भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए गठित इब्सा (आईबीएसए) की पांचवीं बैठक बीते 18 अक्टूबर को दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया में संपन्न हुई. बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा एवं ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रौसेफ ने हिस्सा लिया. तीनों देशों के प्रमुखों ने कई मुद्दों पर आपसी सहमति जताई. बैठक को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि यूरोप और विकसित देशों को अपने यहां मंदी रोकने के लिए जल्द ही प्रभावी क़दम उठाने चाहिए. विकसित देशों में आई मंदी का ख़ामियाज़ा विकासशील देशों को भुगतना पड़ता है. उन्होंने कहा कि यूरोप में सरकारी क़र्ज़ संकट तो चिंता का विषय है ही, इसके अलावा अमेरिका, यूरोप और जापान जैसी परंपरागत रूप से मज़बूत अर्थव्यवस्थाओं के मंदी की चपेट में आने से वैश्विक वित्तीय और पूंजी बाज़ारों में अच्छा संदेश नहीं जाएगा. अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की इन बातों पर विचार किया गया और इन्हें अन्य दोनों राष्ट्राध्यक्षों ने भी स्वीकार किया. तीनों नेताओं ने कहा कि नई आर्थिक मंदी से वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने और उसे मज़बूत आधार प्रदान करने के लिए जी-20 देशों के बीच नीतिगत समन्वय की आवश्यकता है. तीनों देशों ने एक-दूसरे के सहयोग से अपनी अर्थव्यवस्था मज़बूत करने की भी बात कही.
भारत के लिए इस संगठन की काफी अहमियत है. तेजी से बढ़ती इन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ बेहतर संबंध भारत के हित में हैं. इन दोनों देशों को बड़े स्तर पर निवेश की आवश्यकता है और भारतीय कंपनियां अब विदेशों में निवेश करने के लिए तैयार भी हैं. यदि भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो यह ज़रूरी है कि वह दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों के साथ अपने आर्थिक संबंध मज़बूत करें. भारत पर इन देशों को चीन से ज़्यादा भरोसा है, लेकिन केवल भरोसे से काम नहीं चलता.
अर्थव्यवस्था के अलावा जिन मुद्दों को बैठक में शामिल किया गया, उनमें अंतरराष्ट्रीय संगठनों में होने वाली नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने, सुरक्षा परिषद का विस्तार, दोहा वार्ता को सफल बनाने के प्रयास और पर्यावरण सुरक्षा आदि प्रमुख थे. मनमोहन सिंह ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों में होने वाली नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने की बात जोर-शोर से उठाते हुए कहा कि इन संस्थाओं में नियुक्ति करते समय योग्यता का ध्यान रखा जाए, न कि किसी देश विशेष का. उनका उद्देश्य मुख्य रूप से विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख पद पर कुछ विकसित देशों के दबदबे की ओर अन्य देशों का ध्यान आकर्षित करना था. दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जूमा एवं ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रौसेफ ने भी अपने विचार व्यक्त किए. जुमा ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था असंतुलन को दर्शाती है. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का झुकाव विकसित देशों की ओर है, इसीलिए विकासशील देशों के साथ न्याय नहीं हो पाता है. सुरक्षा परिषद में विस्तार का मुद्दा भी इस बैठक में प्रमुखता से उठाया गया. भारतीय प्रधानमंत्री ने सुरक्षा परिषद के विस्तार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. उन्होंने कहा कि अगर सुरक्षा परिषद को वास्तव में अपनी भूमिका निभानी है तो उसे विश्व व्यवस्था में हो रहे नए परिवर्तनों को स्वीकार कर ख़ुद का विस्तार करना होगा.
ग़ौरतलब है कि भारत सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता पाने के लिए काफी समय से प्रयास कर रहा है, लेकिन कुछ देशों को भारत का स्थायी सदस्य बनना मंजूर नहीं है, इसलिए अब तक ऐसा नहीं हो सका. हालांकि भारत अकेले सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनने की बात नहीं करता, बल्कि उसका विस्तार चाहता है. इसके लिए भारत, ब्राजील, जापान एवं जर्मनी ने जी-4 नामक संगठन भी बनाया है. अफ्रीका के प्रतिनिधि के रूप में यदि दक्षिण अफ्रीका को इसमें शामिल कर लिया जाता है तो भारत का पक्ष मज़बूत होगा. यह एक अच्छा संयोग है कि इस समय भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका तीनों ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य हैं. इसके अलावा तीनों देशों के नेताओं ने कई अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर भी अपनी बात रखी. भारतीय प्रधानमंत्री ने दोहा वार्ता सफल बनाने का आह्वान किया. सीरिया और लीबिया के मुद्दों पर भी चर्चा की गई. ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रौसेफ ने कहा कि सीरिया में शांति स्थापना के लिए प्रयास किए जाने चाहिए. उन्होंने लीबिया में नाटो की भूमिका की आलोचना करते हुए कहा कि अफ्रीका में शांति बहाली के लिए नाटो द्वारा किया गया सैन्य हस्तक्षेप उचित नहीं है. जैकब जुमा ने समुद्री लुटेरों के बढ़ते आतंक पर चिंता जताई और हिंद महासागर एवं अटलांटिक महासागर में बढ़ रहे ख़तरों के प्रति सावधान करते हुए इस समस्या से निपटने के लिए संयुक्त प्रयास की बात कही.
बैठक में हिस्सा लेने के बाद मनमोहन सिंह ने दोनों देशों के प्रमुखों से अलग-अलग वार्ता की. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए साझा प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया. दोनों देशों के बीच व्यापार में बढ़ोत्तरी हो रही है. पिछले साल जब जैकब जुमा भारत की यात्रा पर आए थे तो 2012 तक दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जिसे इस साल के मार्च महीने में ही पूरा कर लिया गया. यूं तो यह उत्साहवर्द्धक है, लेकिन भारत के लिए इसे बढ़ाने की कोशिश करना ज़रूरी है. भारत को यह बात याद रखनी चाहिए कि अभी भी दक्षिण अफ्रीका का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार चीन है. भारत को यदि इस देश के साथ संबंध बेहतर करने हैं तो इसके साथ आर्थिक संबंध और बढ़ाने होंगे. चीन से जुड़े आर्थिक हितों के कारण ही दक्षिण अफ्रीका ने दलाई लामा को वीजा नहीं दिया. भारत ने दक्षिण अफ्रीका से यूरेनियम उपलब्ध कराने की भी अपील की है. अगर दक्षिण अफ्रीका हमें यूरेनियम देता है तो यह लंबे समय के लिए हमारे देश के हित में होगा. दक्षिण अफ्रीका परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) का सदस्य है और एनएसजी ने भारत को छूट भी दी है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ब्राजील की राष्ट्रपति के साथ भी वार्ता की और दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने के तरीक़ों पर विचार-विमर्श किया. भारतीय प्रधानमंत्री ने दोनों देशों के प्रमुखों को अगले साल दिल्ली में होने वाले ब्रिक (ब्राजील, रूस, भारत, चीन) सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया और अगला इब्सा सम्मेलन भारत में कराने का प्रस्ताव भी रखा, जिसे दोनों देशों ने स्वीकार कर लिया.
भारत के लिए इस संगठन की काफी अहमियत है. तेजी से बढ़ती इन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ बेहतर संबंध भारत के हित में हैं. इन दोनों देशों को बड़े स्तर पर निवेश की आवश्यकता है और भारतीय कंपनियां अब विदेशों में निवेश करने के लिए तैयार भी हैं. यदि भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो यह ज़रूरी है कि वह दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों के साथ अपने आर्थिक संबंध मज़बूत करें. भारत पर इन देशों को चीन से ज़्यादा भरोसा है, लेकिन केवल भरोसे से काम नहीं चलता. चीन इन देशों में निवेश करता है. विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मुद्दों जैसे आईएमएफ, विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और सुरक्षा परिषद आदि में सुधार के लिए भी भारत को इन देशों के सहयोग की आवश्यकता होगी और इन्हें भारत की. सबसे बड़ी बात तो यह है कि यदि विकासशील देशों के ऐसे संगठन अपने उद्देश्य में कामयाब होते हैं तो विकसित देशों पर इनकी निर्भरता कम होगी. दक्षिण-दक्षिण सहयोग से ही विकासशील देशों का विकास होगा, अन्यथा विकसित देश हमेशा अपने लाभ के लिए इनका उपयोग करते रहेंगे.
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