लीबिया : अभी और बिगड़ेंगे हालात

कर्नल मोअम्मर अली गद्दाफ़ी ने 42 सालों तक लीबिया पर शासन किया. उनके मारे जाने के बाद दुनिया भर से जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उनमें यही कहा जा रहा है कि अब लीबिया के लोगों को शांति मिलेगी यानी कर्नल गद्दा़फी का मारा जाना अच्छी ख़बर है, किंतु आशंका इस बात की है कि वहां हालात अभी और बिगड़ेंगे. देखने वाली बात यह होगी कि राष्ट्रीय अंतरिम परिषद ख़ुद को कैसे व्यवस्थित करेगी, चुनाव कब होंगे, क्योंकि परिषद में कई तरह के आपसी विवाद हैं, विद्रोही सेना में अलग-अलग कई ब्रिगेड हैं. इसके अलावा विभिन्न जनजातियों की अपनी-अपनी समस्याएं और अंतर्विरोध हैं. हालात बता रहे हैं कि अनिश्चितता अभी बनी रहेगी. इससे पश्चिमी देशों की ज़िम्मेदारी बढ़ेगी. उन्हें सुनिश्चित करना होगा कि राष्ट्रीय अंतरिम परिषद स्थितियों को ठीक से संभाले, आपस में टकराव न हो और शांति का माहौल बना रहे.

दरअसल, अमेरिका की निगाहें तेल निर्यातक देशों पर हैं. इसी के चलते अमेरिका ने रासायनिक हथियारों की जांच की आड़ में इराक पर हमला कर तानाशाह सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटका दिया. मिस्र और लीबिया में भी उसका हस्तक्षेप बढ़ा है, जबकि मध्य पूर्व के देश अमेरिकी हस्तक्षेप पसंद नहीं करते. ईरान इस मामले में खुलकर अमेरिका का विरोध कर रहा है.

गद्दाफ़ी सितंबर 1969 में सत्ता में आए थे. उन्होंने सम्राट इदरीस को एक सैनिक कार्रवाई में सत्ता से हटाया था. उस वक़्त गद्दाफ़ी 27 साल के थे. मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर से प्रेरित गद्दाफ़ी उस समय अरब राष्ट्रवाद की फ़िज़ा में बिल्कुल फिट बैठे थे, लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र में अपने वक़्त के सभी प्रशासकों को पीछे छोड़ दिया. क़रीब 41 साल सत्ता में रहते हुए उन्होंने सरकार चलाने की अपनी एक अलग व्यवस्था कायम की. उत्तरी आयरलैंड के आईआरए जैसे हथियारबंद चरमपंथी गुटों के साथ-साथ फ़िलीपींस में इस्लामी कट्टरपंथी गुट अबु सय्याफ़ को समर्थन दिया. उन्होंने उत्तरी अफ्रीका के सबसे क्रूर तानाशाह के रूप में लीबिया पर राज किया. आख़िरी दिनों में स्कॉटलैंड में दिसंबर 1988 में पैन एम को उड़ाने के बाद अलग-थलग पड़े लीबिया को गद्दाफ़ी एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वीकार्य बनाने में सफल रहे थे. लीबिया को पश्चिमी देशों एवं कंपनियों ने उसके विशाल ईंधन भंडार की वजह से गले लगाना शुरू कर दिया था. इधर कुछ दिनों से तेल के लिए पश्चिमी देशों एवं कंपनियों के बीच लड़ाई चल रही थी. दरअसल, लीबिया का तेल उच्च स्तर का है. उसमें सल्फ़र की मात्रा बहुत कम है. हालांकि यह कुल तेल उत्पादन का केवल दो फ़ीसदी है, फिर भी बेहद महत्वपूर्ण है. बदले हालात में जहां तक लीबियाई तेल की मार्केटिंग का सवाल है तो लगता है कि अब यह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में मिलने लगेगा और इसका सकारात्मक असर विश्व स्तर पर दिखाई देगा. तेल की क़ीमतों में कुछ गिरावट भी हो सकती है.

जिस संघर्ष में गद्दा़फी मारे गए हैं, उसकी पृष्ठभूमि अरब देशों में हुए सत्ता विरोधी आंदोलन ने तैयार की थी. ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्ता विरोधी आंदोलन के बाद लीबिया में इसकी शुरुआत हुई. त्रिपोली में जब गद्दाफ़ी विरोधी आंदोलन शुरू हुआ तो बहुत क़ामयाब नहीं हो सका, लेकिन जब बेनगाज़ी में विद्रोह शुरू हुआ तो नाटो की सेना ने विद्रोहियों को हथियार भेजना शुरू कर दिया. नाटो के हस्तक्षेप के बाद गद्दाफ़ी का पतन सुनिश्चित हो गया था. उन्हें सत्ता से हटाने वाला विद्रोह फ़रवरी माह में बेनग़ाजी से शुरू हुआ. गद्दा़फी ने अपनी राजनीतिक विचारधारा को अपनी पुस्तक ग्रीन बुक में लोगों की सरकार के रूप में पेश किया. 1977 में गद्दाफ़ी ने लीबिया को एक जमाहिरिया घोषित किया, जिसका अर्थ है लोगों का राज, लेकिन वहां धन और तंत्र पर गद्दा़फी का ही क़ब्ज़ा बना रहा. गद्दाफ़ी ने लीबिया में कई राजनीतिक प्रयोग किए, जिन्हें उन्होंने सांस्कृतिक क्रांति का नाम दिया. अलग-अलग जनजातियों को एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल करके उन्होंने अपनी स्थिति मज़बूत की और वर्षों तक लीबिया के नायक बने रहे. अपनी सांस्कृतिक क्रांति के तहत उन्होंने सभी निजी व्यवसाय बंद कर दिए और अपने विरोधियों का हिंसक दमन भी किया. लॉकर्बी में एक हवाई जहाज़ को निशाना बनाने के बाद गद्दाफ़ी और लीबिया अंतरराष्ट्रीय पटल पर अलग-थलग पड़ गए. 2010 में लीबिया को तेल से 32 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कमाई हुई, लेकिन अधिकतर लीबियाई लोगों को इस धन से कोई लाभ नहीं हुआ. उनका रहन-सहन किसी ग़रीब देश के लोगों जैसा ही रहा. वहां बेरोज़गारी दर क़रीब 30 प्रतिशत है और लोग गद्दा़फी के शासन से त्रस्त थे. लीबिया के समाजवाद में मुफ़्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रियायती दरों पर आवास और यातायात शामिल है, लेकिन वेतन बहुत कम है. विदेशी निवेशों से मिलने वाला अधिकतर धन देश के चुनिंदा लोगों की जेब में जाता रहा है.

दरअसल, अमेरिका की निगाहें तेल निर्यातक देशों पर हैं. इसी के चलते अमेरिका ने रासायनिक हथियारों की जांच की आड़ में इराक पर हमला कर तानाशाह सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटका दिया. मिस्र और लीबिया में भी उसका हस्तक्षेप बढ़ा है, जबकि मध्य पूर्व के देश अमेरिकी हस्तक्षेप पसंद नहीं करते. ईरान इस मामले में खुलकर अमेरिका का विरोध कर रहा है. लीबिया का साथ देना ईरान की मजबूरी है, क्योंकि दोनों देश अमेरिका विरोधी हैं. बेलारूस इसलिए लीबिया का समर्थन कर रहा है, क्योंकि उसमें उसके राजनीतिक-आर्थिक हित हैं. रूस भी लीबिया का परोक्ष समर्थन कर रहा है. मध्य पूर्व में अमेरिका इसलिए विशेष रुचि ले रहा है, क्योंकि उसकी नज़र वहां स्थित तेल भंडारों पर है. गद्दा़फी के मारे जाने के बाद लीबिया के हालात बताते हैं कि अभी भी वहां शांति संभव नहीं है.

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