इलेक्ट्रॉनिक नाक और टीबी

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इसे टीबी के मरीज़ों के लिए अच्छी खबर कहा जा सकता है. असल में भारतीय वैज्ञानिकों का दावा है कि वे एक इलेक्ट्रॉनिक नाक बना रहे हैं जिससे सांस का परीक्षण किया जाएगा और ट्यूबरकुलोसिस यानी टीबी का तुरंत पता लगाया जा सकेगा. इस तेज़ जांच से कई हज़ार ज़िंदगियां बचाई जा सकेंगी. ई नोज यानी इलेक्ट्रॉनिक नाक बैटरी से चलेगी और बहुत छोटा सा उपकरण होगा. ठीक उसी तरह का जैसे पुलिस सांस में अल्कोहोल की मात्रा जांचने के लिए रखती है. मरीज़ से कहा जाएगा कि वह इस ई नाक में सांस छोड़े. उपकरण में लगे सेंसर टीबी के अंदेशे को भांप लेंगे. इसके नतीजे एकदम मिलेंगे और का़फी हद तक सटीक भी. ई नाक नई दिल्ली के जेनेटिक इंजीनियरिंग और बायोटेक्नोलॉजी अंतरराष्ट्रीय सेंटर और कैलिफोर्निया की नेक्स्ट डाइमेंशन टेक्नोलॉजी का साझा प्रयास है. दुनिया भर में हर साल टीबी या क्षय रोग के कारण 17 लाख लोगों की मौत हो जाती है और शोधकर्ताओं का मानना है कि ई नोज के कारण विकासशील देशों में सालाना कम से कम चार लाख लोगों की ज़िंदगियां बच जाएंगी, क्योंकि क्षय रोग जल्दी पकड़ में आ जाएगा और इसलिए इलाज भी व़क्तसे होगा.

अभी हाल में इस प्रोजेक्ट को बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और ग्रैंड चैलेंजेस कनाडा की ओर से साढ़े नौ लाख डॉलर की मदद मिली है. वैज्ञानिकों के मुताबिक़, हमारा शोध दिखाता है कि नई तकनीक की मदद से दूसरी बीमारियों जैसे फेफड़ों के कैंसर और न्यूमोनिया जैसी बीमारियों का भी जल्दी पता लग सकता है. ई नोज की क़ीमत 20 से 30 डॉलर होगी. छोटे आकार और बैटरी से चलने के कारण यह गांवों में भी आसानी से इस्तेमाल की जा सकेगी. ऐसे इलाक़ों में भी जहां बिजली की समस्या है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के  मुताबिक़, भारत में सबसे ज़्यादा टीबी का संक्रमण है और वहां हर रोज एक हज़ार लोग क्षय रोग के संक्रमण का शिकार होते हैं. नंदा ने कहा, हमारा लक्ष्य है कि इलेक्ट्रॉनिक नाक ग़रीब और दूर-दराज़ के इलाक़ों में उपलब्ध करवाई जाए, जहां अक्सर ट्यूबरकुलोसिस के बहुत मामले सामने आते हैं और जानलेवा बन जाते हैं. इस अजीबो-ग़रीब ई नोज से टीबी का इलाज वाक़ई दिलचस्प है.

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