बिहार में पत्रकारिता का स्तर कितना गिर रहा है, इसकी एक ताज़ा मिसाल है पटना से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल के नाम से प्रकाशित समाचार, जिसका शीर्षक है- लोकायुक्त का यह प्रारूप रोल मॉडल है. हालांकि अरविंद केजरीवाल ने अ़खबार को भेजे एक एसएमएस में स्पष्ट तौर पर इस बात से इंकार किया है कि उन्होंने ऐसा कोई लेख इस समाचार-पत्र को भेजा है. उन्होंने कहा कि वह अपने नाम से प्रकाशित समाचार देखकर हैरान हैं. उन्होंने न तो इस लेख को लिखा है और न ही अ़खबार के किसी संवाददाता ने उनसे इस संबंध में कोई बात की है. अपने एसएमएस में उन्होंने कहा है कि सरकार द्वारा बनाए गए इस प्रारूप में कई खामियां हैं, जिस पर हम कुछ दिन में अपने विचार रखेंगे.
अब सवाल उठता है कि केजरीवाल ने लोकायुक्त के संबंध में कोई बात नहीं कही और उनके हवाले से बिहार लोकायुक्त बिल के समर्थन में लेख छाप दिया गया. किसी एक अ़खबार ने यह काम किया, पर इससे प्रदेश के मीडिया पर उंगली उठने लगी है. उक्त अ़खबार की इस हरकत से केजरीवाल व टीम अन्ना के बीच बिहार की मीडिया की कौन सी छवि बनी होगी. टीम अन्ना को छोड़ भी दें तो यहां के लोगों ने जब केजरीवाल का खंडन दूसरे अ़खबारों में पढ़ा होगा तो उन्होंने लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ पर कितना अ़फसोस किया होगा. लगता है कि हद से ग़ुजर जाने का संकल्प लिए बैठे कुछ लोग ऐसा कर रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिला़फ निर्णायक जंग का ऐलान करने वाले नीतीश कुमार ने जैसे ही बिहार लोकायुक्त बिल के प्रस्तावित प्रारूप को पेश किया, वैसे ही प्रदेश में दो तरह की बहस छिड़ गई.
केजरीवाल का एसएमएस
An article has approved in my name in your newspaper today. I am surprised to read this article. I never wrote this article and no one from the newspaper spoke to me on this issue. I disagree with the contents contained in the said article. The draft bill presented by bihar government has several serious infirmities. However, we will be issuing our detailed critique of the bill in the next few days.
पहली बहस भ्रष्टाचार के खात्मे को लेकर सरकार की नीयत पर हो रही है तो दूसरी बहस इस मामले में मीडिया के रोल पर भी जारी है. इन सबके बीच नीतीश कुमार ने दावा किया है कि बिहार लोकायुक्त बिल सबकी राय का पर्याय होगा. उन्होंने माना कि अन्ना हजारे टीम का प्रारूप आया था और हमने अपना प्रारूप बनाते समय सभी पक्षों के सलाह-मशविरे को ध्यान में रखा है. जनता से राय मांगी गई है और सर्वदलीय बैठक भी होगी. लेकिन टीम अन्ना के दो प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल व किरण बेदी ने बिहार लोकायुक्त बिल को सिरे से खारिज कर दिया है. टीम अन्ना की राय में यह बिल भ्रष्टाचार को रोकने में मददगार नहीं होगा. अरविंद केजरीवाल का मानना है कि बिहार लोकायुक्त बिल में कई ऐसे प्रावधान हैं जो भ्रष्टाचारी के बजाय शिकायत करने वालों के खिला़फ हैं. सरकारी अ़फसर को तो जांच पूरी होने और अदालती कार्यवाही के बाद सज़ा मिलेगी, पर शिकायत करने वालों को तुरंत जेल हो सकती है. बिल के अनुसार शिकायत ग़लत होने पर शिकायतकर्ता को छह महीने से पांच साल तक की सज़ा हो सकती है. इसी तरह आरोपी अधिकारी को तो सरकारी वकील और अन्य सुविधाएं मिलेंगी, पर शिकायत करने वालों को खुद अपना बचाव करना होगा. टीम अन्ना के अनुसार लोकायुक्त के निष्पक्ष होकर काम करने की व्यवस्था इस बिल में नहीं है. इस बिल में लोकायुक्त का चयन, निलंबन और उसे हटाने का अधिकार राज्य सरकार के पास होगा. सरकारी अ़फसरों के खिला़फ जांच शुरू करने और म़ुकदमा चलाने से पहले सरकार की इजाज़त लेनी होगी. किरण बेदी का भी कहना है कि बिहार सरकार का प्रस्तावित लोकायुक्त बिल निराश करने वाला है. यह महज़ उस बिल की अनुकृति भर है जिसके खिला़फ हमने दिल्ली में आंदोलन किया था. टीम अन्ना ने उम्मीद जताई है कि नीतीश कुमार बिल में सुधार करेंगे और उत्तराखंड की तरह लोकायुक्त बिल लाएंगे. टीम अन्ना की इस नाराज़गी को समझने के लिए पहले के कुछ पन्ने पलटने होंगे. टीम अन्ना का नीतीश कुमार के प्रति लगाव का़फी पुराना है. अन्ना हजारे खुद बिहार सरकार के कामकाज की तारी़फ कर चुके हैं. इन्हीं संबंधों के आधार पर केजरीवाल से लोकायुक्त बिल का एक प्रारूप मांगा गया था, जिसे उन्होंने भेजा भी. बताया जा रहा है कि बिल के कुछ प्रावधानों पर जो अब उजागर भी हो रही है, पर बिहार सरकार सहमत नहीं थी. इसके बाद केजरीवाल व सरकार के बीच का संवाद टूट गया. अब जब सरकार ने लोकायुक्त बिल का प्रारूप पेश कर दिया है तो टीम अन्ना अपने को ठगी महसूस कर रही है.
उधर, बिहार लोकायुक्त बिल पर लालू प्रसाद ने कहा है कि पहले इसे लागू तो होने दीजिए तब अपनी बात करेंगे. रामविलास पासवान का कहना है कि लोकायुक्त की नियुक्ति सही तरीक़े से होनी चाहिए. पूर्व विधान पार्षद पीके सिन्हा मानते हैं कि यह बिल भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए नहीं, बल्कि भ्रष्टचार छिपाने के लिए लाया गया है. वरिष्ठ नेता प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि प्रस्तावित बिल बस आंखों में धूल झोंकने की क़वायद है. भ्रष्टाचार रोकने में इससे कुछ भी मदद नहीं मिलेगी. राजद सांसद रामकृपाल यादव ने इसे जनता के साथ धोखा क़रार दिया है. देखा जाए तो यह बिल जिस तरह से लाया गया है, उससे सरकार की नीयत पर कई प्रश्न एक साथ खड़े होते हैं. टीम अन्ना के सदस्यों सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा बिल पर की गई टिप्पणियों की अनदेखी करते हुए उक्त समाचार-पत्र ने बिल की प्रशंसा में क़सीदे ग़ढे हैं, इसे क्या कहा जाए, प्रायोजित समाचार?
टीम अन्ना को जिन बिंदुओं पर आपत्ति है
- लोकायुक्त के चयन, निलंबन व हटाने की प्रकिया सरकार के नियंत्रण में है. इसे स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता है.
- किसी भी अधिकारी के खिला़फ जांच और ट्रायल के लिए लोकायुक्त को सरकार की अनुमति लेनी होगी.
- अगर कोई व्यक्ति ग़लत शिकायत करता है तो उसके खिला़फ सज़ा का प्रावधान और भ्रष्ट अधिकारियों के खिला़फ सज़ा का प्रावधान दोनों एक जैसे हैं.
- भ्रष्ट अधिकारियों को उनके खिला़फ मामले की सुनवाई के दौरान सरकार मुफ्त क़ानूनी सहायता मुहैया कराएगी.
|
|
|










बिहार में मीडिया है क्या ?