हस्‍तकलाओं का अस्तित्‍व खतरे में

इक्कीसवीं सदी के ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड में व्यापार लोगों को जोड़ने वाली सबसे शक्तिशाली चीज़ों में से है. लेकिन आश्चर्य यह है कि व्यापार की ब़ढती समृद्धि के साथ ग़रीबी भी ब़ढी है और इससे अमीरी और ग़रीबी के बीच की खाई ब़डी हो गई है. विश्व व्यापार में वे संभावनाएं हैं, जो ग़रीबी हटाने के साथ इकोनॉमिक ग्रोथ के लिए बेहतरीन माध्यम बन सकती हैं. लेकिन हस्तकला इस अवसर से महरूम है. समस्या यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार स्वाभाविक तौर पर उनकीज़रूरतों और हितों के विरोध में है, बल्कि समस्या यह है कि जो नियम व क़ानून इसकी अगुवाई करते हैं उसका फायदा स़िर्फ ब़डी कंपनियों को होता है. अच्छी तरह से प्रबंधित व्यापार में इतनी ताक़त होती है कि लाखों लोगों को ग़रीबी से उबारा जा सकता है, लेकिन ऐसा करने में सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है.

इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में आने वाले दूसरे लोगों से अपनी कला को प्रोत्साहित करने के लिए और इसे ब़ढावा देने के लिए नए आइडिया और तकनीक का सुझाव ले सकें और उन्हें इस्तेमाल कर सकें, कम समय में बेहतरीन काम हो सके. सरकार को हस्तकला से जु़डे कारीगरों की मदद के लिए क़दम उठाने चाहिए. लेकिन अ़फसोस की बात है कि ट्रेड फेयर में आने वाले नेता अपने-अपने कार्यक्षेत्र से जु़डी चीज़ों की तारी़फ करते हैं और कारीगरों की पीठ थपथपा कर वापस लौट जाते हैं. हर साल ट्रेड फेयर में लगभग यही नज़ारा देखने को मिलता है.

बहुत उम्मीद से जब नाजदां खातून ने गांव वालों को सिक्की कला सिखाना शुरू किया तो एक-दो दिन गांव की महिलाओं ने खूब उत्साह दिखाया. दोपहर के वक़्त उनके घर का आंगन आस-प़डोस की महिलाओं से भरा रहता था. नाजदां खातून वक़्त निकाल कर उन्हें ब़डी लगन से सिक्की कला सिखातीं, जो अब गांव में केवल उनकी और उनकी बेटी के हाथों की ही शान है. लेकिन कुछ ही दिनों में नाजदां खातून का आंगन धीरे-धीरे खाली होने लगा, एक-एक कर महिलाओं ने आना बंद कर दिया. वे इसे सीखने में आनाकानी करने लगीं. वजह, सिक्की कला सीखने और इससे माल तैयार करने में बहुत समय लग जाता है. हालांकि यह कला गांव की मिट्टी में रची बसी है, लेकिन इसकी खुशबू गुम हो गई. इसे संजोना संभव नहीं हो पाया. सिक्की कला गांव वालों के हाथों से छूटती जा रही है. यह गांववालों के जीवनयापन का ज़रिया बन पाए, ऐसा संभव नहीं हो सका. महिलाएं नाजदां खातून से कहतीं कि जितने वक़्त में वे सिक्की कला सीखकर एक शो पीस या कोई भी सजावट की वस्तु तैयार कर पाएंगी उतने दिन अगर वे किसी के खेत पर मज़दूरी करेंगी तो इससे ज़्यादा पैसा आएगा और परिवार की आय में ब़ढोत्तरी होगी. उनके घर आने वाली महिलाएं भी गांव में ही सेंटर की मांग करती हैं, जिससे वे बेहतर तरीक़े से सीख पाएं और उनकी कुछ न कुछ आमदनी रोज़ हो जाए. लेकिन सरकार की तऱफ से यहां सेंटर ले जाने की बात अभी दूर ही है. नाजदां खातून खुद का कच्चा माल और समय देकर भी इस कला को निपुण हाथों में सहेज नहीं पाएंगी, इस बात का उन्हें बेहद अ़फसोस है. राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में बिहार पैवेलियन में बैठी नाजदां खातून टी कोस्टर बनाते हुए आते-जाते लोगों को बिहार की सिक्की कला से ब़डे शौक़ से परिचित करवाती हैं. सिक्की कला के बारे में बताते हुए उनकी आंखों में गर्व झलकता है, लेकिन पूछने वाले के मु़डते ही आंखें निराशा से भर जाती हैं. दरअसल, पूरा दिन लगाकर सिक्की कला से बनाई गई एक टी कोस्टर की क़ीमत मात्र पचास रुपये है. सिक्की कला के क्राफ्ट बनाने में नाजदां खातून माहिर हैं. वह पटना के सरकारी प्रशिक्षण संस्थान के प्रशिक्षित लोगों से भी बेहतर क्राफ्ट बना सकती हैं, लेकिन वह अपनी कला से लाभान्वित नहीं हो पा रही हैं. वह देवी-देवताओं की मूर्तियां छोड़कर, केवल वैसी ही चीज़ें बनाती हैं जो शहरी कामकाज या मांग में शामिल हो सकें. अब साल में दो ही प्रदर्शनी कर पाती हैं, क्योंकि साल भर में भी इतना माल तैयार नहीं हो पाता कि हर प्रदर्शनी में अपनी कला प्रदर्शित कर सकें. त्रिपुरा के बैम्बू आर्टिस्ट सुभाष का स्टॉल ट्रेड फेयर में पहली बार लगा. सुभाष उस समय का़फी खुश हुए जब एक एक्सपोर्ट हाउस की तऱफ से उन्हें बैम्बू के 5000 मिठाई के डिब्बे बनाने का ऑर्डर मिला. लेकिन निराशा तब हुई जब उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि उनके पास न तो इतने कारीगर हैं और न ही इतना कच्चा माल है कि वह एक महीने में माल तैयार कर सकें. सुभाष ने चार-पांच सौ पीस देने की बात कही, पर एक्सपोर्ट हाउस की मांग के अनुसार न होने की वजह से यह ऑर्डर उनके हाथ से निकल गया. कम संसाधन और निपुण हाथों की कमी की वजह से सुभाष को ट्रेड फेयर में आने का प्रयोजन पूरा होता नहीं लगता है. उत्तर प्रदेश के खुर्जा के रईसुद्दीन इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में अपना पुश्तैनी काम मेटल ऑक्साइड से पेंटिग करने की विद्या की प्रदर्शनी लगाकर बैठे हैं. वह फ्लॉवर वाश, क्रॉकरी और दूसरी सजावट की वस्तुएं बनाकर और उन पर ऑक्सीडाइज्ड पेंट करते हैं. यही उनका पुश्तैनी काम है. वैसे तो यह काम 400 साल पुराना है, लेकिन धीरे-धीरे इसकी साख खत्म होती जा रही

है. कभी इस कला का ग़ढ माने जाने वाले खुर्जा में अब लगभग 20 ही ऐसे कारीगर बचे हैं जो इस महीन और बेहतरीन काम को करते हैं. रईसुद्दीन के पिता, दादा, परदादा ने इस काम को बाक़ायदा खुदा की इनायत समझ कर किया था, लेकिन उन्होंने बीएससी करके नौकरी नहीं मिल पाने की वजह से इस काम को अपने हाथों में लिया. हालांकि वह इस कला को प्रेम से करते हैं, लेकिन आने वाली पी़ढी इसमें रुचि दिखाएगी, यह संभव नहीं लगता है. रईसुद्दीन कहते हैं कि यह कंप्यूटर का युग है और बच्चे अपना मनपसंद करियर चुनने के लिए स्वतंत्र हैं. वैसे भी इस कला को लेकर इलाक़े में कोई जागरूकता लाने की ऐसी कोशिश नहीं की गई जिससे अगली पी़ढी इस कला में रोज़गार की संभावनाएं तलाश कर सके. फिलहाल रईसुद्दीन अपनी अगली पी़ढी को विरासत में अपने पुरखों की शान इस कला की निपुणता नहीं दे पाएंगे, इसका अ़फसोस उन्हें बेहद सालता है. ट्रेड फेयर के अलग-अलग पैवेलियन में ऐसी कई कहानियां हैं, जो विकास के मुहाने पर ख़डी हैं, जिन्हें अगर हाथ ब़ढाकर थाम लिया जाए तो उन्हें जीवन मिल जाएगा, और अगर इससे मुंह फेर लिया जाए तो हस्तकलाओं को विलुप्त होने से कोई नहीं बचा पाएगा. विभिन्न राज्यों के पैवेलियन में जहां ब़डी-ब़डी कंपनियों के स्टॉल राज्यों की समृद्धि का परिचय देते हैं, वहीं कोनों में बिखरी ऐसी कहानियां कंपनियों के ज़रिये राज्य के विकास को मुंह च़िढाती हैं. 31वें ट्रेड फेयर की थीम इंडियन हैंडीक्राफ्ट्‌स-द मैजिक ऑफ गिफ्टेड हैंड्‌स की सार्थकता कम हो जाती है, जब कला का जादू बिखेरने वाले इन कलाकारों के हालात का जायज़ा लेते हैं. विभिन्न राज्यों से आए हस्त कलाकार मन में अपनी कला को वैश्विक स्तर पर फैलाने का सपना लेकर ट्रेड फेयर में आते हैं. उनकी कला का आकर्षण व्यापारियों और दूसरे लोगों को प्रभावित भी करता है, लेकिन संसाधनों आदि में कमी की वजह से इन कलाओं का जादू बिखरने से पहले ही खत्म हो जाता है. साल 1980 से प्रगति मैदान में शुरू हुए इंटरनेशनल ट्रेड फेयर का उद्देश्य व्यापार को ब़ढावा देना और भारतीय विशिष्ट कलाओं को सफल रोज़गार का ज़रिया बनाने को वैश्विक प्लेटफॉर्म देना रहा है, लेकिन व्यापार मेले के हर पैवेलियन में लगे ब़डी-ब़डी कंपनियों और इंडस्ट्रीज के स्टॉल इस उद्देश्य को विपरीत दिशा में ले जाते हैं. पूर्वी चंपारण में शीप ज्वैलरी के कारीगर मो. वसीम हैदर की स्टॉल पर आते ही फैशन डिज़ाइनर पायल जोशी की आंखें खुशी से चमकने लगती हैं, क्योंकि उन्हें बेहतरीन क्वालिटी की शीप ज्वैलरी बहुत कम दामों पर उपलब्ध हो गई. नदी के किनारे मिलते शीप की ज्वैलरी का फैशन गाहे-बगाहे लौट कर आता रहता है. एक फैशन शो या डिज़ाइन में इस्तेमाल के बाद यह लेटेस्ट ज्वैलरी ट्रेंड बन जाता है. लेकिन जो डिज़ाइनर्स इनका इस्तेमाल करते हैं वे इस तरह की ज्वैलरी को बाहर से मंगवाते हैं, यानी जो चीज़ देश के गांवों में कम क़ीमत पर उपलब्ध हो सकती है, सरकारी नीतियों में कमी और अनदेखी की वजह से लुप्त हो जाती है और वही चीज़ बाहर से महंगे दामों में खरीदकर उनका इस्तेमाल किया जाता है. मो. वसीम हैदर बताते हैं कि पूर्वी चम्पारण में शीप ज्वैलरी की लगभग 500 फैक्ट्रियां हैं, जिनमें से आधी से ज़्यादा बंद हो गई हैं. कारीगरों और संसाधनों की कमी से यह कला लुप्त हो रही है. लोग अब शहर जाकर या तो नौकरी करने लगे हैं या किसी और बिजनेस से जु़ड गए हैं. हस्तकला से जु़डे कलाकारों की समस्याएं ब़डी हैं. अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में प्रदर्शनी लगाने भर से इन समस्याओं का निदान संभव नहीं है और जब तक उनकी मूल समस्याओं का निदान नहीं होगा, तब तक ये प्रदर्शनियां बाहर से आने वाले बिजनेस डेलिगेट्‌स और लोगों के लिए केवल देखने और सराहना करने भर का साधन बनकर रह जाएंगी. दरअसल, हस्तकला से ज़ुडे कारागरों को परेशान करती है, उनके क्षेत्र में स्लो मार्केट ग्रोथ, एडवर्स प्राइस ट्रेंड्‌स और लो वैल्यू ऐड. हस्तकला से ज़ुडे शिल्पकार अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में इसलिए आते हैं, ताकि उन्हें भी इस क्षेत्र से जु़डे ब़डे व्यापार-उद्योग की जानकारी मिल सके, और अपनी क्षमता अनुसार इसमें वे भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें. इसके अलावा विदेशी और शहरी मार्केट के ट्रेंड और मांग को समझ सकें. इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में आने वाले दूसरे लोगों से अपनी कला को प्रोत्साहित करने के लिए और इसे ब़ढावा देने के लिए नए आइडिया और तकनीक का सुझाव ले सकें और उन्हें इस्तेमाल कर सकें, कम समय में बेहतरीन काम हो सके. सरकार को हस्तकला से जु़डे कारीगरों की मदद के लिए क़दम उठाने चाहिए. लेकिन अ़फसोस की बात है कि ट्रेड फेयर में आने वाले नेता अपने-अपने कार्यक्षेत्र से जु़डी चीज़ों की तारी़फ करते हैं और कारीगरों की पीठ थपथपा कर वापस लौट जाते हैं. हर साल ट्रेड फेयर में लगभग यही नज़ारा देखने को मिलता है.

अंतराष्‍ट्रीय व्‍यापार मेला 2011

राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान में बिहार पैवेलियन में बैठी नाजदां खातून टी कोस्टर बनाते हुए आते-जाते लोगों को बिहार की सिक्की कला से ब़डे शौक़ से परिचित करवाती हैं. सिक्की कला के बारे में बताते हुए उनकी आंखों में गर्व झलकता है, लेकिन पूछने वाले के मु़डते ही आंखें निराशा से भर जाती हैं. दरअसल पूरा दिन लगाकर सिक्की कला से बनाई गई एक टी कोस्टर की क़ीमत मात्र पचास रुपये है. सिक्की कला के क्राफ्ट बनाने में नाजदां खातून माहिर हैं.

रीतिका सोनाली

युवा वर्ग की नब्ज़ को पढ़ने में माहिर और उनकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे पाने में कुशल रीतिका सोनाली हमेशा कुछ हट कर करने में जुटी रहती हैं।
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रीतिका सोनाली

युवा वर्ग की नब्ज़ को पढ़ने में माहिर और उनकी आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे पाने में कुशल रीतिका सोनाली हमेशा कुछ हट कर करने में जुटी रहती हैं।