हार्मोंस, महिलाएं और ट्यूमर

नीदरलैंड कैंसर संस्थान के नए शोध में बताया गया है कि आईवीएफ ट्रीटमेंट के कारण बॉर्डर लाइन ट्यूमर का ख़तरा बढ़ जाता है. यूरोपीय सोसाइटी ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी की मासिक शोध पत्रिका में छपे इस शोध में यह जानकारी दी गई है. बॉर्डर लाइन ट्यूमर ओवेरियन कैंसर से जुड़े हैं. समस्या यह है कि इन्हें निश्चित तौर पर कैंसरकारक ट्यूमर की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. इस तरह के ट्यूमर का पता लगने के बाद निश्चिंत भी नहीं रहा जा सकता. हैम्बर्ग में रिप्रोडक्टिव मेडिसिन के जानकार मिशाएल लुडविग कहते हैं, बॉर्डर लाइन ट्यूमर अक्सर दोनों तऱफ होते हैं और इनका ऑपरेशन ज़रूरी होता है, जिसमें अंडाशय भी हटाना पड़ता है. हालांकि मिशाएल लुडविग यह भी कहते हैं कि इन ट्यूमरों के कैंसर में तब्दील होने की आशंका न के बराबर होती है. आईवीएफ उन दंपत्तियों के लिए आख़िरी उपाय होता है, जो संतानहीन हैं. इस प्रक्रिया में महिलाओं के अंडाशय में हार्मोन डाले जाते हैं, ताकि ज़्यादा अंडे बन सकें. शोधकर्ताओं ने इस शोध के लिए 25,152 महिलाओं की जांच की, जिनमें से 19,146 महिलाओं को 1983 से 1995 के बीच आईवीएफ के दौरान हार्मोन का इंजेक्शन दिया गया था. शोधकर्ताओं ने पाया कि आईवीएफ ट्रीटमेंट लेने वाली महिलाओं में ट्यूमर होने की आशंका ज़्यादा थी. आईवीएफ के 77 मामलों में से 61 को ओवेरियन ट्यूमर हुआ. बाक़ी 31 मामले बॉर्डर लाइन ओवेरियन ट्यूमर के थे, जिनके कैंसर में बदलने की आशंका रहती है. ऐसे ट्यूमर जानलेवा साबित हो सकते हैं और इनके लिए ऑपरेशन ज़रूरी है. शोधकर्ताओं ने महिलाओं की उम्र, उनके बच्चे हैं या नहीं और कुछ अन्य तथ्यों पर नज़र डालने के बाद पाया कि आईवीएफ ग्रुप में ओवेरियन ट्यूमर का ख़तरा दोगुना हो गया.

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