यस ! वी हैव प्रेमचंद

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बेहद ही दिलचस्प, लेकिन हैरान करने वाला वाक़िया है. एक दिन यूं ही दफ्तर से निकला तो त़फरीह के लिए पास के ही एक मॉल में चला गया. अपनी आदत है कि जहां भी जाता हूं वहां किताबों की दुकान ढूंढकर एक बार उसके चक्कर ज़रूर लगाता हूं. नोएडा के  उस शानदार मॉल में भी घूमते-घामते एक बहुत बड़ी किताबों की दुकान पर जा पहुंचा. बेहद करीने से शानदार कवर में चमचमाती अंग्रेजी की किताबें रैक पर लगी थीं. कई नई किताबें तो न्यू अराइवल के डेस्क पर खड़ी और पड़ी थीं. अलग-अलग तरह की किताबों का अलग-अलग सेक्शन बना था, जहां आप अपनी सहूलियत और पसंद के हिसाब से किताबों को चुनकर खरीद सकते हैं. का़फी देर घूमने के बाद जब मुझे कहीं हिंदी की किताबें नहीं दिखाई दीं तो मैं सेल्स काउंटर पर गया और वहां खड़े सज्जन से पूछा कि भाई साहब आपके पास हिंदी की किताबें नहीं हैं क्या. वह बेहद तत्परता से काउंटर छोड़कर मेरी मदद के लिए बाहर आ गया. मैंने उनसे कहा कि मैं का़फी देर से हिंदी की किताबें तलाश रहा हूं, लेकिन इन तमाम चमचमाती अंग्रेजी की किताबों के बीच हिंदी की किताबें दिख नहीं रही हैं. मेरी जिज्ञासा देखकर उसका भरोसा बढ़ा और उसने मुझे अपने पीछे आने को कहा. मैं उसके साथ अंग्रेजी फिक्शन, ऑटोबॉयोग्राफी, मैनेजमेंट आदि की किताबों को पार करते हुए एक कोने में पहुंचा. उस रैक पर लिखा था इंडियन लैंग्वेजेज. सेल्समैन ने मुझे कहा कि सर यह देखिए हिंदी की किताबें यहां लगी हैं. मेरी आंखें वहां उस रैक पर हिंदी की किताबें तलाशने लगीं. वहां जो किताबें मौजूद थीं, उनमें हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के चार खंड, अमर्त्य सेन की किताबों के अनुवाद के अलावा डायमंड पॉकेट बुक्स की कई किताबें लगी थीं. इसके अलावा शिवाजी सावंत का मृत्युंजय भी वहां रखा था. वाणी प्रकाशन की भी कुछ किताबें लगी थीं. जब मुझे मेरे मतलब की कोई भी किताब नहीं मिली तो मैंने सेल्समैन से पूछा कि क्या आपके पास प्रेमचंद की किताबें हैं? उसने तपाक से जवाब दिया-यस सर वी हैव प्रेमचंद एंड वी हैव ऑल द बुक्स रिट्न बाय प्रेमचंद. मैंने कहा कि कहां हैं मुझे तो दिख नहीं रहीं. मेरे इतना बोलते ही वह अचानक ग़ायब हो गया और चंद पलों में दस बारह किताबों का बंडलनुमा पैकेट लेकर प्रकट हुआ. पैकेट को लगभग खोलते हुए उसने कहा कि यह प्रेमचंद का सेलेक्टेड वर्क है. वह यह बताते हुए गर्व का अनुभव कर रहा था कि उसके पास हिंदी के महानतम लेखक प्रेमचंद की चुनिंदा रचनाओं का पूरा सेट मौजूद है. लेकिन मैं कहीं गहरी सोच में डूबा जा रहा था. मेरे मन में यह सोचकर निराशा का अंधकार भरता जा रहा था कि प्रेमचंद को अब भारत में, वह भी उत्तर भारत में लोग अंग्रेजी में प़ढेंगे. अचानक मेरी तंद्रा टूटी जब उसने पूछा कि सर बिल बनवा दूं. मैंने अपने सूखते हलक़ से उससे मा़फी मांगी और तेज़ चलता हुआ बुक कैफे से बाहर आ गया .

वैश्वीकरण के इस युग में अब व़क्त आ गया है कि हिंदी के प्रकाशकों को पारंपरिक कारोबारी रास्ते से हटना होगा और उस अत्याधुनिक रास्ते पर चलना होगा जिससे कि वे दूसरी भाषाओं के प्रकाशकों से कंपीट कर सकें. पाठकों तक पहुंचने के लिए सारे प्रकाशकों को मिलकर एक ऐसी योजना बनानी होगी, जिसमें सबकी बराबर की भागीदारी हो. अब वह व़क्त  ज़्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है, जहां भारी भरकम सरकारी खरीद हो.

बुक कैफे से बाहर निकलकर मैं लगातार इसी सोच में डूबा रहा कि प्रेमचंद की रचनाएं हिंदी में सुलभ न होकर अंग्रेजी में बेहतर तरी़के से क्यों सुलभ हैं. किसी भी रचनाकार की कृति अगर किसी अन्य भाषा में मौजूद हो तो बहुत अच्छी बात है. उससे उस लेखक की स्वीकार्यता और उसके पाठकों का दायरा भी बढ़ता है. लेकिन मेरी चिंता का कारण प्रेमचंद की रचनाओं का अंग्रेजी में उपलब्ध होना नहीं था. चिंता की वजह प्रेचमंद की रचनाओं का हिंदी में उपलब्ध नहीं होना था. हमें इसके कारणों में जाना होगा, तलाशना होगा उन वजहों को. मेरा मानना है कि हिंदी में प्रकाशकों को इस बात की चिंता ज़रा कम होती है कि किताबें पाठकों के लिए सुलभ करवाई जाएं. हिंदी के लगभग सभी प्रकाशक मेरे मित्र हैं और गाहे-बगाहे उनसे बातचीत होती भी रहती है. लेकिन उस बातचीत में एक-दो प्रकाशकों को छोड़कर कोई भी कभी इस बात के लिए प्रयास करता नहीं दिखता कि कैसे पाठकों तक पहुंचा जाए. मैं इस स्तंभ में कई बार इस बात को खुले तौर पर और कई बार इशारों में कह चुका हूं कि भारत में हिंदी का जो प्रकाशन उद्योग है वह सालों पुरानी लीक पर चल रहा है और प्रकाशकों के अंदर उस लीक से हटने की न तो बेचैनी है और न ही नए तौर-तरीक़ों को आज़माने और अपनाने की ललक. मुझे का़फी अच्छा लगता है जब मैं देखता हूं कि वाणी प्रकाशन न केवल फेसबुक पर तक़रीबन पांच हज़ार की मित्र संख्या के साथ मौजूद है, बल्कि इस सोशल साइट पर उसका एक अलग से पन्ना है. लेकिन वहीं इस बात का दुख भी होता है कि वाणी की तरह अन्य प्रकाशन संस्थान इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं. पहले भी कई बार कह चुका हूं कि प्रकाशन संस्थानों की अपनी खुद की बेवसाइट भी नहीं है, दो-चार को छोड़कर. उससे भी मज़े की बात है कि जिन प्रकाशन संस्थानों की बेवसाइट्‌स हैं, वहां अगर आप खरीदारी करेंगे तो कम छूट मिलती है और फ्लिपकार्ट जैसी बेवसाइट्स पर पाठकों को ज़्यादा छूट और कैश ऑन डिलीवरी जैसी सुविधा भी उपलब्ध है. हमारे हिंदी के ज़्यादातर प्रकाशकों में पाठकों तक पहुंचने की जो व्यवसायिक ललक होनी चाहिए, वह नहीं है. नतीजा यह होता है कि स़िर्फ देशभर में इधर-उधर लगने वाले पुस्तक मेलों में भागीदारी कर वे अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं. प्रकाशकों की तऱफ से पाठकों तक पहुंचने की कोई ठोस योजना प्रकाशकों के पास नहीं है, हां कभी-कभार कुछ छिटपुट होता रहता है.

लेकिन वैश्वीकरण के इस युग में अब व़क्त आ गया है कि हिंदी के प्रकाशकों को पारंपरिक कारोबारी रास्ते से हटना होगा और उस अत्याधुनिक रास्ते पर चलना होगा जिससे कि वे दूसरी भाषाओं के प्रकाशकों से कंपीट कर सकें. पाठकों तक पहुंचने के लिए सारे प्रकाशकों को मिलकर एक ऐसी योजना बनानी होगी, जिसमें सबकी बराबर की भागीदारी हो. अब वह व़क्तज़्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है, जहां भारी भरकम सरकारी खरीद हो. सरकारी खरीद में होने वाले भ्रष्टाचार के मद्देनज़र अब इस तरह की बात उठने लगी है कि थोक सरकारी खरीद बंद कर दी जाए. अगर थोक सरकारी खरीद बंद हो गई तो प्रकाशकों के पास पाठकों तक पहुंचने के प्रयास के अलावा कोई विकल्प बचेगा नहीं. इसलिए जब पाठक ही प्रकाशकों के आखिरी विकल्प होते जा रहे हों तो अभी से उस विकल्प को लेकर गंभीरता से काम होना चाहिए और उन तक पहुंचने और उन्हें पुस्तकें सुलभ करने की गंभीर कोशिश होनी चाहिए. इसके लिए हमें पुस्तकों की उपलब्धता के बारे में सोचना होगा. हर उस जगह को तलाशना होगा, जहां किताबें रखी और बेची जा सकें. उन रास्तों को तलाशना होगा, जो सीधे पाठकों तक पहुंचते हों. फ्लिपकॉर्ट जैसी बेवसाइट्स के साथ कारोबारी रिश्ते प्रगाढ़ करने होंगे. उन बेवसाइट्स पर यह ज़ोर डालना होगा कि वे यह भी प्रचारित करें कि वहां हिंदी की तमाम पुस्तकें मौजूद हैं और पाठकों को एक क्लिक पर उपलब्ध हो सकता है. आने वाला व़क्त पूरी तरह से ऑनलाइन शॉपिंग का है और हिंदी के प्रकाशकों को इसको ही ध्यान में रखते हुए अपनी आगे की रणनीति बनानी होगी. अन्यथा हमें बार-बार यह सुनना प़डेगा कि यस सर वी हैव प्रेमचंद इन ऑवर स्टॉक.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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