बारह साल तक प्रधानमंत्री के रूप में काम करने के बाद पंडित नेहरू जब सत्तर वर्ष के हो गए तो उन्होंने सेवानिवृत्त होने की कोशिश की, लेकिन उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया और उन्हें अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ा. कार्यकाल के अंतिम पांच सालों में उनकी प्रतिष्ठा को पूर्व के वर्षों की अपेक्षा अधिक नुक़सान हुआ. अपने अंतिम समय में उन्होंने राबर्ट फ्रोस्ट के उस कथन को दोहराया कि मेरे पास कई वायदे हैं, जिनका मुझे पालन करना है और मृत्यु से पहले इन्हें मीलों तक ले जाना है. सोनिया गांधी अपनी बीमारी का इलाज कराकर भारत लौट आई हैं. उनके लौटने के साथ ही नेहरू द्वारा कही गई वे बातें याद आ जाती हैं. कुछ लोगों का कहना है कि वह बिल्कुल ठीक हैं, लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि उनका स्वास्थ्य अभी पूरी तरह ठीक नहीं है. अगर इस बात पर विश्वास किया जाए कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो उन्हें कम से कम एक साल का अवकाश लेना चाहिए, लेकिन वह ऐसा नहीं करेंगी. उन्हें पंडित नेहरू की तरह अपने स्वास्थ्य का बलिदान देना पड़ेगा, क्योंकि उनके सहयोगियों का कहना है कि वे उनके मार्गदर्शन के बग़ैर काम करने में असमर्थ हैं. इस कारण सोनिया गांधी को पिछले कुछ महीनों से भारत में हो रहे प्रशासनिक हृस के लिए कुछ करना है. सोनिया गांधी को अपना काम करने में इतिहास के दो उदाहरणों से कुछ सहायता मिल सकती है. पहला उदाहरण है पंडित नेहरू का. उन्होंने अपने सहयोगी मंत्रियों से त्यागपत्र देकर पार्टी के लिए काम करने को कहा था. इसके लिए कामराज योजना लाई गई थी. उस समय के. कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष थे. इस योजना के बारे में कहा जाए तो यह एक तरह से लाल बहादुर शास्त्री को नेहरू का उत्तराधिकारी बनाने का रास्ता साफ करने के लिए थी, ताकि मोरारजी देसाई को उनके रास्ते से हटाया जा सके. हालांकि स्पष्ट तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है, लेकिन यह बहुत अस्पष्ट भी नहीं था. इसके बारे में ज़्यादा नहीं कहा जा सकता कि सोनिया गांधी किसे, यहां तक कि कितने लोगों को हटाना चाह सकती हैं.
कांग्रेस एक तरह से राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में समाजवादी विचारधारा का नेतृत्व करती है और प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद में प्रतियोगितावादी विचारधारा का. दोनों को लोगों के हित में मिला दिया जाना चाहिए. जो राजस्व प्राप्त होता है, उसे सही लोगों के विकास और सही योजनाओं में लगाने की आवश्यकता है.
दूसरा उदाहरण हैराल्ड मैकमिलन का है. 1959 में बड़े बहुमत के साथ उन्हें चुना गया, लेकिन दो वर्षों के अंदर ही उन्हें महसूस हुआ कि सरकार में सब ठीक नहीं चल रहा है. इसलिए उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में एक बड़ा फेरबदल किया और कई वरिष्ठ मंत्रियों, यहां तक कि चांसलर ऑफ एक्सचेकर को भी हटाया, लेकिन इससे क्या होगा. यहां पुनर्विचार करने या कहें कि पुनर्चिंतन करने की आवश्यकता है. सोनिया गांधी कांग्रेस की पहली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने 1998 और 2003 में चिंतन शिविर का आयोजन किया. 2003 में ऐसा अनुभव किया गया कि कांग्रेस अकेले सत्ता में नहीं आ सकती है, इसलिए सत्ता में आने के लिए एक ही रास्ता बचा है और वह है गठबंधन स्वीकार करना. क्या ऐसा ही विचार 1989 में राजीव गांधी को आया था. इस समय कांग्रेस को अपने नेतृत्व की संरचना और अपनी नीति के बारे में चिंतन करने की आवश्यकता है. सोनिया गांधी ने 2004 में पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के बीच काम का बंटवारा किया, जो काफी सराहनीय था, लेकिन इसका परिणाम हमारे सामने है. अब एक रास्ता है कि मनमोहन सिंह को गठबंधन का नेता, सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री और राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया जाए. इसके अलावा एक अन्य समाधान है कि राहुल और सोनिया दोनों को प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की दोहरी भूमिका मिल जाए. हालांकि पहले कभी प्रधानमंत्री का पद साझेदारी में नहीं रहा है, लेकिन ऐसा किया जा सकता है. डॉ. मनमोहन सिंह गठबंधन के नेता रह सकते हैं और वह राहुल गांधी के साथ प्रधानमंत्री पद की साझेदारी कर सकते हैं, जिसमें घरेलू नीतियों को राहुल देखें और मनमोहन सिंह अंतरराष्ट्रीय मामलों को. इसके अलावा कुछ नए विचार भी हैं.
कांग्रेस एक तरह से राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में समाजवादी विचारधारा का नेतृत्व करती है और प्रधानमंत्री आर्थिक सलाहकार परिषद में प्रतियोगितावादी विचारधारा का. दोनों को लोगों के हित में मिला दिया जाना चाहिए. जो राजस्व प्राप्त होता है, उसे सही लोगों के विकास और सही योजनाओं में लगाने की आवश्यकता है. इसके साथ-साथ पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) में सुधार करना होगा. इस व्यवस्था के तहत होने वाली 41 फीसदी बर्बादी को अनदेखा नहीं किया जा सकता. खाद्य सुरक्षा कानून के कारण पीडीएस की मांग और बढ़ गई है. अगर पीडीएस में सुधार नहीं किया गया तो फिर खाद्य सुरक्षा की बात सोचना बेमानी होगी. अत: अर्थशास्त्रियों को चिंतन की आवश्यकता है. 32 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले को बीपीएल में न रखे जाने वाला मुद्दा तकनीकी है और ज़्यादा दिनों तक इसे चलाया नहीं जा सकता. इसने भारतीय नागरिकों को मिलने वाले न्याय पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. इसलिए किसी भी नागरिक की आय कम करके उसे बीपीएल के बाहर करना सही क़दम नहीं है, बल्कि उसकी आवश्यकता के अनुकूल उसकी आय बढ़ाया जाना या उसका निर्धारण करना ही उचित होगा. इस पर भी फिर से चिंतन करने की आवश्यकता है.
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