राष्ट्रमंडल के राष्ट्र प्रमुखों का सम्मेलन : वैश्विक चुनौतियों का डटकर सामना करें

राष्ट्रमंडल देशों के राष्ट्र प्रमुखों की 21वीं बैठक ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में 28 से 30 अक्टूबर के बीच संपन्न हुई. भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अपनी अंतरराष्ट्रीय व्यस्तता के कारण इस सम्मेलन में शिरकत नहीं कर पाए. इसके कारण भारत का प्रतिनिधित्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया. 54 सदस्यों वाले इस संगठन की बैठक के शुरू होने की घोषणा ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने इस मांग के साथ की कि सदस्य राष्ट्रों को मानवाधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिए तथा इसके उल्लंघन के खिला़फ कड़ा रु़ख अपनाने की आवश्यकता है. इस बैठक में अन्य संगठनों की बैठकों की तरह ही वैश्विक वित्तीय संकट, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, व्यापारिक चुनौतियों तथा आतंकवाद की समस्याओं पर चर्चा की गई. चूंकि इसके सदस्य देशों में बहुत सारे देश टापू राष्ट्र हैं, जिनपर जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक भयावह असर पड़ने वाला है. इस कारण यह मुद्दा तो इस सम्मेलन में उठना लाज़िमी था. ऐसे भी जलवायु परिवर्तन आधुनिक विश्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है और समय रहते अगर इससे निपटने के लिए कड़े क़दम नहीं उठाए गए तो प्रकृति के प्रकोप से विश्व को बचा पाना मुश्किल हो जाएगा. इस सम्मेलन में तो इसे गंभीरता से लिया गया, लेकिन इस पर कितना अमल किया जाता है यह आने वाला समय ही बताएगा, क्योंकि अभी तक जिस मंथर गति से इसके कारण उत्पन्न समस्याओं पर काम किया जाता रहा है, उससे तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि विकास की अंधी दौड़ में कहीं हम विनाश को निमंत्रण तो नहीं दे रहे हैं. वैसे भी जब तक कुछ विकसित देश इस ओर ध्यान नहीं देते हैं तब तक इस पर नियंत्रण रखना मुश्किल है, क्योंकि सबसे अधिक कार्बन का उत्सर्जन तो इन्हीं देशों द्वारा किया जाता है. अब ज़रूरत इस बात की है कि विकासशील देश एकजुट होकर इन विकसित देशों पर दबाव डालें. जब तक उनका आर्थिक हित प्रभावित नहीं होता है, तब तक ये इस ओर गंभीरता नहीं बरतेंगे.

इस बैठक की एक खास बात रही कि विशिष्ट व्यक्तियों के समूह (ईपीजी) की स़िफारिशों पर अलग-अलग मतों का. 11 सदस्यीय ईपीजी ने 106 स़िफारिशें की थीं, जिसमें दो स़िफारिशों पर अधिक चर्चा हुई. इसमें एक राष्ट्रमंडल देशों के लिए एक नैतिक संहिता (चार्टर ऑफ वैल्यू) बनाने से संबंधित था तो दूसरा राष्ट्रमंडल मानवाधिकार आयुक्त नियुक्त करने का. नैतिक संहिता बनाने के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए तो लगभग सभी देश राज़ी हुए, लेकिन मानवाधिकार कमिश्नर की बात को और अधिक चर्चा की ज़रूरत के साथ ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

इस बैठक में एक अन्य मुद्दा आतंकवाद का रहा. भारत ने आतंकवाद के सभी रूपों की आलोचना की और संयुक्तराष्ट्रसंघ में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि (सीसीआईटी) की वार्ता को नतीजे तक पहुंचाने के लिए प्रयास तेज़ करने का सदस्य देशों से आह्वान किया है. संगठन ने सदस्य राष्ट्रों से आह्वान किया है कि वे अपनी भूमि का इस्तेमाल हिंसा फैलाने या आतंकवादी गतिविधियों के लिए न होने दें और आतंकवादियों को मिलने वाली वित्तीय मदद के विरुद्ध क़ानून बनाएं. भारत के लिए यह सबसे ज़रूरी समझौता होगा, क्योंकि अपने पड़ोसी मुल्क की कारगुज़ारियों से यह देश सबसे अधिक प्रभावित है. पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों से रिश्तों के रोज नए प्रमाण मिल रहे हैं. अगर इस संधि को अमल में लाया गया तो पाकिस्तान पर कुछ अंकुश तो अवश्य लगेगा. ग़ौरतलब है कि सीसीआईटी में आतंकवाद के सभी स्वरूपों को ग़ैरकानूनी घोषित करने तथा उन्हें संरक्षण देने वाले राष्ट्रों के प्रति कड़ा रु़ख अपनाने की बात कही गई है. इसके अलावा इस बैठक में हिंद महासागर में बढ़ती समुद्री डकैती की घटनाओं पर भी चिंता जताई गई है तथा इसे रोकने के लिए एकजुट होकर क़दम उठाने की बात कही गई है. समुद्री डकैती पर अंकुश लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया. साथ ही साइबर सुरक्षा के लिए बेहतर क़ानून बनाने पर भी ज़ोर देने की बात इस बैठक में की गई.

इस बैठक की एक खास बात रही कि विशिष्ट व्यक्तियों के समूह (ईपीजी) की स़िफारिशों पर अलग-अलग मतों का. 11 सदस्यीय ईपीजी ने 106 स़िफारिशें की थीं, जिसमें दो स़िफारिशों पर अधिक चर्चा हुई. इसमें एक राष्ट्रमंडल देशों के लिए एक नैतिक संहिता (चार्टर ऑफ वैल्यू) बनाने से संबंधित था तो दूसरा राष्ट्रमंडल मानवाधिकार आयुक्त नियुक्त करने का. नैतिक संहिता बनाने के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए तो लगभग सभी देश राज़ी हुए, लेकिन मानवाधिकार कमिश्नर की बात को और अधिक चर्चा की ज़रूरत के साथ ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. भारतीय प्रतिनिधि हामिद अंसारी का कहना था कि इस मुद्दे पर जल्दबाज़ी दिखाने की ज़रूरत नहीं है. मानवाधिकार कमिश्नर की नियुक्ति से संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संबंधी कार्यों में बाधा उत्पन्न होगी. भारतीय उप राष्ट्रपति ने राष्ट्रमंडल देशों को विकास के मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करने की सलाह भी दी तथा दूसरे देशों के घरेलू मामलों में आंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की आलोचना भी की. इन मुद्दों के अलावा इस बैठक में खाद्य सुरक्षा तथा वित्तीय संकट से जूझ रहे विश्व की सहायता करने के लिए सदस्य देशों से अपील भी की गई. ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जुलिया गिलार्ड ने जी-20 की बैठक में वित्तीय संकट के मुद्दे को उठाने की बात कही.

भारत ने इस बैठक का उपयोग कई देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध सुधारने के लिए भी किया. भारतीय प्रतिनिधि ने पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव आदि कई देशों के प्रतिनिधियों से अनौपचारिक मुलाक़ात की. भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भी इस दौरे का सदुपयोग किया. उन्होंने राष्ट्रमंडल बैठक से इतर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड के विदेश मंत्रियों से बात की तथा उनके देश द्वारा निकाली गई यात्रा परामर्श पर आपत्ति दर्ज की. ग़ौरतलब है कि इन देशों ने अपने नागरिकों के लिए छुट्टियों में जारी यात्रा परामर्श में भारत के लिए प्रतिकूल टिप्पणी की थी. इससे भारत का पर्यटन उद्योग प्रभावित होता है. कृष्णा की इन बातों पर ग़ौर करने की बात तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने की. ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री ने कहा कि वे अपने नागरिकों को इस बात की सूचना देने के लिए क़ानूनी तौर पर बंधे हुए हैं कि किस देश की यात्रा पर जाना उनके लिए कितना सुरक्षित है. इसके अलावा ऐसा करना बीमा कंपनियों की नीतियों के कारण भी ज़रूरी है. लेकिन इस मुद्दे पर ग़ौर करने की बात तीनों विदेश मंत्रियों ने की. इस बैठक में भारत के लिए एक और खुशी की बात यह रही कि भारत के कमलेश शर्मा को दूसरे कार्यकाल के लिए राष्ट्रमंडल महासचिव नियुक्त किया गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान ने भी भारतीय अधिकारी का समर्थन किया. हालांकि इस बैठक को सफल बताया गया है और भारतीय उप राष्ट्रपति ने भी इसे सफल ही माना है, लेकिन इसकी सफलता की बात तभी कही जा सकती है जब जिन मुद्दों पर चर्चा की गई है, उन पर अमल भी किया जाए. बैठकें तो होती ही रहती हैं. इसकी बैठक भी हर दो साल के बाद होती है, लेकिन जब तक सकारात्मक नतीजे सामने नहीं आएंगे तब तक इसकी बैठकों की सफलता का दावा करना बेमानी होगा. इस संगठन को चाहिए कि आर्थिक रिश्ते सुधारने की कोशिश करे तथा आपसी सहयोग के आधार पर वैश्विक चुनौतियों से निपटने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखलाए. अगर इस संगठन को अपनी प्रासंगिकता बरक़रार रखनी है तो फिर चर्चाओं को ज़मीनी हक़ीक़त में बदलना होगा, वरना यह एक-दो वर्षों में होने वाली उत्सव बनकर रह जाएगी.

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