नेपालः शांति के लिए समझौता

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नेपाल की राजनीतिक पार्टियों के बीच का समझौता एक सराहनीय क़दम कहा जा सकता है. इस समझौते के तहत पूर्व माओवादियों में से कुछ को सेना में भर्ती किया जाएगा. जिन्हें सेना में नहीं लिया जा रहा है उन्हें सहयोग राशि दी जाएगी, ताकि वे नए जीवन की शुरुआत कर सकें. इस समझौते में नेपाल की तीन प्रमुख पार्टियों कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी), नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेताओं ने भाग लिया. गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से ही इस बात पर चर्चा जारी है कि जो माओवादी मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं, उनका क्या किया जाए. माओवादी प्रमुख पुष्प कमल दहल ने कहा था कि उन्हें सेना में जगह दी जाए, लेकिन सेना उनके प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार नहीं थी. सेना को अन्य राजनीतिक दलों का समर्थन भी प्राप्त था, जिसके कारण समझौता नहीं हो पाया था.  ग़ौरतलब है कि 2006 में नेपाल में गृह युद्ध की समाप्ति के बाद 19600 माओवादी संयुक्त राष्ट्रसंघ के शिविरों में रह रहे हैं. इस समझौते के अनुसार इनमें से एक तिहाई माओवादियों को सेना में भर्ती किया जाएगा. इसके अलावा क़रीब 12000 माओवादियों को मुफ्त शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाएगा. साथ ही उन्हें स्वरोज़गार के लिए 5 से 8 लाख तक की सहयोग राशि दी जाएगी, जिससे वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें. इस समझौते में एक खास बात यह है कि सेना में शामिल किए गए माओवादियों को किसी लड़ाई में नहीं भेजा जाएगा, बल्कि उन्हें निर्माण कार्य, जंगलों में पहरा देने तथा बचाव कार्यों में लगाया जाएगा. हो सकता है कि यह सेना और राजनीतिक पाटिर्यों के दबाव का नतीजा हो. जिन छापामारों के खिला़फ सेना कार्रवाई कर रही थी, उन्हें अपने साथ किसी लड़ाई में शामिल करने से वे हिचक रहे हैं. माओवादी प्रमुख पुष्प कमल दहल प्रचंड ने पत्रकारों से कहा कि हमने शांति प्रक्रिया में एक और पड़ाव पार कर लिया है और अब हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इसे लागू करने की है. हालांकि कुछ माओवादियों ने इस समझौते का विरोध किया है, लेकिन प्रचंड के इस समझौते में शामिल होने से यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह उन्हें समझा लेंगे.

नेपाल के राजनीतिक दलों के बीच हुए इस समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इस पर कितनी जल्दी अमल होता है. जिन माओवादियों को सुरक्षा बलों में शामिल किया जाएगा, उनके साथ पहले से कार्यरत सुरक्षा बलों के व्यवहार का ठीक होना भी ज़रूरी है. ऐसा न हो कि उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़े. ऐसी स्थिति में सेना और सरकार पर दोहरी ज़िम्मेदारी है.

नेपाल में हुए इस राजनीतिक समझौते का फायदा भारत को भी होगा. नेपाल के माओवादी छापामारों का संबंध भारत के माओवादियों के साथ भी है. अगर वहां के माओवादी शस्त्र त्याग कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होते हैं तो इसका असर भारतीय माओवादियों पर भी पड़ेगा. साथ ही भारतीय माओवादियों को उनसे मिलने वाली सहायता भी रुकेगी. अभी नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टारई की भारत यात्रा से भी दोनों देशों के बीच संबंध और मज़बूत होने के आसार दिखाई पड़ रहा है. भट्टारई ने नेपाल में भारत की सामरिक और आर्थिक दोनों तरह की भूमिका की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था. भट्टारई की भारत यात्रा के समय किए गए समझौतों से ऐसा लगता है कि नेपाल अब चीन से नहीं भारत से ज़्यादा उम्मीद लगाए हुए है. बीच में ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार का झुकाव भारत की अपेक्षा चीन के प्रति होता जा रहा है. लेकिन अब ऐसा समझने की ज़रूरत नहीं है. हालांकि सावधान रहने की आवश्यकता तो हमेशा बनी रहेगी, क्योंकि चीन कभी नहीं चाहेगा कि नेपाल और भारत के बीच का संबंध मधुर हो. नेपाल में शांति तथा लोकतंत्र की बहाली भारत के हित में है और इस देश के राजनीतिक दलों के बीच हुआ यह समझौता शांति बहाली का मार्ग प्रशस्त करेगा. बहरहाल, नेपाल के राजनीतिक दलों के बीच हुए इस समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इस पर कितनी जल्दी अमल होता है. जिन माओवादियों को सुरक्षा बलों में शामिल किया जाएगा, उनके साथ पहले से कार्यरत सुरक्षा बलों के व्यवहार का ठीक होना भी ज़रूरी है. ऐसा न हो कि उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़े. ऐसी स्थिति में सेना और सरकार पर दोहरी ज़िम्मेदारी है. अगर इसका निर्वहन सही ढंग से हो पाया तो वे लोग जो इस समझौते का विरोध कर रहे हैं, उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी तथा आगे उन्हें  भी मुख्यधारा में शामिल होना पड़ेगा. लेकिन अगर इस समझौते को सही तरह से लागू नहीं किया गया तो फिर माओवादियों के दूसरे धड़े को सरकार के विरोध का मौका मिल जाएगा. इस समझौते की सफलता के लिए सरकार को तत्परता से क़दम उठाना चाहिए. भारत सरकार को भी नेपाल का सहयोग करना चाहिए, ताकि आगे का रास्ता सरल हो सके.

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