उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड सु़र्खियों में है. वोटों की महाभारत में सबकी नज़र बुंदेली भूमि पर है. वर्ष 1987 के राठ विधानसभा उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी सूबे में पहली बार दूसरे नंबर पर आई थी. यहीं से बुंदेलखंड में बसपा के पैर जमने शुरू हुए और आज वह सत्ता में है. लेकिन अब बसपा में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है. इसी बात पर नज़र रखते हुए राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश रण विजय का रास्ता बुंदेलखंड से चुना है.
महरोनी, ललितपुर, झांसी, बबीना, मऊरानीपुर, कोच, माधवगढ़, कालपी, नरेनी, मानिकपुर, कर्वी, चरखारी, महोबा, मोदहा, राठ सहित बुंदेलखंड की 21 में से 15 पर बसपा क़ाबिज़ है, जबकि चार पर समाजवादी पार्टी तथा दो पर कांग्रेस क़ाबिज़ है. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी द्वारा बुंदेलखंड के विकास के लिए विशेष पहल के तहत दिलाया गया पैकेज और इस पैकेज की बंदरबांट को चुनावी मुद्दा बनने के कारण बुंदेलखंड में आमने-सामने की लड़ाई कांग्रेस और बसपा की है. बसपा द्वारा प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में लाने के बाद बुंदेलखंड राज्य का विरोध सपा के लिए खतरनाक साबित होने वाला है.
लोकसभा के चुनाव में एक सीट जीतने के साथ दूसरी सीट पर नंबर दो की पोजीशन पाने वाली कांग्रेस का सीधा मुक़ाबला बसपा से है. झांसी गढ़ में बसपा से मात खाने के बाद इस बार कांग्रेस ने कभी बसपा से विधायक रहे बृजेंद्र व्यास उ़र्फ डमडम व्यास को प्रत्याशी बनाया है, तो ललितपुर की मेहरौनी विधानसभा क्षेत्र से बसपाई रहे रमेश खटीक को मैदान में उतारा है. बसपा भी पीछे नहीं है. उसने झांसी से कांग्रेसी रहे सीताराम कुशवाहा और गरौठा से पालीवाल को प्रत्याशी बनाया है. बुंदेलखंड के सबसे ताक़तवर बहुविभागीय मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी के सगे भाई हसनउद्दीन ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है. यही हालत बुंदेलखंड के कई इलाक़ों में है. 2007 के चुनाव में गयाचरण दिनकर और बाबूलाल ने अपनी हार का ज़िम्मेदार दद्दू प्रसाद और नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी को माना था. शह-मात का खेल खुलेआम चल रहा है, जिसके कारण प्रदेश सरकार के एक मंत्री समाचार-पत्रों में एक प्रभारी के खिला़फ खबरें छपवा रहे हैं, तो बांदा और लखनऊ से प्रकाशित समाचार-पत्रों में नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और बाबू सिंह कुशवाहा के विरुद्ध आरोप-प्रत्यारोप का खेल चल रहा है. बुंदेलखंड में लगातार टूटते पुल, पलायन और बेरोज़गारी से त्रस्त जनता कराह रही है. ऐसे में मायावती की बुंदेलखंड राज्य का सपना दिखाकर वोटों को अपनी झोली में झटकने की कोशिश कितनी कामयाब होती है. यह कहना कठिन है, क्योंकि उपेक्षा का दंश सहते मायावती के क़रीबी रहे दीवान रघुनाथ सिंह लोधी, बाबू रामदीन, के आर शशि का कहीं अता-पता नहीं है. हालांकि नसीममुद्दीन सिद्दीक़ी, बाबूलाल, बाबू सिंह कुशवाहा, गयाचरण दिनकर, सेवाराम, विशंभर प्रसाद निशाद, मास्टर प्रताप सिंह, बृजेंद्र व्यास, ब्रजलाल खाबरी, तिलक अहिरवार, पी.एन. भास्कर आदि राजनीति में पैठ बना गए, लेकिन बाबूराम दीन, केआर शशि, विशंभर प्रसाद निशाद, मास्टर प्रताप सिंह, बृजेंद्र व्यास आदि किनारा कर चुके हैं. ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद सवालों के घेरे में हैं. लोकायुक्त के सामने आय से अधिक संपत्ति, पद के दुरुपयोग तथा सरकारी एवं निजी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करने के आरोपों की शिकायत पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा, बादशाह सिंह के साथ-साथ वर्तमान मंत्री दद्दू प्रसाद, रतनलाल अहिरवार के विरुद्ध की गई है. इस संदर्भ में जांच चल रही है. बसपा के जोनल कोऑर्डिनेटर बृजलाल खाबरी की कार्यप्रणाली को लेकर एक काबीना मंत्री के इशारे पर आरोपों का दौर शुरू होने पर उनके निकट सूत्र सवाल करते हैं कि गयाचरण दिनकर की हार में किसने भूमिका अदा की है. इसका टेप सामने आ जाएगा तो बड़ों-बड़ों की छुट्टी हो जाएगी. बांदा संसदीय क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी भैरो प्रसाद मिश्र की हार के पीछे कौन था? दद्दू प्रसाद को क्षेत्र से किनारा कराने के लिए गोरखपुर मंडल से लोकसभा प्रत्याशी बनाने के साथ-साथ उनकी पत्नी हीरा देवी को मानिकपुर क्षेत्र से विधानसभा प्रत्याशी बनाया गया था. बाद में मुख्यमंत्री द्वारा अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को सामान्य सीट से न लड़ाने की नीति के तहत हीरा देवी का टिकट काट दिया गया. दद्दू प्रसाद अपने विरुद्ध कमला द्वारा अस्मत लूटने का आरोप लगने के साथ-साथ आय से अधिक संपत्ति जैसे अनेक मामलों को एक षडयंत्र का हिस्सा मानते हैं. कांग्रेस से ललितपुर विधानसभा सीट से वीरेंद्र बुंदेला अभी तक प्रत्याशी घोषित नहीं हुए हैं, फिर भी उन्हें जिताने को बसपा से कमज़ोर प्रत्याशी रमेश कुशवाहा को चुनाव में खड़ा करने का आरोप निराधार है. झांसी विधानसभा सीट से डमडम व्यास को बसपा से किसने निकलवाया था. अब डमडम व्यास कांग्रेस के प्रत्याशी हैं तो इसमें खाबरी का क्या दोष है? सीटिंग विधायक कैलाश साहू का टिकट काटकर बसपा ने सीताराम कुशवाहा को प्रत्याशी घोषित किया है. गरौठा विधानसभा सीट से कांग्रेस के रणजीत सिंह जूदेव के म़ुकाबले बसपा ने संजीव पालीवाल को प्रत्याशी बनाया है. माधवगढ़ सीट से कांग्रेस के विनोद चतुर्वेदी को जिताने को सीटिंग विधायक हरिओम उपाध्यक्ष को हराने की रणनीति बनाई जा रही है. हमीरपुर में कांग्रेस प्रत्याशी केशव शिवहरे के मुक़ाबले में लोकमंच से घोषित फतेह खान को बसपा ने प्रत्याशी बनाया है. बांदा से मंत्री नसीमुद्दीन के साले मुमताज़ अली के साथ ठेकेदारी करने वाले दिनेश शुक्ल को बसपा ने प्रत्याशी बनाया है. कानपुर देहात के बाशिंदे और प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री भगवती सागर को पुन: मऊरानीपुर से उम्मीदवार बनाने पर पार्टी में तक़रार हो गई है. चित्रकूट से बसपा से निष्कासित पूर्व लोकसभा सचिव राजेंद्र कुशवाहा ने कमला मामले में मंत्री दद्दू प्रसाद के प्रति उकसाने व पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के जोनल कोऑर्डिनेटर बृजलाल खाबरी के आरोप की निंदा की है. उन्होंने कहा है कि मामले में समझौता कराने पर असमर्थता जताने की स्थिति में उन्हें पार्टी से निकाला गया है. दलितों को अपमानित करने वाले पाल को पाल भाईचारा समाज का कोऑर्डिनेटर बना दिया गया, जबकि उन्हें खाबरी के ज़रिये पार्टी से निकाला जा रहा है. इससे मंत्री दद्दू का दोहरा चरित्र सामने आता है. भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग में लोकायुक्त की जांच में फंसकर श्रम मंत्री का पद गंवाने वाले बादशाह सिंह विधानसभा का आगामी चुनाव लड़ेंगे. मुख्यमंत्री मायावती ने बादशाह सिंह को विधानसभा का टिकट देने से मना कर दिया था. वह विधानसभा का पिछला चुनाव हमीरपुर ज़िले की मौदहा सीट से जीते थे. सिंह के प्रत्याशी होने की घोषणा से बुंदेलखंड में बसपा के समीकरण गड़बड़ होने की आशंका पैदा हो गई है. लगभग ढाई दशक में राजनीति की बुलंदियों को छू लेने वाले बुंदेलखंड के क़द्दावर नेता बादशाह सिंह ने इंसा़फ सेना नामक संगठन बनाया था और इसके बैनर तले ही बुंदेलखंड के अलग राज्य के लिए संघर्ष करने का भी ऐलान किया था. वहीं सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करने वाले बादशाह सिंह अब राजनीति में लौट आए हैं. उन्होंने कहा कि वह अपने विरोधियों को चुनाव में सबक़ सिखाएंगे. परिसीमन के बाद मौदहा सीट खत्म कर दी गई है. कुशवाहा समाज के लोगों ने बाबू सिंह कुशवाहा के मंत्री पद से हटते ही अब इसी बसपा को धोखेबाज़ बताना शुरू कर दिया है. पद छिनने से बौखलाए लोगों ने कुशवाहा समुदाय के चिंतन शिविर के माध्यम से अब इसी थाली को तोड़ने का कुचक्र शुरू किया है, जिसमें वह भरपेट खाना खाने लायक़ हुए हैं. हाल में चित्रकूट ज़िले में संपन्न कुशवाहा समाज के चिंतन शिविर में कुशवाहा समाज के प्रदेश अध्यक्ष राकेश मौर्य, धनीराम बलदानी एक तऱफ तो पूरे कुशवाहा समाज को बसपा का एकमुश्त वोट बैंक बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सम्मेलन के ज़रिये पार्टी और उसकी मुखिया दोनों को चुनौती दे रहे हैं.
महरोनी, ललितपुर, झांसी, बबीना, मऊरानीपुर, कोच, माधवगढ़, कालपी, नरेनी, मानिकपुर, कर्वी, चरखारी, महोबा, मोदहा, राठ सहित बुंदेलखंड की 21 में से 15 पर बसपा क़ाबिज़ है, जबकि चार पर समाजवादी पार्टी तथा दो पर कांग्रेस क़ाबिज़ है. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी द्वारा बुंदेलखंड के विकास के लिए विशेष पहल के तहत दिलाया गया पैकेज और इस पैकेज की बंदरबांट को चुनावी मुद्दा बनने के कारण बुंदेलखंड में आमने-सामने की लड़ाई कांग्रेस और बसपा की है. बसपा द्वारा प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा में लाने के बाद बुंदेलखंड राज्य का विरोध सपा के लिए खतरनाक साबित होने वाला है. भाजपा की बुंदेलखंड राज्य के मामले में चुप्पी के कारण ही सूपड़ा सा़फ हो चुका है. नए परिसीमन में 21 में 19 विधानसभा सीटें रह गई हैं. देखना यह है कि आपसी रार में डूबी बसपा चुनावी संग्राम में अपने कितने गढ़ खोती है और कितने नए गढ़ों पर क़ब्ज़ा करती है.
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