बाबा और सेवा का मूल्य

दामोदर घनश्याम बाबारे, उपनाम अण्णा चिंचणीकर बाबा के भक्त थे. वह सरल, सुदृढ़ और निर्भीक प्रकृति के व्यक्ति थे. वह निडरतापूर्वक स्पष्ट भाषण करते और व्यवहार में सदैव नग़द नारायण-से थे. यद्यपि व्यवहारिक दृष्टि से वह रूखे और असहिष्णु प्रतीत होते थे, परंतु अंतःकरण से कपटहीन और व्यवहार-कुशल थे. इसी कारण उन्हें बाबा विशेष प्रेम करते थे. सभी भक्त अपनी-अपनी इच्छानुसार बाबा के अंग-अंग को दबा रहे थे. बाबा का हाथ कठड़े पर रखा हुआ था. दूसरी ओर एक वृद्ध विधवा उनकी सेवा कर रही थी, जिनका नाम वेणुबाई कौजलगी था. बाबा उन्हें मां शब्द से संबोधित करते तथा अन्य लोग उन्हें मौसीबाई कहते थे. वह एक शुद्ध हृदय की महिला थी. वह उस समय दोनों हाथों की अंगुलियां मिलाकर बाबा के शरीर को मसल रही थी. जब वह बलपूर्वक उनका पेट दबाती तो पेट और पीठ का प्रायः एकीकरण हो जाता था. बाबा भी इस दबाव के कारण यहां-वहां सरक रहे थे. अण्णा दूसरी सेवा में व्यस्त थे. मौसीबाई का सिर हाथों की परिचालन क्रिया के साथ नीचे-ऊपर हो रहा था. जब इस प्रकार दोनों सेवा में जुटे थे तो अनायास ही मौसीबाई विनोदी प्रकृति की होने के कारण ताना देकर बोली कि यह अण्णा बहुत बुरा व्यक्ति है और यह मेरा चुंबन करना चाहता है. इसके केश तो पक गए हैं, परंतु मेरा चुंबन करने में इसे तनिक भी लज्जा नहीं आती है. यह सुनकर अण्णा क्रोधित होकर बोले, तुम कहती हो कि मैं एक वृद्ध और बुरा व्यक्ति हूं. क्या मैं मूर्ख हूं. तुम खुद ही छेड़खानी करके मुझसे झगड़ा कर रही हो. वहां उपस्थित सब लोग इस विवाद का आनंद ले रहे थे. बाबा का स्नेह तो दोनों पर था, इसलिए उन्होंने कुशलतापूर्वक विवाद का निपटारा कर दिया. वह प्रेमपूर्वक बोले, अरे अण्णा, व्यर्थ ही क्यों झगड़ रहे हो. मेरी समझ में नहीं आता कि मां का चुंबन करने में दोष या हानि ही क्या है. बाबा के  शब्दों को सुनकर दोनों शांत हो गए और सब उपस्थित लोग जी भरकर ठहाका मारकर बाबा के विनोद का आनंद लेने लगे.

एक अन्य अवसर पर मौसीबाई बाबा का पेट बलपूर्वक मसल रही थी, जिसे देखकर दर्शकगण व्यग्र होकर मौसीबाई से कहने लगे कि मां कृपा कर धीरे-धीरे ही पेट दबाओ. इस प्रकार मसलने से तो बाबा की अंतड़ियां और नाड़ियां ही टूट जाएंगी. वे इतना कह भी न पाए थे कि बाबा अपने आसन से तुरंत उठ बैठे और अंगारे के समान लाल आंखें कर क्रोधित हो गए.

इसी प्रकार बाबा की भक्त-परायणता और शिक्षा का नमूना एक और कथा में मिलता है. बाबा भक्तों को उनकी इच्छानुसार ही सेवा करने दिया करते थे और इस विषय में किसी प्रकार का हस्तक्षेप उन्हें सहन न था. एक अन्य अवसर पर मौसीबाई बाबा का पेट बलपूर्वक मसल रही थी, जिसे देखकर दर्शकगण व्यग्र होकर मौसीबाई से कहने लगे कि मां कृपा कर धीरे-धीरे ही पेट दबाओ. इस प्रकार मसलने से तो बाबा की अंतड़ियां और नाड़ियां ही टूट जाएंगी. वे इतना कह भी न पाए थे कि बाबा अपने आसन से तुरंत उठ बैठे और अंगारे के समान लाल आंखें कर क्रोधित हो गए. साहस किसे था, जो उन्हें रोके . उन्होंने दोनों हाथों से सटके का एक छोर पकड़ नाभि में लगाया और दूसरा छोर ज़मीन पर रख उसे पेट से धक्का देने लगे. सटका (सोटा) लगभग 2 या 3 फुट लंबा था. अब ऐसा प्रतीत होने लगा कि वह पेट में छिद्र कर प्रवेश कर जाएगा. लोग शोकित एवं भयभीत हो उठे कि अब पेट फटने ही वाला है. बाबा अपने स्थान पर दृढ़ हो, उसके अत्यंत समीप होते जा रहे थे और प्रतिक्षण पेट फटने की आशंका हो रही थी. सभी किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे. वे आश्चर्यचकित और भयभीत हो ऐसे खड़े थे, मानो गूंगों का समुदाय हो. यथार्थ में भक्तगण का संकेत मौसीबाई को केवल इतना ही था कि वे सहज रीति से सेवा करें. किसी की इच्छा बाबा को कष्ट पहुंचाने की न थी. भक्तों ने तो यह कार्य केवल सद्‌भावना से प्रेरित होकर ही किया था, परंतु बाबा तो अपने कार्य में किसी का हस्तक्षेप कणमात्र भी न होने देना चाहते थे. भक्तों को तो आश्चर्य हो रहा था कि शुभ भावना से प्रेरित कार्य दुर्गति से परिणत हो गया और वे केवल दर्शक बने रहने के  अतिरिक्त कर ही क्या सकते थे. भाग्यवश बाबा का क्रोध शांत हो गया और सटका छोड़कर वह पुनः आसन पर विराजमान हो गए. इस घटना से भक्तों ने शिक्षा ग्रहण की कि अब दूसरों के  कार्य में कभी भी हस्तक्षेप न करेंगे और सबको उनकी इच्छानुसार ही बाबा की सेवा करने देंगे. केवल बाबा ही सेवा का मूल्य आंकने में समर्थ थे.

 श्री साईनाथ स्‍तवन मंजरी

जो अज्ञानी जग के वासी. जन्म-मरण कारा-ग्रहवासी.

जन्म-मरण के  आप पार है. विभु निरंजन जगदाधार है.

 

निर्झर से जल जैसा आये. पूर्वकाल से रहा समाये.

स्वयं उमंगित होकर आये. जिसने ख़ुद है स्त्रोत बहायें.

 

शिला छिद्र से ज्यों बह निकला. निर्झर उसको नाम मिल गया.

झर-झर कर निर्झर बन छाया. मिथ्या स्वत्व छिद्र से पाया.

 

कभी भरा और कभी सूखता. जल निस्संग इसे नकारता.

छिद्र शून्य को सलिल न माने. छिद्र किन्तु अभिमान बखान.

 

भ्रमवश छिद्र समझता जीवन. जल न हो तो कहां है जीवन.

दया पात्र है छिद्र विचार. दम्भ व्यर्थ उसने यों धारा.

 

यह नरदेह छिद्र सम भाई. चेतन सलिल शुद्ध स्थायी.

छिद्र असंख्य हुआ करते हैं. जलकण वही रहा करते हैं.

 

अतः नाथ हे परम दयाघन. अज्ञान नग का करने वेधन.

वग्र अस्त्र करते कर धारण. लीला सब भक्तों के कारण.

 

जड़तः छिद्र कितने है सारे. भरे जगत में जैसे तारे.

गत हुये वर्तमान अभी हैं. युग भविष्य के बीज अभी हैं.

 

भिन्न-भिन्न ये छिद्र सभी है. भिन्न-भिन्न सब नाम गति है.

पृथक-पृथक इनकी पहचान. जग में कोई नहीं अनजान.

 

चेतन छिद्रों से ऊपर है. मैं तू अन्तर नहीं उचित है.

जहां द्वैत का लेश नहीं है. सत्य चेतना व्याप रही है.

 

चेतना का व्यापक विस्तार. हुआ अससे पूरित संसार.

तेरा मेरा भेद अविचार. परम त्याज्य है बाह्य विकार.

 

मेघ गर्भ में निहित सलिल जो. जड़तः निर्मल नहीं भिन्न सो.

धरती तल पर जब वह आता. भेद-विभेद तभी उपजाता.

 

जो गोद में गिर जाता है. वह गोदावरी बन जाता है.

जो नाले में गिर जाता है. वह अपवित्र कहला जाता है.

 

सन्त रूप गोदावरी निर्मल. तुम उसके पाव अविरल जल.

हम नाले के सलिल मलिनतम. भेद यही दोनों में केवल.

 

करने जीवन स्वयं कृतार्थ. शरण तुम्हारी आये नाथ.

कर जोरे हम शीश झुकाते. पावन प्रभु पर बलि-बलि जाते.

 

पात्र-मात्र से है पावनता. गोदा-जल की अति निर्मलता.

सलिल सर्वत्र तो एक समान. कहीं न दिखता भिन्न प्रणाम.

 

गोदावरी का जो जलपात्र. कैसे पावन हुआ वह पात्र.

उसके  पीछे मर्म एक है. गुणः दोष आधार नेक है.

 

मेघ-गर्भ से जो जल आता. बदल नहीं वह भू-कण पाता.

वही कहलाता है भू-भाग. गोदावरी जल पुण्य-सुभाग.

 

वन्य भूमि पर गिरा मेघ जो. यद्यपि गुण में रहे एक जो.

निन्दित बना वही कटुखारा. गया भाग्य से वह धिक्कारा.

 

सदगुरू प्रिय पावन हैं कितने. षडिरपुओं के जीता जिनने.

अति पुनीत है गुरु की छाया. शिरडी सन्त नाम शुभ पाया.

 

अतः सन्त गोदावरी ज्यों है. अति प्रिय हित भक्तों के त्यों हैं.

प्राणी मात्र के प्राणाधार. मानव धर्म अवयं साकार.

 

जग निर्माण हुआ है जब से. पुण्यधार सुरसरिता तब से.

सतत प्रवाहित अविरल जल से. रुद्धित किंचित हुआ न तल है.

 

सिया लखन संग राम पधारे. गोदावरी के पुण्य किनारे.

युग अतीत वह बीत गया है. सलिल वही क्या शेष रहा है.

 

जल का पात्र वहीं का वह है. जलधि समाया पूर्व सलिल है.

पावनता तब से है वैसी. पात्र पुरातन युग के जैसी.

 

पूरव सलिल जाता है ज्यों ही. नूतन जल आता है त्यों ही.

इसी भांति अवतार रीति है. युग-युग में होती प्रतीत है.

 

बहु शताब्दियां संवत सर यों. उन शतकों में सन्त प्रवर ज्यों.

हो सलिल सरिस सन्त साकार. ऊर्मिविभूतियां अपरंपार.

 

सुरसरिता ज्यों सन्त सु-धारा. आदि महायुग ले अवतार.

सनक सनन्द न सनत कुमार. सन्त वृन्द ज्यों बाढ़ अपारा.

 

नारद तुम्बर पुनः पधारे. ध्रुव प्रहलाद बली तन धारे.

शबरी अंगद नल हनुमान. गोप गोपिका बिदुर महाना.

 

सन्त सुसरिता बढ़ती जाती. शत-शत धारा जलधि समाती.

बाढ़ें बहु यों युग-युग आती वर्णन नहीं वाणी कर पाती.

 

सन्त रूप गोदावरी तट पर. कलियुग के नव मध्य प्रहर पर.

भक्ति-बाढ़ लेकर तुम आये. ’सांईनाथ सुनाम तुम कहाये.

 

चरण कमल द्वय दिव्य ललाम. प्रभु स्वीकारों विनत प्रणाम.

अवगुण प्रभु हैं अनगिन मेरे. चित न धरों प्रभु दोष घनेरे.

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