वर्तमान समय में देश का ध्यान समाज के कुछ तबकों के बीच की विषमता और उनके गुस्से को कम करने की ओर होना चाहिए. भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन यहां लोकतंत्र का मतलब केवल प्रत्येक पांच सालों के बाद होने वाला चुनाव रह गया है, जिसमें मतदाता भाग लेते हैं और अपना मत डालते हैं. उसे निष्पक्ष चुनाव कहा जाता है, लेकिन अगर देखा जाए तो भारत में लोकतंत्र का क्षरण हो रहा है, क्योंकि चुनाव के बाद जनप्रतिनिधि और मतदाता के बीच बामुश्किल ही कोई संपर्क रह पाता है. पहले के सांसद और विधायक अपने क्षेत्र का दौरा आज के सांसदों और विधायकों की अपेक्षा कहीं अधिक करते थे. एक सही लोकतंत्र उसे ही कहा जा सकता है, जिसमें सक्रिय नागरिक समाज हो, स्वतंत्र न्यायपालिका हो और एक सतर्क प्रेस-मीडिया हो, जो नागरिक अधिकारों के प्रति सचेत रहे, जिससे इन अधिकारों की रक्षा की जाए. उस लोकतंत्र का क्या उपयोग है, जिसमें एक बांध बनाने के लिए लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया जाता है, उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर किया जाता है.
ऐसी अधिकांश घटनाएं देश के आदिवासी इलाक़ों में घटती हैं. इनके साथ संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाती. हाल में घटी कुछ ऐसी ही घटनाओं ने माओवादी आंदोलन को बढ़ावा दिया है. इसी प्रकार की एक घटना अभी देखने को मिल रही है. कुडनकुलम नाभिकीय संयंत्र के लिए वहां के लोगों की ज़मीन ली जा सकती है और उनकी प्रतिक्रिया का भी अनुमान लगाया जा सकता है. रत्नगिरि के निकट जैतापुर में बन रहे नाभिकीय संयंत्र को भी ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में हमारे सामने प्रश्न यह है कि क्या 9 फीसदी आर्थिक विकास, बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और ठीकठाक विदेशी मुद्रा भंडार के साथ हम एक अच्छी अर्थव्यवस्था की बात कर सकते हैं, जबकि लाखों भारतीयों का जीवन स्तर निम्न है, साथ ही जो हमेशा इस बात से डरे रहते हैं कि वे उस घर और ज़मीन से कभी भी वंचित हो सकते हैं, जिन पर सैकड़ों वर्षों से उनका अधिकार रहा है. लेकिन जब वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए विरोध करते हैं तो शासन-प्रशासन बड़ी निर्दयता से उनका दमन कर देता है.
इसे हम अपने लोकतंत्र का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे. जब तक ऐसे लोगों को विकास में सहभागी नहीं बनाया जाता, तब तक उसे वास्तविक विकास कहा भी नहीं जा सकता. सभी सरकारें, यहां तक की सशस्त्र बल, सुरक्षाबल, प्रशासन और ज़िलाधिकारी आदि भी इस तरह प्रशिक्षित किए जाते हैं कि सभी प्रकार के विरोध को ये लोग क़ानून व्यवस्था की समस्या समझें. ये लोग समस्याओं की वजह जानने की कोशिश ही नहीं करते और उनके प्रति उदासीन रहते हैं. यह समस्या काफी गंभीर है. सरकार को इस बारे में विचार करना चाहिए और सामाजिक-स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से बातचीत करनी चाहिए, ताकि असंतुष्ट लोगों को समझाया जा सके तथा उन्हें समाज की मुख्य धारा में शामिल करके देश में शांति क़ायम की जा सके. उन लोगों को अभी तक इंसा़फ नहीं मिला है, अब और अधिक समय तक ऐसा करना देश के हित में कदापि नहीं होगा.
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