हिन्दी सिनेमा के इतिहास का उज्ज्वल अध्याय

धर्मेंद्र फिल्म जगत में सपने लेकर आए थे. उनका कोई गॉड फादर नहीं था. उन्हें बहुत संघर्ष करना प़डा. 1960 के दशक में विभिन्न किरदारों से सजीं धर्मेंद्र की 52 फिल्में रिलीज़ हुईं, जिनमें अधितकतर समाज की समस्याओं और रोमांस पर आधारित थीं. यह वह ज़माना था जब फिल्में बनाने का मक़सद केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि समाज में एक सकारात्मक संदेश भी देना होता था. 1970 के दशक में फूल और पत्थर की सफलता ने धर्मेंद्र ही मैन के रूप में स्थापित किया. इसी दशक में धर्मेंद्र के हिस्से में इसी इमेज को ध्यान में रखकर फिल्में बनीं. इसी दशक में धर्मेंद्र ने 63 सफल फिल्मों में काम किया. फिल्म शोले ने हिंदी फिल्मों के इतिहास में सफलता के एक नए अध्याय की शुरुआत की.  36 वर्ष गुज़र जाने के  बाद भी शोले के वीरू का किरदार लोगों की जु़बां पर आम है.1980 के  दशक में उन्होंने 75 फिल्मों में काम किया. उस समय धर्मेंद्र की इमेज बॉक्स आफिस पर ऐसी बन चुकी थी, जो पर्दे पर एक साथ 10-20 लोगों से लोहा लेता हुआ नज़र आता था.  अनिल शर्मा के निर्देशन में बनी ग़ुलामी ने धर्मेंद्र को एक अमिट किरदार दिया. ढलती उम्र के बावजूद अपने फिल्मी करियर के  चौथे दशक में भी धर्मेंद्र के  जोश में कोई कमी नहीं आई. उन्होंने 44 फिल्मों में काम किया. आज वह उम्र के  उस पड़ाव पर हैं, जहां संघर्ष, जुस्तजू, इच्छाओं, शोहरत और कामयाबी कोई मायने नहीं रखती. इन सबके बावजूद धर्मेंद्र फिल्मी पर्दे से अपना रिश्ता ख़त्म करने को तैयार नहीं हैं. इस साल वह टीवी चैनल पर बतौर जज अपनी नई पारी का आगा़ज़ कर चुके  हैं. वह अपनी जीवनी उर्दू में लिख रहे हैं. धर्मेंद्र को फिल्मों मे लाने वाले अर्जुन हिंगुरानी उनकी सादगी के दीवाने हैं.

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