पिछले दिनों लखनऊ में हिंदी के महान रचनाकारों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी का निधन हो गया. मैं श्रीलाल जी से दो बार मिला. एक बार राजकमल प्रकाशन के लेखक से मिलिए कार्यक्रम में और दूसरी बार राजेंद्र यादव की जन्मदिन की पार्टी में. लेखक से मिलिए कार्यक्रम में तो बेहद ही औपचारिक सी मुलाक़ात थी, लेकिन कवि उपेंद्र कुमार के घर पर हुई राजेंद्र यादव की पार्टी में तो मेरा अनुभव एकदम ही अलहदा था. किस वर्ष की बात है यह ठीक से याद नहीं है, लेकिन इतना याद है कि नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध की बात है. यादव जी की पार्टी चल रही थी. दिल्ली का पूरा साहित्यिक समाज वहां मौजूद था. पार्क स्ट्रीट के बंगले में हो रही पार्टी में जमकर रसरंजन भी हो रहा था. रसरंजन के बाद खाने का इंतज़ाम था. पार्टी अपने शबाब पर थी. जमकर रसरंजन हो रहा था. नामवर जी, अजित कुमार, श्रीलाल शुक्ल एक ही टेबल पर जमे हुए थे. हम लोग खाना खाने पहुंचे तो देखा कि श्रीलाल जी भी आ रहे हैं. कतार में खड़े सभी लोगों ने श्रीलाल जी के लिए जगह छोड़ दी. शुक्ल जी ने खाना लिया और प्लेट लेकर गेट की ओर बढ़ चले. सभी लोग अपनी मस्ती में थे, रसरंजन का भी असर था. खाना लेकर श्रीलाल जी जब गेट से बाहर हो गए तो हम दो-तीन लोग लपके, लेकिन श्रीलाल जी कहां मानने वाले थे वह तो सड़क पार करके जाकर डिवाइडर पर बैठ गए. अब सोचिए कि हिंदी का इतना बड़ा लेखक पार्टी से निकलकर डिवाइडर पर बैठकर खाना खा रहा है. पार्क स्ट्रीट पर ठीक-ठाक ट्रैफिक होता है, लेकिन पार्टी के शोरगुल से बे़फिक्र श्रीलाल जी खाने में मगन थे. हम लोग उनके आसपास खड़े थे. मैं मंत्रमुग्ध सा उनको देख रहा था. हिंदी के इतने बड़े साहित्यकार से इतने नज़दीक से मिलने का मौक़ा. जब खाना खत्म होने लगा तो उन्होंने कहा कि सब्ज़ी चाहिए. खैर हमारे कहने पर माने और खुद चलकर अंदर आ गए, लेकिन तबतक रसरंजन का असर का़फी हो चुका था. किसी तरह हम उनको लेकर अंदर आए और फिर वहां बिठाया. यह मेरे लिए एक स्वप्न सरीखा था. राग दरबारी जैसी कालजयी कृति के रचियता से बातचीत कर मैं धन्य हो रहा था.
जब श्रीलाल जी बीमार थे और लखनऊ के अस्पताल में भर्ती थे तो अचानक एक दिन दिल्ली के कुछ लेखकों की ओर से एक अपील जारी हुई, जिसमें कहा गया कि सरकार की ओर से श्रीलाल जी के इलाज की समुचित व्यवस्था की जाए. अपील पर दस्त़खत करने वालों में अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, कुंवर नारायण, नामवर सिंह, चंचल चौहान, पंकज बिष्ट एवं रेखा अवस्थी के नाम प्रमुख हैं. इस मुहिम के अगुवा मुरली मनोहर प्रसाद थे. श्रीलाल जी वरिष्ठ आईएएस अ़फसर थे और उत्तर प्रदेश में प्रमुख सचिव के पद से रिटायर हुए थे. लिहाज़ा उनके पास सीजीएचएस की सुविधा होनी चाहिए.
खैर पार्टी खत्म हो गई और हम अपने अपने घर चले गए, लेकिन तबतक कई लोगों से श्रीलाल जी के बारे में बात कर का़फी जान चुका था. कई सालों बाद जब तद्भव के प्रवेशांक में श्रीलाल शुक्ल पर रवींद्र कालिया का संस्मरण पढ़ा तो यादव जी के जन्मदिन की घटना एक बार फिर से स्मरण हो आया. कालिया जी ने लिखा था- लखनऊ में मेरे एक आईएएस मित्र हैं, एक बार उनसे मिलने उनके निवास स्थान पर गया. बाहर एक चौकीदार तैनात था. मैंने उससे पूछा, साहब हैं? हां हैं. क्या कर रहे हैं? शराब पी रहे हैं. उसने निहायत सादगी से जवाब दिया. श्रीलाल शुक्ल जब इलाहाबाद नगर निगम के प्रशासक थे, तो अक्सर उनसे भेंट होती थी, उनका चौकीदार भी कुछ-कुछ लखनऊ के मित्र के चौकीदार जैसा था. एक बार उनसे मिलने गया और चौकीदार से यह पूछने पर कि श्रीलाल जी घर पर हैं या नहीं, उसने बताया, साहब हैं. क्या कर रहे हैं- मैंने पूछा. बाहर बग़ीचे में बैठे हैं और टकटकी लगाकर चांद की तऱफ देख रहे हैं. उसने बग़ीचे की ओर संकेत करते हुए कहा था. बाद में कालिया जी को श्रीलाल जी ने पत्र लिखकर उपरोक्त प्रसंग पर हल्की सी नाराज़गी भी दिखाई थी और लिखा था कि काल्पनिक आईएएस मित्र की बजाय सीधे-सीधे उनका नाम भी लिख देते तो कुछ नहीं हो जाता. तद्भव का वह अंक बेहतरीन था, लेकिन वह अंक मेरे पास नहीं हैं. बाद में राजकमल से ही अखिलेश के संपादन में श्रीलाल शुक्ल की दुनिया के नाम से वह पुस्तकाकार छपा. श्रीलाल जी को जानने के लिए वह किताब मुकम्मल है. तक़रीबन दस साल बाद लखनऊ जाना हुआ. श्रीलाल जी से मिलने के लिए उनके घर फोन किया. यह याद नहीं कि किसने उठाया, लेकिन यह बताया गया कि उनकी तबीयत खराब है और मुलाक़ात मुमकिन नहीं है.
श्रीलाल जी के निधन से एक और हसरत मन में ही रह गई. दो हज़ार दो में मेरे श्वसुर (अब स्वर्गीय) प्रो. प्रियवत नारायण सिंह जी ने मुझे राग दरबारी का पहला संस्करण भेंट किया. मेरे लिए यह एक अमूल्य भेंट थी. मेरे पास राग दरबारी का पेपर बैक संस्करण था. राग दरबारी का पहला संस्करण 1968 में राजकमल प्रकाशन प्रा. लिमिटेड दिल्ली-6 से छपा था. उस संस्करण पर उपन्यास का मूल्य 15 रुपये अंकित है. पहले संस्करण का कवर रिफार्मा स्टूडियो, दिल्ली ने बनाया था. लेकिन जब मुझे राग दरबारी का पहला संस्करण मिला तो उसका कवर नहीं था. मैंने यूं ही राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक महेश्वरी को पहले संस्करण की प्रति के बारे में चर्चा की. उन्होंने सुनते ही प्रस्ताव रखा कि मैं उनको पहले संस्करण की प्रति दे दूं, बदले में वह मुझे राग दरबारी की पांच प्रतियां दे देंगे. मैंने विनम्रतापूर्वक उनके प्रस्ताव को मना कर दिया. थोड़ी निराशा उनके चेहरे पर अवश्य दिखी, लेकिन मेरी भावनाओं को उन्होंने समझा. मेरे पास राग दरबारी का कवर नहीं था. मैंने अशोक जी से एक कवर मांग लिया. अब मेरे पास जो राग दरबारी है वह पहला संस्करण है, लेकिन कवर बाद के संस्करण का है. मैं जब भी लखनऊ जाता था तो सोचता था कि इस बार श्रीलाल शुक्ल से मिलूंगा और उनसे किताब पर दस्त़खत लूंगा और कवर के बारे में मालूम करूंगा, लेकिन श्रीलाल जी के निधन के बाद यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी.
लेकिन श्रीलाल जी की बीमारी और उनके निधन के बहाने मैं एक और बात शिद्दत से उठाना चाहता हूं. जब श्रीलाल जी बीमार थे और लखनऊ के अस्पताल में भर्ती थे तो अचानक एक दिन दिल्ली के कुछ लेखकों की ओर से एक अपील जारी हुई, जिसमें कहा गया कि सरकार की ओर से श्रीलाल जी के इलाज की समुचित व्यवस्था की जाए. अपील पर दस्त़खत करने वालों में अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, कुंवर नारायण, नामवर सिंह, चंचल चौहान, पंकज बिष्ट एवं रेखा अवस्थी के नाम प्रमुख हैं. इस मुहिम के अगुवा मुरली मनोहर प्रसाद थे. श्रीलाल जी वरिष्ठ आईएएस अ़फसर थे और उत्तर प्रदेश में प्रमुख सचिव के पद से रिटायर हुए थे. लिहाज़ा उनके पास सीजीएचएस की सुविधा होनी चाहिए. इसके अलावा उनका भरा-पूरा समृद्ध परिवार है जो उनके इलाज के लिए स्वयं सक्षम है. दिल्ली में बीते 3 नवंबर को श्रीलाल जी की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ था. उससे भी ज़ाहिर होता है कि परिवार को पैसे की कमी नहीं है. लेखकों ने इस तरह की अपील जारी कर श्रीलाल जी का अपमान किया. बेवजह उनको दयनीय बनाने की कोशिश की गई. मुझे लगता है कि अगर जीते जी श्रीलाल जी को इस बात का पता चल गया होता तो वह बेहद नाराज़ होते. लखनऊ के उनके कई क़रीबी लोगों से मेरी बात हुई. सबने यही कहा कि श्रीलाल जी बेहद स्वाभिमानी व्यक्ति थे और अगर वह इसका प्रतिरोध करने की स्थिति में होते तो ज़रूर करते. मेरे हिसाब से इलाज की समुचित व्यवस्था कराने की अपील अनावश्यक और ग़ैर ज़रूरी थी. यह अपील जारी करके लेखकों ने श्रीलाल जी का घोर अपमान किया है और उन्हें मा़फी मांग कर अपनी ग़लती सुधारनी चाहिए. क्या अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव, पंकज बिष्ट, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह यह साहस दिखा पाएंगे और श्रीलाल जी और उनके परिवार से मा़फी मांग कर मिसाल क़ायम करेंगे. करना चाहिए, बड़प्पन इसी में है.
(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)
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