पड़ोस में सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण और क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में उदय होने के कारण भारत ने रक्षा के आधुनिकीकरण की एक विशाल योजना तैयार की है. स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान (एसआईपीआरआई) द्वारा हाल ही में प्रकाशित अध्ययन में भारत को 2006 और 2010 के बीच हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश बताया गया है और उद्योग के आधुनिकीकरण के लिए 80 बिलियन डॉलर का अनुमान लगाया है. पिछले दशक में 7 और 9 प्रतिशत के बीच सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वार्षिक वृद्धि के साथ और सैनिक क्षमता बढ़ाने के लिए नियमित रूप से निवेश करने की सरकारी प्रतिबद्धता के कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अपने शेयर के रूप में भारत का व्यय 2.5 से 3 प्रतिशत तक अपेक्षाकृत स्थिर रहा है. इसके परिणामस्वरूप 2001 से भारत के रक्षा बजट में 64 प्रतिशत (वास्तविक अर्थों में) की वृद्धि हुई है और 2011-2012 बजट में यह राशि 36.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी और इसी कारण दीर्घकालीन अर्जन की योजनाओं का कार्यान्वयन भी संभव हो पाया है. इसलिए भारत के पास अपनी सेना को आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ाने की इच्छा भी है और क्षमता भी. रक्षा के कुल बजट में से लगभग 40 प्रतिशत (अर्थात 14.5 बिलियन डॉलर) रक्षा पूंजी परिव्यय बजट के लिए आवंटित किया गया है, जिससे हथियारों की प्राप्ति, निर्माण और अधिष्ठापनों और अतिरिक्त अवसंरचनाओं का अनुरक्षण और अन्य सैन्य उपकरणों के आधुनिकीकरण का वित्त पोषण किया जा सकेगा. दिलचस्प बात तो यह है कि पिछले दशक में भारतीय वायु सेना के पूंजी परिव्यय बजट के उसके शेयर में 6 से 7 प्रतिशत वृद्धि हुई है, जबकि भारतीय थल सेना और जल सेना के शेयर में कुछ गिरावट आई है. वर्तमान पूंजी परिव्यय बजट में शेयर का एक बड़ा हिस्सा 40 प्रतिशत वायु सेना को ही मिलता है, जबकि भारतीय थलसेना और जलसेना के क्रमशः 25 से 20 प्रतिशत हिस्सा ही मिलता है. शेष राशि रक्षा मंत्रालय के अनुसंधान व विकास और सैन्य उत्पादन के तत्वों पर ख़र्च की जाती है.
भारत के पास अपनी सेना को आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ाने की इच्छा भी है और क्षमता भी. रक्षा के कुल बजट में से लगभग 40 प्रतिशत (अर्थात 14.5 बिलियन डॉलर) रक्षा पूंजी परिव्यय बजट के लिए आवंटित किया गया है, जिससे हथियारों की प्राप्ति, निर्माण और अधिष्ठापनों और अतिरिक्त अवसंरचनाओं का अनुरक्षण और अन्य सैन्य उपकरणों के आधुनिकीकरण का वित्त पोषण किया जा सकेगा. दिलचस्प बात तो यह है कि पिछले दशक में भारतीय वायु सेना के पूंजी परिव्यय बजट के उसके शेयर में 6 से 7 प्रतिशत वृद्धि हुई है, जबकि भारतीय थल सेना और जल सेना के शेयर में कुछ गिरावट आई है.
परंतु अतीत के विपरीत भारत को आशा है कि सैन्य आधुनिकीकरण के वर्तमान प्रयास आयात पर बहुत हद तक निर्भर नहीं होंगे. जनवरी, 2011 में रक्षा मंत्री ने भारत की अब तक की पहली रक्षा उत्पादन नीति को अनावृत किया है. इस रक्षा उत्पादन नीति को सरकार और उद्योग जगत के विभिन्न हितधारकों से सुझाव लेकर तैयार किया गया था. इनमें तटरक्षक, समन्वित रक्षा कर्मचारी और रक्षा अनुसंधान व रक्षा विकास संघ (डीआरडीओ) की तीनों सेवाएं, भारतीय उद्योग संगठन (आईएलए), भारतीय उद्योग संघ (सीएआई) और भारतीय वाणिज्य व उद्योग महासंघ (एफआईसीसीआई) शामिल थे.
घरेलू उद्योग आधारित रक्षा की क्षमता को बढ़ाने की इच्छा में दो बातें महत्वपूर्ण थीं. उद्योग के घरेलू रक्षा संबंधी क्षेत्रों को बढ़ावा देने की इच्छा और यह विश्वास कि अपनी रक्षा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना एक ऐसा संकेत है कि भारत एक वैश्विक महाशक्ति है. और अतीत में इस बारे में किए गए प्रयासों के ठीक विपरीत हाल ही में जारी रक्षा उत्पादन नीति इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इसमें संक्षेप में प्राप्ति संबंधी गूढ़ दस्तावेज़ों में इस आशय को छिपाकर रखने के बजाय घरेलू रक्षा के औद्योगिक आधार का समर्थन करने वाला रक्षा मंत्रालय का एजेंडा स्पष्ट रूप से झलकता है. इसके अलावा रक्षा उत्पादन नीति में देश के निजी क्षेत्र (लघु व मझौले आकार के उद्यम सहित) की भूमिका को और अधिक रेखांकित किया गया है और साथ ही देश के रक्षा अनुसंधान व विकास के आधार को व्यापक बनाने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया गया है.
घरेलू उद्योग आधारित रक्षा की क्षमता को बढ़ाने की इच्छा में दो बातें महत्वपूर्ण थीं. उद्योग के घरेलू रक्षा संबंधी क्षेत्रों को बढ़ावा देने की इच्छा और यह विश्वास कि अपनी रक्षा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना एक ऐसा संकेत है कि भारत एक वैश्विक महाशक्ति है.
तत्काल प्रभाव से लागू इस रक्षा उत्पादन नीति में यह स्पष्ट किया गया है कि इसमें प्राथमिकता रक्षा उपकरणों के देशी डिज़ाइन, विकास और विनिर्माण को ही दी जाएगी. उदाहरण के लिए केवल उन्हीं मामलों में विदेशी स्रोतों से प्राप्ति की जाएगी, जिनमें भारतीय उद्योग डिलीवरी करने की स्थिति में नहीं होंगे. विदेशी स्रोतों से प्राप्ति का निर्णय इस बात पर निर्भर होगा कि उपकरणों की कितनी शीघ्र आवश्यकता है और उपकरण की डिलीवरी में कितना समय लग सकता है. जिन मामलों में विदेशी स्रोतों के बारे में विचार किया जाएगा उनके बारे में रक्षा मंत्रालय सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की भागीदारी, संयुक्त वेंचर और कन्सोर्शिया का निर्माण जैसे अनेक मुद्दों को ध्यान में रखकर ही विचार करेगा. रक्षा उत्पादन नीति को लागू करने में भी भारत के नीति निर्माताओं और भारतीय उद्योग व अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के सामने अनेक चुनौतियां और अवसर हैं. भारत के रक्षा कर्मचारियों के सामने जो चुनौतियां हैं, वे इस प्रकार हैं- घरेलू औद्योगिक आधार से हमारी अपेक्षाएं क्या हैं? क्या भारत के पास अपेक्षित कार्यबल है? क्या रक्षा निवेश का स्तर इसकी अपेक्षाओं के अनुरूप है? घरेलू औद्योगिक आधार के निर्माण में भारत अन्य क्षेत्रों से क्या सीख सकता है? मुख्य अवसरों में निम्नलिखित शामिल हैं, औद्योगिक और राजनीतिक दृष्टि से अनूठी और नवोन्मेषकारी भागीदारी करने के अवसर का लाभ उठाना, अधिक उदार प्रौद्योगिकी अंतरण के लिए समझौते करना और वैश्विक दृष्टि से रक्षा और सुरक्षा का प्रतियोगी औद्योगिक आधार तैयार करना. भारत के अंतरराष्ट्रीय भागीदारों, विशेषकर अमेरिका के लिए, जिसके लिए अपने रक्षा बजट में कटौती करना आवश्यक हो गया है. भारत का रक्षा बाज़ार बहुत आकर्षक होगा. परंतु जब भारत में व्यापार के अवसर बहुत बढ़ जाएंगे तो इन भागीदारों को सलाह दी जा सकती है कि वे भारत के रक्षा बाज़ार को एक ऐसी रणनीतिक भागीदारी के संदर्भ में देखें, जिसमें आतंकवाद के प्रतिरोध, समुद्री डोमेन की जागरूकता और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता जैसे मुद्दों से जूझने के अवसर भी मिलेंगे. जैसे-जैसे रक्षा उत्पादन नीति लागू होती जाएगी, इसमें न केवल रक्षा कंपनियां होंगी, बल्कि एयरोस्पेस, सूचना प्रौद्योगिकी और सुरक्षा क्षेत्र जैसे व्यापक क्षेत्र भी शामिल होंगे और अंतरराष्ट्रीय भागीदार उन्हें पहले से ही चिन्हित कर सकेंगे. भारत का रक्षा उत्पादन नीति संबंधी दस्तावेज़ इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि पहली बार रक्षा मंत्रालय ने एक ऐसा एजेंडा तैयार किया है, जिससे रक्षा आधारित घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा. इसके अलावा रक्षा उत्पादन नीति के इस दस्तावेज़ में देश के निजी क्षेत्र (लघु व मझौले आकार के उद्यम सहित) को शामिल करने और साथ ही देश के रक्षा अनुसंधान व विकास के आधार को व्यापक बनाने की आवश्यकता पर भी ज़ोर दिया गया है. भारत की रक्षा उत्पादन नीति का यह दस्तावेज़ भारत और उसके अंतरराष्ट्रीय भागीदारों को एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है. भारत के रक्षा मंत्रालय को चाहिए कि वह नवोन्मेषकारी और रचनात्मक भागीदारी के समझौतों के प्रति अधिक ग्रहणशील होकर अपनी स्थिति को और मज़बूत बनाए और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों को चाहिए कि वे देश में रक्षा और सुरक्षा के उदीयमान औद्योगिक आधार पर रणनीतिक रवैया अपनाते हुए उसका लाभ उठाएं.
- भरत गोपालस्वामी और गाय बैन ऐरी
(भारत गोपालस्वामी कॉर्नेल विश्वविद्यालय में शांति व संघर्ष अध्ययन कार्यक्रम के रेपी संस्थान में स्कॉलर हैं. गाय बैन ऐरी रणनीतिक व अंतरराष्ट्रीय केंद्र में फैलो हैं और इसके रक्षा औद्योगिक पहल समूह के उप निदेशक हैं.)
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