गुजरात बनाम बिहार : आर्थिक विकास की पोल खोलता मानव विकास

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अमेरिका से प्रशंसा पा चुके नरेंद्र मोदी के लिए यह वाकई अच्छी ख़बर नहीं थी. मानव विकास सूचकांक 2011 की रिपोर्ट ने गुजरात को मानव विकास से संबंधित कुछ मामलों में बिहार से भी पीछे बताया, कुछ मामलों में बिहार और उत्तर प्रदेश को गुजरात से आगे. रिपोर्ट के मुताबिक़, औद्योगिक रूप से विकसित राज्य गुजरात में कुपोषण की दर सबसे अधिक है. गुजरात में प्रति व्यक्ति आय अधिक है, फिर भी भूख और कुपोषण है. केंद्र सरकार से संबद्ध इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लाइड मैनपावर रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के लगभग 45 फीसदी बच्चे, जो 5 साल से कम उम्र के हैं, कुपोषण के शिकार हैं. वहीं राज्य के 70 फीसदी बच्चे एनीमिया से ग्रसित हैं. दरअसल, यह रिपोर्ट अपने-आप में कई सारे सवाल खड़े करती है. मसलन, जब एक विकसित राज्य या आर्थिक विकास की बात होती है तो असल में वह किसका विकास होता है. बढ़े हुए उत्पादन से कितने ग़रीबों को गुणवत्तापूर्ण भोजन मिल पाता है, निजी अस्पतालों में कितने लोगों का इलाज हो पाता है और बिजलीघर लगाने से कितने ग़रीबों के घरों में रोशनी आती है.

मानव विकास सूचकांक 2011 की रिपोर्ट में दर्ज तथ्य और आंकड़े बताते हैं कि किसी राज्य का आर्थिक विकास करना या उसका शोर मचाना वहां की जनता की ख़ुशहाली की गारंटी नहीं हो सकता. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट (मई 2011) के मुताबिक़, अब भी बिहार में प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है और देश के जीडीपी में इसका योगदान महज़ 2.71 फीसदी है, वहीं 11 फीसदी से भी ज़्यादा विकास दर दिखाकर बिहार सरकार गुलाबी तस्वीर पेश कर रही है. दूसरी ओर शिशु मृत्यु दर अभी भी यहां प्रति एक हज़ार पर 52 है और 2008 के आंकड़े के मुताबिक़, प्रसव के दौरान मातृ मृत्यु दर प्रति एक हज़ार पर 298 थी.

गुजरात के मुक़ाबले मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मामलों में बिहार और झारखंड जैसे राज्यों की स्थिति पहले से बेहतर होने की बात कही है, लेकिन यह भी माना है कि अन्य राज्यों की तुलना में स्थिति अभी भी अच्छी नहीं है. कुपोषण और गंदगी अब भी एक बड़ी समस्या है. बिहार को ख़ुश होने के लिए कुछ और भी बातें इस रिपोर्ट में शामिल हैं, जैसे अन्य पिछड़े वर्ग के लोग बिहार की ऊंची जाति के लोगों से स्वास्थ्य सेवा मानकों के आधार पर बेहतर हालत में हैं या फिर बिहार में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों पर 2005-08 के मुक़ाबले अब 0.4 प्रतिशत ज़्यादा ख़र्च किया जा रहा है, लेकिन इस रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि अभी भी अन्य राज्यों की तुलना में यह बहुत कम है और इसे बढ़ाने के लिए और ज़्यादा कोशिश करनी होगी.

औद्योगीकरण और बढ़ती विकास दर एवं जीडीपी, फिर भी बच्चे भूखे और कुपोषित. बेरोज़गारी, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और यहां तक कि घरों में शौचालय तक नहीं. मानव विकास सूचकांक रिपोर्ट 2011 की कहानी कुछ ऐसी ही है. यह हाल उन राज्यों का है, जिनके विकास की चर्चा देश-विदेश में हो रही है. अमेरिका यहां के मुख्यमंत्रियों की पीठ थपथपा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि आख़िर यह किसका विकास हो रहा है, इस आर्थिक विकास का मानव विकास में क्या योगदान है?

बहरहाल, यह रिपोर्ट बिहार जैसे राज्य के लिए किसी सीख से कम नहीं है. पिछले कुछ सालों से बिहार में तीव्र विकास दर हासिल करने की बात कही जा रही है. आंकड़ों की मदद से इसे साबित भी किया जाता रहा है. ऐसा भी नहीं है कि इन दावों को सिरे से ख़ारिज कर दिया जाए. दरअसल, नीतीश सरकार से पहले बिहार 15 सालों तक जिस हालात से गुजरा, उसके मुक़ाबले अब पिछले कुछ सालों में स्थितियां बदली हैं और इसी बदलती स्थिति का फायदा अब बिहार सरकार उठा रही है यानी शून्य से शुरू करने वाली सरकार यह नहीं बताती कि असल में कितना विकास हुआ. इसके उलट वह शून्य के मुक़ाबले हुए विकास का प्रतिशत जनता के सामने रख रही है. उदाहरण के लिए केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट (मई 2011) के मुताबिक़, अब भी बिहार में प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है और देश के जीडीपी में इसका योगदान महज़ 2.71 फीसदी है, वहीं 11 फीसदी से भी ज़्यादा विकास दर दिखाकर बिहार सरकार गुलाबी तस्वीर पेश कर रही है. दूसरी ओर शिशु मृत्यु दर अभी भी यहां प्रति एक हज़ार पर 52 है और 2008 के आंकड़े के मुताबिक़, प्रसव के दौरान मातृ मृत्यु दर प्रति एक हज़ार पर 298 थी. ज़ाहिर है, मानव विकास सूचकांक 2011 की रिपोर्ट में दर्ज तथ्य और आंकड़े बताते हैं कि किसी राज्य का आर्थिक विकास करना या उसका शोर मचाना वहां की जनता की ख़ुशहाली की गारंटी नहीं हो सकता. ज़ाहिर है, यह रिपोर्ट बिहार सरकार के लिए भी एक सबक है. सबक यह कि आर्थिक विकास की अंधी दौड़ में जनता की मूल समस्याओं को भी याद रखना होगा और उनके समाधान के लिए ईमानदारी से काम करना होगा.

मानव विकास सूचकांक

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