बिहारः कब मिलेगा विशेष राज्य का दर्जा

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बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिले यह मांग समय-समय पर उठती रही है. ख़ासकर लालू प्रसाद यादव के पंद्रह वर्ष के शासन के बाद जब सूबे में जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में नीतीश कुमार की सरकार बनी तो यह मांग बेहद तेज़ हो गई. सुशासन के वायदे और बात-बात पर इसकी दुहाई देने वाले नीतीश कुमार के मुताबिक़ आज़ादी के बाद से ही केंद सरकार ने बिहार में विकास के नाम पर सौतेला व्यवहार किया. हालत तब और ख़राब हो गई, जब बिहार से अलग होकर पृथक झारखंड राज्य बन गया. तमाम खनिज संपदाएं झारखंड के हिस्से में चली गई और भूख, बेबसी व ग़रीबी शेष बिहार के हिस्से में रह गई. नीतीश कुमार ने जब प्रदेश की सत्ता संभाली तो उनकी प्राथमिकता में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग सबसे ऊपर थी.

23 मई, 2009 को नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को अपने पत्रांक संख्या-4610139 में कोशी पुनर्संरचना और पुनर्वास, कृषि प्रसंस्करण, ऊर्जा, ऋण सुधार, ग़रीबी मानक, सड़क निर्माण जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की थी. प्रधानमंत्री कार्यालय से 3 जून, 2009 को इस पत्र की प्राप्ति की सूचना जारी की गई और उसे संबंधित विभाग को अग्रसारित कर दिया. उसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) के संसद सदस्यों की ओर से 23 मार्च, 2011 को एक ज्ञापन प्रधानमंत्री को सौंपा, जिसमें बिहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, 1912 में बिहार-उड़ीसा बंटवारा और वर्ष 2000 में बिहार से झारखंड का अलग होना और उसके बाद की बदली परिस्थितियां, ग़रीबी, अशिक्षा, ढांचागत विकास का आभाव जैसी कई बुनियादी ज़रूरतों के मद्देनज़र राज्य को स्पेशल स्टेटस देने की मांग की गई थी. इस ज्ञापन में इस बात पर ख़ास ज़ोर दिया गया कि झारखंड के बनने से बिहार के राजस्व को का़फी क्षति हुई है.

23 मई, 2009 को नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को अपने पत्रांक संख्या-4610139 में कोशी पुनर्संरचना और पुनर्वास, कृषि प्रसंस्करण, ऊर्जा, ऋण सुधार, ग़रीबी मानक, सड़क निर्माण जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की थी.

राज्य के विभाजन के बाद खनिज संपदा, बड़े कल कारख़ाने झारखंड के हिस्से में चले गए. कहा यह जाने लगा कि बिहार में स़िर्फ आलू और बालू ही बच गए. शेष संपदा झारखंड में चली गई जिसका ख़ामियाज़ा बिहार के हर तबक़े को उठाना पड़ा और राज्य से लोगों का पलायन शुरू हो गया. हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते चले गए जो आज तक नहीं सुधरे हैं. ऐसे में बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए और बिहार इसके लिए सभी ज़रूरी शर्तों को पूरा भी करता है. उल्लेखनीय है कि विशेष राज्य वाली श्रेणी में जिस राज्य को शामिल कर लिया जाता है, वहां कोई कारख़ाना या उद्योग लगाने वालों को कई करों में भारी रियायत और केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्य सरकार को बड़ी छूट मिल जाती है.

फिलहाल देश के ग्यारह राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है. इसमें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर और सिक्किम शामिल है. अपने ज्ञापन में नीतीश कुमार ने कहा है कि वित्त आयोग ग्यारहवीं और बारहवीं वित्तीय अवधि के दौरान बिहार में पर कैपिटा टोटल रेवैन्यू 2,364 और 2,122 रुपये थी, जबकि दूसरी तऱफ हरियाणा में पर कैपिटा टोटल रेवैन्यू 6,066 रुपये और 3,719 रुपये आंकी गई थी. जबकि हिमाचल प्रदेश में पर कैपिटा टोटल रेवैन्यू  7,952 रुपये और 4,719 रुपये थी. यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि हिमाचल प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है. आशय यह कि नीतीश कुमार की मांग को अगर किनारे में रख कर भी देखा जाए तो यह सवाल उठता है कि फिलहाल योजना आयोग ने जिन राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा दिया है क्या उसकी समीक्षा करने की ज़रूरत है? वहीं बिहार जैसे बड़े और पिछड़े प्रदेश में अगर विकास की असीम संभावनाएं हैं तो उसे केंद्र सरकार विशेष राज्य की हैसियत क्यों नहीं देती, ताकि यहां हर स्तर पर प्रगति हो. तमाम ऐसे मामले हैं जिनसे यह पता चलता है कि बिहार उन कई लाभों से वंचित रहा है, जिसका वह हक़दार रहा है. जैसे कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को क्रमशः बुंदेलखंड सूखा राहत पैकेज के तहत वर्ष 2009-10 में 332.28 करोड़ व 361.51 करोड़ रुपये, जबकि वर्ष 2010-11 में 468.69 करोड़ व 638.93 करोड़ रुपये एवं वर्ष 2011-12 में 60 करोड़ व 89.46 करोड़ की सहायता दी गई है. जबकि, बिहार में सूखा और बाढ़ की वजह से कई ज़िले प्रभावित हुए. यहां मानवीय क्षति से लेकर फसल, पशुपालन और बाग़वानी को का़फी नुक़सान पहुंचा, लेकिन जो आर्थिक मदद बिहार को दी गई वह प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुक़सान की बनिस्बत कम थी. बिहार की प्राकृतिक आपदाओं को देखकर चीन का एक प्रसंग याद आता है. बिहार में कोशी नदी तरह ही चीन में हुआंग-हो नदी हर साल भयंकर तबाही मचाती थी. तब वहां की जनता आज़िज़ होकर सरकार से राहत मदद लेने से इनकार कर दिया. उनकी मांग थी कि हमें अस्थायी राहत नहीं, बल्कि बाढ़ से स्थायी निदान चाहिए. नतीजतन वहां की सरकार ने जनता की इस मांग को पूरा करते हुए हुआंग-हो नदी परियोजना पर योजनाबद्ध तरीक़े से काम किया. नतीजतन कल तक शोक कहलाने वाले इस इलाके में आज ख़ुशहाली छाई हुई है. अगर बिहार की बात करें तो हर साल भारी तबाही मचाने वाली कोशी नदी की उफान रोकने के लिए आज़ादी के 64 साल बाद भी कोई उपाय नहीं किए गए है. हालांकि, कोशी परियोजना के नाम पर करोड़ों रुपये की लूट ज़रूर मची, लेकिन समस्याएं जस की तस बनी रहीं. आख़िर क्या वजह है कि केंद्र सरकार नेपाल सरकार से इस मुद्दे पर गंभीरतापूर्वक बात नहीं करती. पिछले दिनों नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई भारत आए थे, लेकिन बाढ़ नियंत्रण पर कोई बातचीत नहीं की गई. केंद्र सरकार के इस रवैये से यही ज़ाहिर होता है कि वह बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने पर विचार तक नहीं करना चाहती.

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