राजस्थान के झुंझनू का कठराथल गांव, दूर तक नज़र आते लहलहाते खेत, चरते पशु और रंग-बिरंगे पक्षी, कच्ची पगडंडियों के किनारे बने मिट्टी और घास-फूंस के छोटे-ब़डे घर, सौंधी खुशबू वाली आबोहवा और प्रकृति के प्रेम से सराबोर वातारण. इन सबके बीच सुशीला देवी और कान सिंह का घर किसी चित्रकार की कल्पना-सा प्रतीत होता है. घर की दीवारों पर सुंदर रंग-बिरंगी राजस्थानी चित्रकारी बरबस आकर्षित करती है. घर की मुंडेर पर गमलों की कतार और घर के पीछे फैले खलिहान, गांव में सैर के लिए बथान में बंधे घोड़े और सुरक्षा के लिए दो ब़डे पालतू कुत्ते. इन सबमें खास यहां का प्राकृतिक फ्रिज जिसे ज़मीन में ही गड्ढा कर ईंट की दीवार बनाकर छर्रे और मिट्टी से तैयार किया गया है. घर के कमरे जहां बाहर से मिट्टी के हैं, वहीं अंदर आराम का पूरा साजो-सामान है, सोफा, बैड, डायनिंग टेबल और ज़मीन पर बिछी क़ालीन. यहां सुकून का खास इंतज़ाम है. घर के आंगन में झूला खूबसूरती में चार चांद लगाता है. यह घर किसी पेंटिंग का सजीव चित्रण लगता है. यह घर ग्रामीण पर्यटन के लोकप्रिय ठिकानों में से है. इस क्षेत्र से पिछले चार सालों से ज़ुडी सुशीला देवी और उनके परिवार की ज़िंदगी ग्रामीण पर्यटन ने बदल दी है. पहले उनके पास खेतीबा़डी के अलावा कोई और काम नहीं था. प़ढे-लिखे उनके दोनों बेटों का खेती में जी नहीं लगता था. वे शहर जाकर काम करना चाहते थे, दुनिया देखना चाहते थे, लेकिन अब दुनिया चलकर उनके पास आती है. मोरारका फाउंडेशन ने गांव में ही रहकर नए प्रकार के काम करने का आइडिया दिया, जो बच्चों को भी पसंद आया और उन्हें भी. शुरू में घर छोटा होने, सीमित संसाधन होने की वजह से समस्या भी आई, पर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया. सुशीला देवी के बच्चे अब फाउंडेशन द्वारा दी गई ट्रेनिंग की बदौलत फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और घर आए मेहमानों को इलाक़े की सैर करवाते हैं, वहां के कला-साहित्य और दूसरी लोक कृतियों से परिचित करवाते हैं. विदेशियों के साथ संचार की कोई समस्या नहीं रह गई. विदेशी पर्यटकों को और क्या चाहिए था. घर की महिला के हाथों से बना शुद्ध पारंपरिक भोजन वह भी पारंपरिक तरीक़े से. सुशीला देवी कहती हैं कि देशी पर्यटकों में ग्रामीण पर्यटन को सबसे ज़्यादा पसंद किया जाता है. वे ब़ुजुर्ग और नौजवान जिन्होंने कभी गांव नहीं देखा है या फिर अपने गांव को छो़डकर मजबूरन शहर चले गए हैं, वे इसे ज़्यादा पसंद करते हैं. इसके अलावा हनीमून जो़डे और शहर में रहने वाले परिवार भी खूब चाव से यहां ठहरते हैं.
क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के यहां तीन दिनों के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख-समझ कर गए.
मेहमानों को अपनी संस्कृति को अधिक क़रीब से दिखाने के लिए सुशीला देवी घर पर ही मेहंदी प्रतियोगिता, रंगोली प्रतियोगिता, लोक नृत्य, कठपुतली का खेल और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करती हैं. सुशीला देवी को इस बात पर गर्व होता है कि विदेश से आने वाले लोग उन्हें सुपरवुमैन कहते हैं, क्योंकि वे सुशीला देवी के ब़डे परिवार का प्रबंधन देखकर आश्चर्य में प़ड जाते हैं. यही नहीं सुशीला देवी से मेहमान भारतीय मेहमान नवाज़ी, पशुओं का दूध का़ढना, चारा देना और खेतों पर काम करने जैसा सुखद अनुभव भी लेकर जाते हैं. लेकिन सुशीला देवी और उन जैसे ग्रामीण पर्यटन को ब़ढावा देने वाले किसान परिवारों के लिए यह सब आसान नहीं था. ग्रामीण पर्यटन के लिए गांव वालों के सामने कुछ खास चुनौतियां थीं, जैसे प्रशिक्षित लोगों की कमी, आर्थिक तंगी, लोगों में उत्साह की कमी, ग्रामीण परिवेश की वजह से लोगों का अल्प विकास, सहभागिता की कमी, बिजनेस प्लानिंग क्षमता की कमी, भाषाई समस्या, बुनियादी शिक्षा की कमी, संचार का माध्यम, प्रशिक्षित टूरिस्ट गाइड. लेकिन मोरारका फाउंडेशन ने स्थानीय लोगों और उनके पूरे परिवार को खास ट्रेनिंग दी, जिसकी वजह से सारी चुनौतियां खत्म हो गईं. ग्रामीण पर्यटन को राजस्थान में 500 से ज़्यादा चिन्हित परिवारों से जो़डकर मोरारका फाउंडेशन ने यहां की सभ्यता और संस्कृति को विश्व पटल पर उकेरने में ब़डी भूमिका निभाई है. पर्यावरण हित को ध्यान में रखते हुए प्रकृतिजन्य पर्यटन का विकास करवाया है. ग्रामीण समुदायों को पर्यटन का हिस्सा बनाकर उनके आर्थिक और शैक्षिक स्तर का विकास करवाया है, जिससे ग्रामीणों के शहरों की तऱफ पलायन में कमी आ सके. का़फी वक़्त से ग्रामीणों की स्थिति खराब होती जा रही थी. इसका मुख्य कारण था कृषि की उपेक्षा, इसके प्रति लापरवाही, इसे किसी अन्य व्यवसाय के मुक़ाबले कम आंकना और युवाओं का इससे न जु़डना. इसी समस्या को दूर करने का उपाय मोरारका फाउंडेशन ने खोज निकाला फार्म पर्यटन के ज़रिए. क्षेत्र में जैविक खेती को ब़ढावा देकर इलाक़े की तस्वीर बदलने वाले मोरारका फाउंडेशन ने फार्म पर्यटन पर भी ज़ोर दिया है. फार्म पर्यटन के ज़रिए युवा किसानों और गांवों को इससे जो़डना और इससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को फायदा पहुंचाना ही फाउंडेशन का उद्देश्य है. इस क्रम में पर्यटकों को शेखावाटी में फार्म पर्यटन का ज्ञानवर्धक और रोचक अनुभव दिलाने के लिए कई किसान परिवारों को तैयार किया गया. लक्ष्मणा का बास के किसान राजकुमार काजला के तीन दिन के लिए ठहरने आए फ्रांस के 29 पर्यटकों ने देशी सभ्यता को क़रीब से जाना. सिंहासन के ठाकुर गिरवर सिंह के घर साल भर में फ्रांस से 65 पर्यटक आए और राजस्थानी संस्कृति को देख और समझ कर गए. फार्म पर्यटन पर आए फ्रांस के 21 लोगों को बिडोदी के किसान मनोज शर्मा के यहां दो दिन के लिए ठहरना भारत से विशेष लगाव का अहसास दे गया. शेखावाटी में किसानों को पर्यटकों के स्वागत के लिए खासतौर से तैयार किया गया, ताकि वे पर्यटकों के साथ अच्छी तरह संबंध बना सकें और उन्हें ठहरने के दौरान कोई परेशानी न आए. शेखावाटी क्षेत्र में मीलों का बास के हरीराम मील ने साल भर में 16 फ्रांसीसी मूल के पर्यटकों को ठहराया, तो बीदासर के किसान नेकीराम गोदारा ने कजाकिस्तान से आए दो पर्यटकों और फ्रांस से आए 16 पर्यटकों की दो दिन तक खातिरदारी की. वाहिपुरा के कृष्ण सिंह शेखावत ने 11 और कल्याणपुरा के रामअवतार बुगालिया ने 19 फ्रांसीसी पर्यटकों को दो दिन में अपनी संस्कृति से रूबरू करा दिया. वहीं वाहिदपुरा के सुरेंद्र कुमार ने 4 स्विस पर्यटकों को दो दिन में ही गांव की आबोहवा का क़ायल बना दिया. पिछले कुछ सालों में हज़ारों राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को गांवों में भ्रमण कर ग्रामीण जीवनशैली को नज़दीक से जानने, समझने, परखने का मौक़ा मिला है.
मोरारका फाउंडेशन ने ग्रामीण पर्यटन द्वारा सफलता की एक नई कहानी लिखी है. इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि चूंकि केवल पर्यटन से आजीविका कमाने के अवसर ब़ढ जाते हैं जिससे किसान लगातार पर्यटन के कार्य से जु़डकर कृषि जैसे स्वाभाविक और महत्वपूर्ण कार्य को छो़डने की भूल कर सकते हैं. इसी वजह से यहां फार्म पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. ग्रामीण पर्यटन से न केवल विकल्प रोज़गार के अवसर विकसित होते हैं, बल्कि कई तरह के फायदे होते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि गांववालों को आजीविका का साधन मिल जाता है, खासकर ग्रामीण युवा को. इससे जीवन स्तर में सुधार आता है मसलन शिक्षा, सेहत का भी स्तर बेहतर हो जाता है. गांव में ज़मीन की क़ीमत ब़ढती है, व्यापारिक वस्तुओं और पब्लिक सेवाओं के दाम भी ब़ढते हैं. स्थानीय कारोबार जैसे क्षेत्रीय कला, ट्रांसपोर्ट और दुकानदारों इत्यादि को फायदा पहुंचता है. गांव के सीधे-सादे लोग विदेशों-शहरों के समझदार लोगों से बेवकू़फ न बन जाएं या फिर ब़डे शहरों और विदेशों से आने वाले लोगों से बातचीत कर सकें, इसके लिए गांव के लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता भी ब़ढी है.
शेखावाटी के गांवों के लोग ब़डे समझदार हैं. शहर से आने वाले लोगों से न केवल आय कमा रहे हैं, बल्कि जीने का सलीक़ा भी सीख लेते हैं. गांव के लोग स्वस्थ वातावरण के साथ स़फाई व्यवस्था, स़डक, बिजली, दूरसंचार के नए माध्यम और रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने वाले आधुनिक उपकरण के इस्तेमाल और जीवन को सुलभ बनाने वाली तकनीकी चीज़ों से रूबरू होते हैं. इसके अलावा शहर से आए बुद्धिजीवियों से प्राकृतिक आवास, जैव-विविधता और ऐतिहासिक स्मारकों, धरोहरों का संरक्षण करने के नए उपायों के बारे में सीखते हैं और प्राकृतिक उद्यानों को सहेजने के प्रति जागरूक होते हैं. परंपराओं को सर आंखों पर रखने वाले गांव के ब़डे बुज़ुर्गों को यह चिंता थी कि ग्रामीण पर्यटन से ग्रामीण सभ्यता और संस्कृति को क्षति पहुंच सकती है और गांव की युवा पी़ढी आधुनिकता को अपनाते हुए अपनी संस्कृति से दूर हो जाएगी. मगर फाउंडेशन ने इस डर को दूर किया. फाउंडेशन ने सिखाया कि दरअसल गांव का परिवेश और परंपरागत चीज़ें ही उनके काम की शान हैं और इसे ब़ढावा दे सकती हैं. इस लिहाज़ से ब़ुजुर्गों का यह डर भी खत्म हो गया कि ग्रामीण पर्यटन के विकास से गांव के परंपरागत व्यापार और उद्योग, रोज़गार और माहौल पर ग़लत असर हो सकता है. मोरारका फाउंडेशन ग्रामीण पर्यटन के प्रति इतनी अधिक रुचि और लगन से कार्य करवा रहा है कि इस क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.
गाइड ऐतिहासिक धरोहरों से रूबरू कराते है
मीण पर्यटन एवं ऊंची-ऊंची हवेलियों की वजह से नवलग़ढ राजस्थान में जाना पहचाना नाम है. हर साल तक़रीबन 30,000 राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्यटक न नवलग़ढ की खूबसूरत हवेलियों, मंदिरों, ऐतिहासिक स्मारकों और जैविक खेती के प्रयासों को देखने समझने आ रहे हैं. यहां के गाइड इन भ्रमणीय स्थलों से पर्यटकों का जोडते हैं. यह गाइड पहले अप्रशिक्षित थे, कम प़ढे-लिखे थे. उनके पास समुचित विषयपरख जानकारी जुटाने का न तो कोई स्त्रोत था और न ही अवसर, इसलिए गाइड सुनी-सुनाई जानकारियों को अनगढ़ तरीक़े से पर्यटकों को पेश करते थे, और पर्यटक मजबूरन उनकी सेवाएं लेते थे. उपेक्षा और सरकारी नियमों की आ़ड में उन्हें न तो कोई प्रशिक्षण दिया गया था और न ही कोई सुविधा मुहैया कराई गई थी. ऐसे में मोरारका फाउंडेशन ने आगे ब़ढकर स्थानीय नगर पालिका से बात करके इन अप्रशिक्षित गाइडों को विधिवत शिक्षण देना प्रारंभ किया, जिसके तहत स्थानीय हैरिटेज, होटल, स्मारक पर्यटन, व्यापार से जु़डे विशेषज्ञों की मदद से 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया. इसमें नवलग़ढ के सभी अप्रशिक्षित गाइड समुदाय ने हिस्सा लेकर और शिविर से जुड़कर नवलग़ढ के बारे में पर्यटन की दृष्टि से पूरी जानकारी प्राप्त की. यही नहीं पर्यटन से जु़डे अन्य आयामों के बारे में भी जाना. ट्रेनिंग पाकर खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे गाइड आबिद खान कहते हैं कि इस प्रशिक्षण से न केवल आत्म विश्वास ब़ढा, बल्कि हम अधिकार पूर्वक पर्यटन से जु़डे विषयों पर पर्यटकों को जानकारी देने में भी सक्षम हो गए हैं. एक अन्य गाइड मनोज शर्मा का कहना है कि हैरिटेज की जानकारी तो मोरारका फाउंडेशन पहले भी हैरिटेज संरक्षण शिविर के माधयम से दे रहा है, पर पर्यटकों को ये जानकारियां किस तरह की पूरी तहज़ीब और संस्कृति के साथ दी जाएं, इसका पता इस शिविर के माध्यम से ही चला. साथ ही बहुत से अनछुए पहलुओं पर चर्चाएं भी उपयोगी सिद्ध हुई हैं. उन्हें सबसे ज़्यादा तो खुशी इस बात की हुई कि अप्रशिक्षित का लेबल अब हमेशा के लिए हट गया है और वह भी अब गर्व के साथ पर्यटकों को नवलग़ढ की विरासत से रूबरू करवा रहे हैं.
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