26/11 के तीन साल : आतंकी हमले से हमने कितना सबक़ लिया

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काफी अर्से से महाराष्ट्र के समुद्री किनारे की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. हथियारों एवं बारूद की तस्करी और आतंकवादियों की घुसपैठ समुद्री किनारे से होती है, जिसे रोकना तो दूर, उल्टे इस मुद्दे पर नौसेना, तटरक्षक दल, पुलिस और गुप्तचर विभाग एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी थोपने में मग्न रहते हैं. यह साबित हो गया है कि 26/11 का हमला करने वाले आतंकवादी नौसेना के पश्चिम विभाग के मुख्यालय, तटरक्षक दल के मुख्यालय और मुंबई पुलिस के मुख्यालय से केवल 500 यार्ड अंतर के किनारे पर उतरे थे. महाराष्ट्र से सटा लगभग 720 किलोमीटर समुद्री किनारा है. इस समुद्री किनारे पर एक बड़ा और 8 छोटे बंदरगाह हैं. इतने बड़े समुद्री किनारे की सुरक्षा के लिए नौसेना, तटरक्षक दल और समुद्र सुरक्षा पुलिस हमेशा संभ्रम की स्थिति में काम करते हैं. ख़ु़फिया विभाग भी उतना चुस्त-दुरुस्त नज़र नहीं आता. किसी विषय की गंभीरता को न समझने वाले राजनेता, स्वयं में व्यस्त नौकरशाह, समुद्री किनारे की रक्षा के लिए ख़राब नावों का उपयोग करने वाली नौसेना और तटरक्षक दल की इसी स्थिति का फायदा उठाकर मुंबई पर पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादियों ने हमला किया था. 26/11 की घटना को 3 साल पूरे हो गए. यह जख्म आज भी मुंबईकरों, बल्कि सभी भारतवासियों के जेहन में ताजा है. हमले के बाद मुंबई और देश के अन्य महानगरों की सुरक्षा का मुद्दा काफी समय तक चर्चा में रहा. आम आदमी की यह अपेक्षा थी कि मुंबई की घटना से सरकार सबक लेगी और अपनी कार्य प्रणाली में सुधार करेगी. राज्य सरकार ने आश्वासन दिया था कि समुद्री किनारे की सुरक्षा में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी, लेकिन आज तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी समुद्री किनारे की सुरक्षा भगवान भरोसे है. वीआईपी किनारे को छोड़ बाक़ी स्थानों की सुरक्षा में बरती जा रही लापरवाही साफ नज़र आती है. 26/11 के हमले के बाद कफ परेड एवं राजभवन आदि वीआईपी किनारों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है. इन क्षेत्रों में यदि कोई स्थानीय मछलीमार ग़लती से भटक भी जाता है तो पुलिस उसे पकड़ कर उससे जुर्माना वसूल करती है, लेकिन अन्य स्थानों पर पुलिस की यह सक्रियता नज़र नहीं आती. सुरक्षा व्यवस्था का एक हिस्सा बताकर स्थानीय मछलीमारों को स्मार्ट कार्ड दिए गए हैं. इसके लिए स्थानीय पुलिस थाने का एक पत्र होना आवश्यक है, जिसके लिए पुलिस विभाग पांच-पांच हज़ार रुपये तक वसूल करता है.

वर्षा बंगले के लिए ढाई करोड़

राजभवन और मुख्यमंत्री आवास की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने 4 करोड़ 9 लाख 97 हज़ार रुपये का प्रावधान किया है. इसमें से ढाई करोड़ रुपये वर्षा बंगले और एक करोड़ 59 लाख 47 हज़ार रुपये राजभवन की सुरक्षा के लिए ख़र्च किए जाते हैं.

समुद्री तटों की सुरक्षा कौन करेगा

महाराष्ट्र की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था ढाक के तीन पात जैसी हो गई है. समुद्री किनारे में दिन में केवल एक घंटे गश्त लगाई जाती है. शेष 23 घंटे कोई भी बेरोक-टोक समुद्र से मुंबई में आ-जा सकता है. सिंधु दुर्ग के बांद्रा, पत्रादेवी, तेरेखोल एवं किरण पानी स्थित पुलिस चौकियों में कार्यरत पुलिसकर्मियों के पास अवैध शराब पकड़ने के अलावा कोई काम नहीं है. यही स्थिति रत्नागिरि एवं ठाणे ज़िले की है. ठाणे ज़िले के उत्तन, अर्नाला एवं केलवा में समुद्र की सुरक्षा के लिए 3 पुलिस थानों और 183 कर्मचारियों की ज़रूरत है. ठाणे में कुछ स्थानों पर बोट हैं, लेकिन जेटी नहीं है. कुछ स्थानों पर प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं. मुंबई में 24 स्पीड बोट की ज़रूरत है, लेकिन अभी स़िर्फ 13 उपलब्ध हैं. इनमें से 9 पुरानी और 4 नई हैं. इसके अलावा बांद्रे, मढ, खार एवं कफ परेड में 4 जेटी बनाने के लिए 26 करोड़ रुपये का प्रस्ताव है, लेकिन यह प्रस्ताव अब तक स़िर्फ काग़ज़ों तक सीमित है. वर्तमान में माझगांव डॉक एवं सी-लिंक से कामचलाऊ बोटों का इस्तेमाल हो रहा है. आधुनिक गश्ती बोट, प्रशिक्षित कर्मचारी एवं जीपीएस ट्रैकिंग जैसी आधुनिक प्रणाली हमारे पास उपलब्ध नहीं है. जो बोट गश्ती के लिए उपलब्ध हैं, उनमें ईंधन भरने के लिए राज्य सरकार के पास पैसा नहीं है. ऐसे में हम कैसे पुख्ता सुरक्षा का दावा कर सकते हैं. पूरे देश में अलग-अलग 15 विभागों के पास समुद्री किनारे की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है, लेकिन उनमें समन्वय स्थापित करने वाला एक मुख्य विभाग बनाने के लिए मंत्रिमंडल की सुरक्षा विषयक समिति के पास अब तक समय नहीं है.

28 हज़ार बोटों का पंजीयन नहीं

मुंबई के आसपास समुद्री किनारे पर घूमने वाली क़रीब 28 हज़ार बोटों का पंजीयन अब तक नहीं किया गया है. वे किसकी हैं, उनका किस काम के लिए उपयोग किया जाता है आदि जानकारी किसी के पास नहीं है. इस समुद्री मार्ग पर गश्त के लिए बड़ी संख्या में अत्याधुनिक बोट मांगी गई थीं, लेकिन मिलीं केवल तीन. इनके उपयोग का प्रशिक्षण तक कर्मचारियों को नहीं दिया गया. पुलिस को आधुनिक हथियार और उम्दा बुलेटप्रूफ जैकेट देने की चर्चा हुई, निर्णय भी लिया गया, लेकिन अब तक उसे लागू नहीं किया गया. जो जैकेट दी गईं, उनमें भी घपलेबाज़ी का मामला सामने आया. पासपोर्ट विभाग में जारी लापरवाही पर अब तक अंकुश नहीं लगाया गया.

राम प्रधान समिति की रिपोर्ट कहां है

विपक्षी दलों की मांग के बाद सरकार ने राम प्रधान समिति गठित की थी. एक वर्ष बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी, जिसमें व्यवस्था में कई गड़बड़ियों की ओर इशारा करते हुए सुरक्षा विषयक उपाय सुझाए गए, लेकिन इस रिपोर्ट को विधान मंडल के पटल पर रखने की हिम्मत राज्य सरकार अब तक नहीं दिखा पाई. काफी विरोध के बाद राज्य सरकार ने इस पर एक्शन रिपोर्ट विधान मंडल में प्रस्तुत की, जिसके आधार पर मुंबई की सुरक्षा बढ़ाने के लिए विधान मंडल समिति बनाई गई. हैरत की बात यह है कि सुरक्षा जैसा गंभीर प्रश्न होने के बावजूद पूरे वर्ष भर में इस समिति की एक भी बैठक नहीं हुई.

ज़िम्मेदार कौन

23 मार्च, 2010 को तटरक्षक दल का विवेक नामक जहाज मरम्मत के लिए इंदिरा गोदी में खड़ा था. तभी उससे ग्लोबल प्यूरिटी नामक मालवाहक जहाज टकराया. इससे विवेक नामक जहाज डूब गया. ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस जहाज की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी थी, इंदिरा गोदी में ऐसी दुर्घटनाएं न हों, यह ज़िम्मेदारी किसकी है? 10 अगस्त, 2010 को मुंबई बंदरगाह से 5 किलोमीटर की दूरी पर खालेजा और चित्रा नामक 2 मालवाहक जहाजों की टक्कर हुई. जहाजों से समुद्र में गिरे कंटेनरों के डर से मुंबई बंदरगाह को कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया. लगभग 400 टन खनिज तेल समुद्र में बहा. नौसेना ने काफी मेहनत से यह मार्ग ठीक किया. इस वजह से मुंबई के समुद्री किनारे और पर्यावरण को काफी नुक़सान हुआ. मछलीमार कई दिनों तक मछली पकड़ने समुद्र में नहीं जा सके. सवाल यह उठता है कि जिस परिसर में जहाजों का यातायात पूरी तरह से बंदरगाह प्रबंधन के हाथों में है, वहां इस तरह की घटनाएं होना कहां तक सही है, क्या इन घटनाओं की ज़िम्मेदारी कोई लेगा? 31 अगस्त, 2010 को इंदिरा डॉक में डॉल्फिन और नंदा हजारा नामक जहाजों की टक्कर हुई. जांच में पता चला कि जिन कर्मचारियों पर जहाजों का यातायात नियंत्रित करने की ज़िम्मेदारी है, वे प्रशिक्षित नहीं हैं. उन्हें पूरी तरह नियमों की जानकारी नहीं थी. इस साल की शुरुआत में 30 जनवरी को नोर्दीक्लेक नामक मालवाहक जहाज और भारतीय नौसेना के विंध्यगिरि नामक जहाज की आमने-सामने टक्कर हो गई. हैरत की बात यह है कि लड़ाई में बड़े से बड़ा नुक़सान सहन करने की क्षमता रखने वाले विंध्यगिरि जहाज के इंजन में आग लग गई. आग बुझाते समय जहाज में इतना पानी भर गया कि वह डूब गया. घटना के बाद हुई जांच में पता चला कि नौसेना के 5 और 2 मालवाहक जहाजों में से कुछ ने उन्हें दिया गया मार्ग छोड़ दिया था, जिसके कारण दुर्घटना हुई.

कमियां दूर होनी चाहिए

प्रत्यक्ष नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ और जम्मू-कश्मीर एवं पूर्वोत्तर में होने वाली आतंकी घटनाएं रोकने के लिए तैनात जवानों एवं पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. पुलिस मुख्यालय, वीआईपी और क्रिकेट खिलाड़ियों की सुरक्षा ही एकमात्र काम है, यह भावना उचित नहीं है. इसलिए प्रशासकीय काम और वीआईपी लोगों की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मियों को आम आदमी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दी जानी चाहिए. समुद्री किनारों की सुरक्षा कर रहे पुलिसकर्मियों को नौसेना की ओर से प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. समुद्री किनारों की सुरक्षा की स्थिति सुधारने के लिए नौसेना और तटरक्षक दल के पूर्व सैनिकों को पुलिस विभाग में लिया जाना चाहिए. हर पुलिसकर्मी में ऊर्जा पैदा करने हेतु नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) और सेवानिवृत्त सैनिकों को पुलिस विभाग में भर्ती किया जाना चाहिए. मुख्यमंत्री या मंत्रियों द्वारा निर्णय लेने के बाद ही सब कुछ ठीक हो जाएगा, यह सोचना ग़लत है. उन निर्णयों को लागू करना काफी महत्वपूर्ण होता है. ऐसे में महाराष्ट्र के समुद्री किनारों की सुरक्षा दूर की कौड़ी नज़र आती है. समुद्री किनारों की सुरक्षा योजना पर काफी कम धनराशि का इस्तेमाल हुआ है. धीमी गति से चलने वाली कार्यप्रणाली, भ्रष्टाचार और राजकीय इच्छाशक्ति का अभाव देश की आंतरिक सुरक्षा में एक बड़ी बाधा है.

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