जब हमने समाज में सुधार के लिए संसदीय लोकतंत्र को स्वीकार कर लिया है तो फिर इसके लिए किसी तरह की कोई जल्दबाज़ी करने की आवश्यकता नहीं है. हमें सांसदों और विधायकों की गुणवत्ता में सुधार के लिए लगातार प्रयास करना है, जिससे शासन की गुणवत्ता में सुधार होगा.अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को एक बड़ी समस्या माना है और इस पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल का सुझाव दिया है, लेकिन यह सुझाव कोई आदर्श सुझाव नहीं है. भ्रष्टाचार रोकने के लिए देश में कई संस्थाएं हैं और किसी अन्य संस्था की ज़रूरत भी नहीं है. जब लोकपाल का गठन होगा तो सैकड़ों-हज़ारों अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी और देश को एक दूसरी नौकरशाही का सामना करना पड़ेगा. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाले विभागों में से किसी को समाप्त करने के बाद लोकपाल बनाया जा सकता है, लेकिन ऐसा नहीं होगा. भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सैकड़ों नए पद सृजित करना कोई समझदारी का काम नहीं है.
मौजूदा समय में भारतीय व्यवसायी पश्चिम का अनुकरण कर उच्च जीवनशैली अपना रहे हैं और निजी विमानों का उपयोग करते हैं. भारतीय नेता भी ऐसा ही करना चाहते हैं. वे ऐसी सुविधाओं का उपभोग करना चाहते हैं, जो उनके लिए नहीं हैं.
प्रधानमंत्री स्वयं लोकपाल हैं. उन्हें भ्रष्टाचार में संलिप्त किसी भी मंत्री को बर्खास्त कर देना चाहिए. इसके लिए किसी तरह की जांच-पड़ताल या सबूत की आवश्यकता नहीं है. अगर उन्हें लगता है कि कोई मंत्री ठीक से अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर रहा है या किसी तरह का कोई भ्रष्टाचार कर रहा है तो उसे तुरंत पद से हटा देना चाहिए. मंत्रियों की नियुक्ति आईएएस अधिकारियों की तरह किसी प्रतियोगिता के माध्यम से नहीं होती है. उन्हें तो प्रधानमंत्री इस विश्वास के साथ नियुक्त करते हैं कि वे शासन व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने में अपना योगदान करेंगे. अगर वे सही तरीक़े से शासन चलाने में नाकाम रहते हैं तो उन्हें पद से ज़रूर हटा देना चाहिए. प्रधानमंत्री के संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश लोकपाल हो सकते हैं. देखा जाए तो न्यायालय के पास प्रधानमंत्री के विरुद्ध कितनी शिकायतें जाती है? अगर शिकायतें जाएं तो मुख्य न्यायाधीश उन्हें देख सकते हैं, उन पर विचार कर सकते हैं और अगर सही लगे तो उन पर निर्णय भी ले सकते हैं. अन्ना हजारे इसे नहीं समझ रहे हैं. सरकार एक नई संस्था बनाकर केवल ख़ुश हो सकती है और कुछ नहीं. इसमें बहुत सारी रुकावटें हो सकती हैं, लेकिन फिर भी सरकार लोकपाल बिल लाएगी. एक और संस्था उसी तरह से अप्रभावी साबित होगी, जैसे कि देश की अन्य संस्थाएं. अन्ना हजारे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपनी प्रबोधक शक्ति का इस्तेमाल सत्ता में बैठे लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए करना चाहिए. वे सादा जीवन-उच्च विचार को अपना कर एक उदाहरण पेश कर सकते हैं, जिस पर लोग अमल कर सकें. मौजूदा समय में भारतीय व्यवसायी पश्चिम का अनुकरण कर उच्च जीवनशैली अपना रहे हैं और निजी विमानों का उपयोग करते हैं. भारतीय नेता भी ऐसा ही करना चाहते हैं. वे ऐसी सुविधाओं का उपभोग करना चाहते हैं, जो उनके लिए नहीं हैं. जनता शिकायत करती है कि इस ग़रीब देश में भी विधायकों एवं सांसदों को मुफ्त सरकारी आवास, यात्रा भत्ता और अच्छा वेतन दिया जाता है. इसके बावजूद देखा जाए तो 1990 के बाद से नेता इन सुविधाओं से ख़ुश नहीं हैं. वे व्यवसायियों की तरह ब्रांडेड वस्तुएं इस्तेमाल करना चाहते हैं, अपने विमानों से यात्रा करना चाहते हैं, जो उनका अधिकार नहीं है. सामान्य सी बात है कि अगर वे व्यवसायियों के ऐसेव्यवहारों का समर्थन करते हैं तो फिर किस तरह आप इसके विरुद्ध कार्रवाई करेंगे. न्यायालय को इसके लिए हस्तक्षेप करना है, ताकि ऐसे मंत्रियों और व्यवसायियों को जेल भेजा जा सके. अन्ना हजारे की किसी भी मांग में ये सारी चीजें नहीं दिखाई पड़ती हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि जब तक कॉरपोरेट और नेताओं के बीच साठगांठ समाप्त नहीं होगी, कोई लोकपाल कुछ नहीं कर सकता है. वह भी अन्य संस्थाओं की तरह असफल हो जाएगा.
|
|
|









