कोसी के बाढ़ पीड़ितों को राहत देने के लिए बिहार सरकार ने दुनिया भर में ढिंढोरा पीटा और बताया कि प्रकृति के इस क़हर से पूरी संजीदगी के साथ लड़ा जा रहा है और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि आगे इस तरह की विपदा आने पर जान-माल का ज़्यादा नुकसान न हो. सरकार की वाहवाही हुई और यह संदेश गया कि वास्तव में नीतीश सरकार ने बाढ़ पीड़ितों के दर्द को महसूस किया है, लेकिन सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई कुछ नई सूचनाओं से पता चलता है कि सरकार केवल दिखावटी आंसू गिरा रही है और बाढ़ पीड़ितों के दर्द का एहसास उसे रत्ती भर भी नहीं है. सरकार हर काम में भले ही पैसे का रोना रोए, पर हक़ीक़त यह है कि कोसी पुनर्वास योजना के लिए मिले धन का उपयोग करने में वह काफी पीछे है. आरटीआई की सूचना बताती है कि कोसी आपदा से प्रभावित सहरसा जिले में विधानसभा एवं विधान परिषद सदस्यों की विकास निधि से प्राप्त 83 करोड़ 25 रुपये का इस्तेमाल सामुदायिक भवन और मवेशी शेल्टर बनाने में मंथर गति से अभी शुरू ही हुआ है. यह वित्तीय वर्ष 2008-09 की कर्णांकित राशि है. हद तो यह है कि अभी पूरी धनराशि में से केवल छियालिस करोड़ पैंतीस लाख छियासी हज़ार नौ सौ तीस रुपये ही आवंटित किए गए हैं. मतलब यह कि दो सालों में केवल लगभग आधी राशि आवंटित कर सूची बनाई गई और काम की प्रक्रिया शुरू की गई है.
आयोग का मानना है कि ओडीआरसी निबंधित संस्था नहीं है, ऐसे में इसके तहत राशि खर्च होना नियम सम्मत नहीं होगा. सूत्र बताते हैं कि पिछले सप्ताह विश्व बैंक के अधिकारियों ने राज्य के मुख्य सचिव नवीन कुमार के समक्ष यह मामला उठाया था और शीघ्र हल निकालने की अपील की थी. विश्व बैंक से मिलने वाली सहायता राशि से कोसी इलाके में क्षतिग्रस्त मकानों-सड़कों का पुनर्निर्माण, बिजली, सिंचाई एवं पंचायती राज व्यवस्था में सुधार, स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं की आजीविका की व्यवस्था, तटबंधों का सुदृढ़ीकरण, खेतों में जमी बालू की गाद की सफाई आदि कार्य कराए जाने हैं.
सामुदायिक भवन और मवेशी शेल्टर कब बनेगा, इसका अंदाज़ा सरकार की इसी गति से लगाया जा सकता है. एक बानगी ग्रामीण कार्य विभाग के सचिव डॉ. बी राजेंद्र के 20 जुलाई, 2011 के पत्र पर डालिए, जो उन्होंने बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के अध्यक्ष विपिन कुमार को लिखा है. पत्र में कहा गया है, सहरसा ज़िले के बाढ़ग्रस्त आठ प्रखंडों के 35 कार्यस्थलों पर इन परियोजनाओं के निर्माण हेतु संबंधित सूची उपलब्ध कराई गई है. इसी क्रम में ज़िला पदाधिकारी सुपौल के प्रासंगिक पत्र द्वारा इस जिले के सात प्रखंडों की 39 पंचायतों एवं 39 गांवों में विषयांकित परियोजना के निर्माण के लिए सूची उपलब्ध कराई गई है. सूची के क्रमांक 1 से 14 और क्रमांक18,19,20,21,33,35 एवं 39 पर दर्शाए गए कार्यस्थल क्रमश: प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और सांसद निधि से बनने वाले कार्यस्थलों की सूची में सम्मिलित हैं. इस प्रकार उक्त क्रमांकों के कुल 21 कार्यस्थलों को छोड़कर शेष बचे 18 कार्यस्थलों पर इन परियोजनाओं के निर्माण कार्य की प्रक्रिया प्रारंभ कराई जाए. मतलब यह कि दो साल का वक़्त केवल प्रक्रिया शुरू करने में लग गया. अगर इस बीच कोसी में बाढ़ आ जाती तो फिर क्या होता? पैसे धरे रह जाते और लोगों का भारी नुकसान हो जाता.
राजद सांसद रामकृपाल यादव कहते हैं कि सरकार की बदनीयती का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि एक तरफ वह नरेंद्र मोदी के पैसे लौटा रही है और दूसरी तरह पुनर्वास के लिए जमा धन पर कुंडली मारकर बैठी हुई है. उनका आरोप है कि बाढ़ राहत के नाम पर केवल लूट हुई है और इसकी उच्चस्तरीय जांच जरूरी है. दो-दो साल से पैसा पड़ा है, पर सरकार केवल अपना ढिंढोरा पीटने में लगी है. बाढ़ पीड़ितों की परेशानी से उसका कुछ लेना-देना नहीं है. पूर्व विधान पार्षद पी के सिन्हा मानते हैं कि सरकार के पास कोसी के बाढ़ पीड़ितों को राहत देने की कोई योजना ही नहीं है. अगर होती तो करोड़ों रुपये इस तरह पड़े न रह जाते. राहत के नाम पर झूठा प्रचार चल रहा है. इस राशि के अलावा कोसी पुनर्वास योजना के लिए विश्व बैंक की बहुचर्चित साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये की घोषित सहायता पर भी ग्रहण लगता नज़र आ रहा है. विश्व बैंक ने पुनर्वास योजना के लिए दी जाने वाली यह सहायता ऑनर ड्रीवेन रिहेबिलिटेशन कोलेबरेटिव (ओडीआरसी) से करने की शर्त थोप दी है, जबकि सरकार इसके लिए तैयार नहीं है. विश्व बैंक और कोसी पुनर्वास आयोग के बीच इस मसले को लेकर पैदा विवाद शीघ्र न सुलझा तो अगले महीने से एक मिलियन डॉलर की घोषित सहायता पर रोक लग सकती है. आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि इस वर्ष जनवरी में विश्व बैंक के अध्यक्ष रॉबर्ट बी जोलियक पटना आए थे तो उन्होंने कोसी पुनर्वास आयोग के लिए एक मिलियन डॉलर की सहायता की घोषणा की थी, जिसमें से एक हज़ार करोड़ पहले चरण में उपलब्ध हो चुके हैं. करीब साढ़े तीन हज़ार करोड़ की धनराशि अभी मिलनी है, जिससे पुनर्वास योजना के दूसरे चरण का कार्य होना है. इसके बाद विश्व बैंक ने इस धनराशि की पहली किस्त के रूप में 220 मिलियन डॉलर की सहायता की घोषणा की, लेकिन अब तक यह राशि सरकार के खाते में नहीं आई है. यह सहायता राशि कोसी पुनर्वास आयोग को खर्च करनी है, लेकिन आयोग के वर्तमान परियोजना निदेशक ने ओडीआरसी से कार्य कराने से इंकार कर दिया है.
आयोग का मानना है कि ओडीआरसी निबंधित संस्था नहीं है, ऐसे में इसके तहत राशि खर्च होना नियम सम्मत नहीं होगा. सूत्र बताते हैं कि पिछले सप्ताह विश्व बैंक के अधिकारियों ने राज्य के मुख्य सचिव नवीन कुमार के समक्ष यह मामला उठाया था और शीघ्र हल निकालने की अपील की थी. विश्व बैंक से मिलने वाली सहायता राशि से कोसी इलाके में क्षतिग्रस्त मकानों-सड़कों का पुनर्निर्माण, बिजली, सिंचाई एवं पंचायती राज व्यवस्था में सुधार, स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं की आजीविका की व्यवस्था, तटबंधों का सुदृढ़ीकरण, खेतों में जमी बालू की गाद की सफाई आदि कार्य कराए जाने हैं. अगर गतिरोध नहीं टूटा तो इस पूरी परियोजना पर ग्रहण लग सकता है.
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