बेआबरु होकर बर्लुस्कोनी को जाना

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कई मसलों पर उदाहरण स्वरूप एक पुरानी कहावत कही जाती है- रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था. यह जुमला इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी पर कुछ ज़्यादा ही फिट बैठता है. वरना, शायद इतने बेआबरू होकर उन्हें सत्ता के गलियारे से नहीं जाना पड़ता. बर्लुस्कोनी जब राष्ट्रपति निवास पर इस्तीफ़ा देने गए थे तो वहां हज़ारों लोगों की भीड़ ने उनके ख़िलाफ़ नारे लगाए व अपशब्द कहे. लोगों ने जिन शब्दों का प्रयोग किया उसमें सबसे विनम्र शब्द डाकुओं का सरगना और मस़खरा था. इस्तीफ़ा सौंपने के बाद प्रदर्शनकारियों से बचने के लिए वह साइड के एक रास्ते से निकल गए. खैर, बर्लुस्कोनी ने कुर्सी छोड़ दी है.

पिछले 15 वर्षों में इटली की अर्थव्यवस्था स़िर्फ 0.75 प्रतिशत की दर से बढ़ती रही है. बीते दिनों जो कटौती प्रस्ताव पारित हुआ उसके ज़रिये सरकारी ख़र्चों में कटौती और टैक्स बढ़ाकर 59.8 अरब यूरो की बचत की उम्मीद है, ताकि वर्ष 2014 तक बजट को संतुलित किया जा सके. प्रस्ताव के पारित होने पर बाज़ार ने इसका स्वागत किया था और शेयर के दाम उछले थे. क़र्ज़ संकट से उबरने के लिए इटली की सरकार की ओर से प्रस्तावित ख़र्च में कटौती के प्रस्ताव को संसद के निचले सदन ने भी पारित कर दिया है. बताते हैं कि बर्लुस्कोनी ने शर्त रखी थी कि यदि कटौती का प्रस्ताव संसद के  दोनों सदनों में पारित हो जाता है तो वह अपना पद छोड़ देंगे.

क़रीब 17 वर्षों से इटली की राजनीति पर बर्लुस्कोनी का दबदबा रहा है. पिछले कुछ समय से विभिन्न घोटालों में उनका नाम आने से उनकी छवि बिगड़ गई थी. बर्लुस्कोनी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से इटली में सबसे लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री रहे. उन्होंने संसद में बहुमत गंवाने के बाद घोषणा की थी कि अगर कटौती प्रस्ताव को संसद के दोनों सदन पारित कर देते हैं तो वह इस्तीफ़ा दे देंगे. बर्लुस्कोनी की जगह मारियो मॉन्टी प्रधानमंत्री बन गए हैं. वह एक जाने माने अर्थशास्त्री हैं. नए प्रधानमंत्री पर नई आर्थिक कटौतियों को लागू करने की ज़िम्मेदारी होगी, ताकि इटली के क़र्ज़ संकट से निपटा जा सके. नए प्रधानमंत्री और नई योजना दोनों को ही विरोध का सामना करना पड़ सकता है. दरअसल, इटली की मौजूदा आर्थिक संकट की स्थिति यह है कि दस वर्ष के  इतालवी बॉन्ड कोई ख़रीदने को तैयार नहीं है. इसके लिए इटली से निवेशक सात प्रतिशत ब्याज़ मांग रहे हैं, जो अपने यूरोपीय संघ के गठन के बाद से अब तक का रिकॉर्ड है. मामले की गंभीरता इसी से समझ में आती है कि ऐसे ही बॉन्ड के लिए जर्मनी स़िर्फ डेढ़ प्रतिशत ब्याज़ देता है. इटली की अर्थव्यवस्था उसी स्तर पर पहुंच गई है जहां ग्रीस की अर्थव्यवस्था है, जबकि यूरोपीय संघ की भारी आर्थिक सहायता के  बिना उसे दिवालिया होने से बचाना मुश्किल है. इटली को अपने पिछले क़र्ज़ों की क़िस्ते चुकाने के लिए और क़र्ज़ चाहिए, जबकि कोई भी इटली को नए क़र्ज़ देने को तैयार नहीं है सिवाय इसके कि उन्हें मिलने वाला ब्याज़ बहुत ऊंचा हो. अब यह इटली के हिसाब से बहुत ही मारक स्थिति है, क्योंकि अगर ऊंचे ब्याज़ दर पर नया क़र्ज़ लिया गया तो क़र्ज़ की क़िस्तें कम होने के बदले बढ़ जाएंगी. बैंकों को डर है कि अगर इटली अपने क़र्ज़ चुका नहीं पाया तो उनका पैसा डूब जाएगा. इटली का सरकारी ख़र्च काफ़ी अधिक है, जबकि उसकी विकास दर बहुत धीमी है. फ्रांस और जर्मनी के बाद इटली यूरोज़ोन की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यस्था है. उसे डूबने से बचाना बहुत ज़रूरी है, लेकिन यह आसान नहीं है. इटली को वर्ष 2012 में 360 अरब यूरो बाज़ार से उधार लेने हैं, ताकि वह अपने पिछले क़र्ज़ चुका सके और डिफाल्टर होने से बच सके.

बताते हैं कि इटली की आर्थिक समस्याएं अल्पकाल में ठीक नहीं होने वाली हैं. निवेशकों को इस बात का भरोसा चाहिए कि इटली अपने सभी पिछले क़र्ज़ चुका पाएगा. जिन देशों और बैंकों का पैसा इटली के क़र्ज़ में फंसा है वे इटली में और पैसा नहीं लगाना चाहेंगे. इटली को अगर आर्थिक सहायता पैकेज की ज़रूरत हुई तो 440 अरब के  कोष में स़िर्फ 250 अरब यूरो बचे हैं जो नाकाफ़ी होंगे. जिन बैंकों और वित्तीय संस्थानों का पैसा क़र्ज़ के  रूप में इटली में लगा है वे किसी तरह इससे छुटकारा पाना चाहते हैं और वे क़र्ज़ औनी-पौनी क़ीमत पर दूसरी कंपनियों को बेचने का प्रयास कर रहे हैं, ऐसे माहौल में इटली जब नया क़र्ज़ लेने की कोशिश करेगा तो निवेशकों में कितना उत्साह होगा यह सहज ही समझा जा सकता है. आर्थिक संकट से निपटने के  लिए पिछले दिनों सरकार ने सरकारी बॉन्ड के ज़रिये पांच अरब यूरो की राशि जुटाई थी. हालांकि इस राशि पर उसे 6.087 प्रतिशत का भारी भरकम ब्याज़ देना होगा. यूरोपीय संघ की एक टीम रोम में बनने वाली नई सरकार के प्रयासों पर नज़र गड़ाए हुए है कि वह किस तरह क़र्ज़ का बोझ घटाती है, जो इस वक़्त सकल घरेलू उत्पाद का 120 प्रतिशत तक जा पहुंचा है.

पिछले 15 वर्षों में इटली की अर्थव्यवस्था स़िर्फ 0.75 प्रतिशत की दर से बढ़ती रही है. बीते दिनों जो कटौती प्रस्ताव पारित हुआ उसके ज़रिये सरकारी ख़र्चों में कटौती और टैक्स बढ़ाकर 59.8 अरब यूरो की बचत की उम्मीद है, ताकि वर्ष 2014 तक बजट को संतुलित किया जा सके. प्रस्ताव के पारित होने पर बाज़ार ने इसका स्वागत किया था और शेयर के दाम उछले थे. क़र्ज़ संकट से उबरने के लिए इटली की सरकार की ओर से प्रस्तावित ख़र्च में कटौती के प्रस्ताव को संसद के निचले सदन ने भी पारित कर दिया है. बताते हैं कि बर्लुस्कोनी ने शर्त रखी थी कि यदि कटौती का प्रस्ताव संसद के  दोनों सदनों में पारित हो जाता है तो वह अपना पद छोड़ देंगे. उसी के अनुरूप उन्होंने बीते 13 नवंबर को अपने पद से इस्ती़फा दे दिया. वैसे बर्लुस्कोनी अपनी रंगीन मिज़ाजी के लिए याद किए जाते रहेंगे. बहरहाल, अब देखना यह है कि इटली की संकट में फंसी अर्थव्यवस्था को नई सरकार कैसे उबारती है.

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