्तान में एक बार फिर तालिबान सक्रिय हो चुका है और उसे करजई हुकूमत की शांति वार्ता में कोई रुचि नहीं है. काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर भी अक्सर हमले होते रहते हैं. इन हमलों के पीछे कहीं न कहीं यही मंशा होती है कि भारत के पैर वहां जमने न दिए जाएं. दूसरी तऱफ पाकिस्तान यह प्रचार भी करता रहा है कि भारत अफगानिस्तान में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है. ब्लूचिस्तान के हवाले से वह यह इल्ज़ाम काफी समय से लगाता आया है. बीते 12 जुलाई को हामिद करजई के भाई एवं कंधार प्रोविंसियल काउंसिल के अध्यक्ष अहमद वली करजई की हत्या कर दी गई. अगले दिन यानी 13 जुलाई को जब अ़फग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति एवं हाई पीस काउंसिल के चेयरमैन प्रो. बुरहानुद्दीन रब्बानी भारत के दौरे पर आए तो उन्होंने भारत-अफगानिस्तान के संबंध मज़बूत करने पर जोर दिया, लेकिन पाकिस्तान को यह रास नहीं आया और बीते 20 सितंबर को रब्बानी को भी मौत के घाट उतार दिया गया. रब्बानी अक्सर कहते थे कि अ़फग़ानिस्तान में होने वाले आतंकवादी हमलों के पीछे कुछ ख़ु़फिया एजेंसियों का हाथ है. ज़ाहिर है, उनका इशारा आईएसआई की तऱफ था, इसलिए आईएसआई ने उन्हें भी अपने रास्ते से हटा दिया. अब ऐसा लगता है कि अपने भाई वली अहमद करजई और पूर्व राष्ट्रपति प्रो. बुरहानुद्दीन की हत्या के बाद हामिद करजई भी पाकिस्तान से ख़ौ़फ खाने लगे हैं. उन्हें ऐसा लगने लगा है कि अगर उन्होंने पाकिस्तान के ख़िला़फ बयान देने और अ़फग़ानिस्तान में होने वाले आतंकी हमलों के लिए पाकिस्तान को कुसूरवार ठहराने का सिलसिला बंद नहीं किया तो उनके लिए कोई बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है, लेकिन उनके इस ताजा बयान से सबसे ज़्यादा नुक़सान उनके देश को ही होगा, क्योंकि इससे तालिबान के हौसले बुलंद होंगे और आतंकी गतिविधियों में तेजी आएगी.
|
|
|









