काला धन पर बहसः नीति और नीयत दोनों में खोट है

काला धन. एक ऐसा शब्द जिसके सहारे विपक्ष जनता को सुनहरे भविष्य और खुद के लिए सत्ता का सपना देख रहा है. लालकृष्ण आडवाणी ने इसी मुद्दे पर रथ यात्रा कर डाली. संसद में इस मुद्दे पर बहस कराने के लिए बीजेपी ने ए़डी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. बहस भी हुई, लेकिन नतीजा स़िफर. सरकार ने भी माना कि हां, कालाधन का पता है. नाम भी मालूम हैं, लेकिन बताएंगे कुछ नहीं. क्योंकि इससे हमारे सूत्र खराब हो जाएंगे. संबंध बिग़ड जाएंगे. आगे से कोई सूचना नहीं मिलेगी. हमारा स्विट्‌जरलैंड के साथ क़रार है. हम नाम नहीं बता सकते.

का़फी जद्दोजहद के बाद आ़खिरकार सरकार लोकसभा में काले धन पर बहस के लिए मान गई. विपक्ष ने ऐसा माहौल बनाया, मानो अब काला धन वापस आने ही वाला है. देश के छह लाख गांवों की क़िस्मत संवरने ही वाली है. लेकिन जब वित्त मंत्री का जवाब आया. बहस खत्म हुई, तो नतीजे के तौर पर इस देश की जनता को यही पता चला कि विदेशी बैंकों में प़डा काला धन कभी वापस नहीं आने वाला. ज़ाहिर है न तो सरकार की ऐसी नीयत है और न ही ऐसी नीति.

लेकिन सवाल है कि सरकार के पास उपलब्ध नामों को ज़ाहिर करना ज़्यादा ज़रूरी है या काले धन को वापस लाना या फिर उस समझौते का पालन करना, जिसकी वजह से सरकार ने अपने हाथ बांध लिए हैं. विकीलीक्स वाले जुलियन असांजे ने कहा भी है कि अगले साल वह उन भारतीयों के नामों का खुलासा करेंगे, जिनका काला धन विदेशी बैंकों में हैं. क्या सरकार असांजे की उस घोषणा का इंतज़ार कर रही है? अगर सचमुच ऐसा हो गया तो फिर सरकार के पास क्या विकल्प बचेगा?

काले धन जैसे अहम मुद्दे पर हुई यह बहस भी महज़ आरोप-प्रत्यारोप और खुद को बेहतर दिखाने की कोशिश बन कर रह गई. बीजेपी ने पहले ही अपने सभी सांसदों से एक शपथ पत्र दिलवा कर यह घोषणा करवा दी थी कि उनका विदेशों में कहीं कोई ग़ैर क़ानूनी या संदेहास्पद खाता नहीं है. इसी को मुद्दा बनाकर कांग्रेस की ओर से मनीष तिवारी ने कहा कि विदेशी बैंकों और देश के भीतर के बैंकों में जमा काले धन में कोई ज़्यादा अंतर नहीं है. तिवारी ने बीजेपी को जवाब देते हुए कहा कि एनडीए के सांसदों को अपने देश के बैंकों में जमा पैसे की भी जानकारी देनी चाहिए. तिवारी के मुताबिक़, एनडीए नहीं चाहता कि काला धन वापस हो, बल्कि वह इस मसले पर राजनीति कर रहा है.

विकीलीक्स के जुलियन असांजे ने कहा भी है कि अगले साल वह उन भारतीयों के नामों का ख़ुलासा करेंगे, जिनका काला धन विदेशी बैंकों में हैं. क्या सरकार असांजे की उस घोषणा का इंतज़ार कर रही है. अगर सचमुच ऐसा हो गया तो फिर सरकार के पास क्या विकल्प बचेगा?

बहरहाल, लालकृष्ण आडवाणी के मुताबिक़, विदेशी बैंकों में जमा काला धन 2जी घोटाले की रक़म (एक लाख 76 हज़ार करो़ड रुपये) से कहीं ज़्यादा है. बीजेपी ने ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी की रिपोर्ट को आधार बताते हुए कहा कि भारतीयों ने 25 लाख करो़ड रुपये विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में छुपा कर रखा है. हालांकि सरकार इस आंक़डे को नहीं मान रही है. बहस के दौरान विपक्ष 25 लाख करो़ड रुपये का आंक़डा बताता रहा तो सरकार कुछ और. आडवाणी ने काले धन में ब़ढोतरी के लिए देश की आर्थिक और उदारवादी नीतियों को कारण बताया. आडवाणी चाहते थे कि लिंचेस्टाइन के बैंकों से मिले नामों को सरकार सार्वजनिक करे.

काले धन के मुद्दे पर सरकार ने सा़फ कर दिया कि विदेशी बैंकों के भारतीय खाताधारकों के नामों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है. हां, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यह ज़रूर बताया कि सरकार के पास जो सूची है, उसमें किसी सांसद का नाम नहीं है. प्रणब ने कहा कि सरकार के पास काले धन के संबंध में 36 हज़ार सूचनाएं मिली हैं, लेकिन विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एग्रीमेंट की वजह से इन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है. प्रणब मुखर्जी के अनुसार सरकार ने अभी तक विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में जमा 66 हज़ार करोड़ रुपये का पता लगाया है. मुखर्जी ने विपक्ष को यह आश्वासन दिया कि इस मुद्दे पर सरकार श्वेत पत्र लाएगी. लेकिन प्रणब मुखर्जी ने इस बहस के दौरान सदन को वही बात बताई, जो बात चौथी दुनिया ने पांच महीने पहले ही बता दी थी. मुखर्जी ने बताया कि सितंबर 2010 में स्विस विदेश मंत्री के साथ एक क़रार हुआ है और एक अप्रैल, 2011 के बाद की ही सूचनाएं मिल सकेंगी. इससे पहले की जानकारी यानी खाताधारकों की सूचना नहीं मिलेगी. सवाल उठता है कि जब क़रार हुए इतने महीने बीत चुके हैं तो इस खबर को अब तक जनता से छुपा कर क्यों रखा गया?

इस बहस में नया कुछ नहीं था

चौथी दुनिया ने इस साल जुलाई के ही अंक में (शीर्षक: अब काला धन वापस नहीं आएगा) यह बताया गया था कि अब इस देश में काला धन वापस नहीं आ सकेगा. अब यह भी पता नहीं चल पाएगा कि वे कौन-कौन लोग हैं, जिन्होंने देश का पैसा लूट कर स्विस बैंकों में जमा किया है. यह सब इसलिए क्योंकि भारत सरकार ने स्विट्ज़रलैंड की सरकार के साथ मिलकर एक शर्मनाक कारनामा किया है, लेकिन संसद में बहस से पहले देश में इसकी चर्चा तक नहीं थी. दरअसल, सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज के  चेयरमैन प्रकाश चंद्र ने तब एक बयान दिया था. उस बयान के मुताबिक़, स्विट्ज़रलैंड और भारत के बीच काले धन के मामले में हुए क़रार को स्विट्ज़रलैंड की संसद की मंज़ूरी मिल गई है. इस क़रार में भारतीय नागरिकों के स्विस बैंकों के खातों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रावधान है. प्रकाश चंद्र ने कहा था कि इस क़ानून के लागू होने के बाद खोले गए खातों के बारे में ही जानकारी मिल सकती है. इसका मतलब यह हुआ कि जो खाते इस क़ानून के लागू होने से पहले खुले हैं, उनके बारे में अब कोई जानकारी नहीं मिलेगी, यानी भारतीय अधिकारियों को अब तक जमा किए गए काले धन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकेगी. अब भला इस क़ानून के बाद कोई मूर्ख ही होगा, जो इस क़ानून के लागू होने के बाद स्विस बैंकों में अपना खाता खोलेगा. पांच महीने बाद जब संसद में काले धन पर चर्चा हुई और प्रणब मुखर्जी द्वारा इस विषय पर दिए गए जवाब से साबित हो गया कि इस देश के लोग अब काला धन की वापसी की आशा न करें. अब तक भारत सरकार यह कहती आ रही थी कि स्विट्ज़रलैंड के क़ानून की वजह से हमें इन खातों के बारे में जानकारी नहीं मिल रही है. तो भारत सरकार को ऐसा क़रार करना चाहिए था कि अब तक जितने भी खाते वहां खुले हैं, उनकी जानकारी मिल सके, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया. इससे यही सा़फ होता है कि सरकार काले धन के  मामले पर देश के लोगों को गुमराह कर रही है.

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