मिस्र की दूसरी क्रांति

हम लोगों ने इसलिए संघर्ष नहीं किया था कि एक तानाशाह को सत्ता से हटाकर दूसरे तानाशाह के लिए ज़मीन तैयार करें. हमें लोकतंत्र चाहिए, सैनिक हस्तक्षेप से चलने वाला शासन नहीं. ऐसी ही आवाज़ें उठ रही हैं मिस्र की राजधानी क़ाहिरा के उस तहरीर चौक से, जहां हज़ारों लोग एक बार फिर से सेना के सत्ता पर क़ाबिज़ होने की मंशा को चकनाचूर करने के लिए एकत्रित हुए हैं. उन्हें लग रहा है कि सेना नहीं चाहती कि मिस्र की जनता को लोकतांत्रिक सरकार मिले. जो सरकार हो, वह देखने सुनने में तो पूरी तरह लोकतांत्रिक दिखाई पड़े, लेकिन शासन पर अधिकार सेना का हो. लेकिन मिस्र की जनता ने सेना की इस चाल को समझ लिया और निकल पड़ी फिर से क्रांति की राह पर. लोगों से तहरीर चौक पर जमा होने की अपील की गई. राजधानी क़ाहिरा के इस चौक पर जन सैलाब उमड़ पड़ा. सेना और सरकार के विरुद्ध आवाज़ें उठने लगीं. सेना द्वारा की जा रही कार्रवाई के विरुद्ध वहां जमा लोग भी पत्थर और पेट्रोल बम का इस्तेमाल कर रहे हैं. भीड़ को हटाने के लिए सेना द्वारा की गई कार्रवाई में 50 लोगों की मौत हो गई तथा हज़ारों लोग घायल हो गए, लेकिन इससे उनकी हिम्मत नहीं टूटी है. मिस्र के सबसे संगठित राजनीतिक गुट मुस्लिम ब्रदरहुड ने भी तहरीर चौक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. हालांकि इसके विभिन्न संगठनों ने अपने मंच अलग-अलग लगाए हैं, लेकिन उनकी मांग एक ही है. उनका कहना है कि सेना को स्थाई राजनीतिक अधिकार देने का प्रस्ताव खारिज किया जाए तथा जल्द ही राष्ट्रपति का चुनाव भी करवाया जाए. ग़ौरतलब है कि संसदीय चुनाव में मुस्लिम ब्रदरहुड को अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है और वह सत्ता पर क़ाबिज़ होने के अपने सपने को टूटने नहीं देगा. होस्नी मुबारक के विरुद्ध हुए आंदोलन का परिणाम देख चुकी मिस्र की सेना के पास अब कोई विकल्प नहीं था. उसने पहले इस आंदोलन को कुचलने की भरपूर कोशिश की, लेकिन जब उसे इस बात का अहसास हो गया कि आंदोलन को दबाया नहीं जा सकता तो उनकी मांगें स्वीकार करने लगी. सबसे पहले तो सेना की ओर से नियुक्त कैबिनेट ने प्रधानमंत्री एसाम शरा़फ की अगुवाई में इस्ती़फा दे दिया. लेकिन सेना की सुप्रीम काउंसिल शुरू में इस इस्ती़फे को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी. मगर जब आंदोलन की आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी तो सैन्य परिषद को उनका इस्ती़फा मंज़ूर करना पड़ा. इसके बाद सैन्य परिषद ने राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया तीव्र करने की आंदोलनकारियों की मांग को भी स्वीकार कर लिया. लेकिन मिस्र की जनता अभी भी तहरीर चौक पर जमी हुई है. उसकी मांग है कि सैन्य परिषद के प्रमुख फील्ड मार्शल मोहम्मद हुसैन तंतावी इस्ती़फा दें तथा सैन्य परिषद का शासन जल्द से जल्द समाप्त हो. हालांकि सैन्य परिषद के प्रमुख ने इस मुद्दे पर आपात बैठक बुलाई है, जिसमें सेना के प्रतिनिधियों के अलावा राजनीतिक दल के नेता शामिल हुए. तंतावी ने कहा है कि सेना केवल राष्ट्र की सुरक्षा चाहती है न कि शासन करने की उसकी मंशा है. उन्होंने जुलाई तक राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराने की बात कही है. उन्होंने यह भी कहा है कि संसद का चुनाव पूर्व निर्धारित समय पर कराया जाएगा. बहरहाल, यह उम्मीद की जा रही है कि मिस्र की जनता की जीत होगी.

मिस्र के युवा जल्द से जल्द लोकतंत्र बहाल करना चाहते हैं. उन्होंने अपने को ठगा महसूस किया. सेना को क्रांति विरोधी क़रार दिया तथा क़ाहिरा और अलक्जेंड्रिया जैसे शहरों में इकट्ठे होने लगे. पहले सेना ने इसे दबाने की कोशिश की, लेकिन जब प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने लगी तो उनकी बात मान ली. मिस्र की जनता सोई नहीं है, जागी हुई है. जागृत लोगों को धोखा नहीं दिया जा सकता. मिस्र की सेना को इसका पता लग गया है तथा मिस्र की दूसरी क्रांति लगभग सफल हो गई है.

ग़ौरतलब है कि बीती फरवरी में हुई क्रांति के बाद तीस सालों से शासन पर क़ाबिज़ होस्नी मुबारक को सत्ता छोड़नी पड़ी थी. होस्नी मुबारक के बाद मिस्र के शासन की बागडोर सेना के हाथ में सौंप दी गई थी. उस समय आंदोलन करने वाले युवा इससे खुश थे, लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने उस समय भी इसे सही नहीं बताया था. उनका कहना था कि सेना के हाथ में सत्ता देना लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है. उनका अनुमान सही निकला. अंतरिम सरकार संविधान संशोधन का प्रस्ताव लाई, जिसके मुताबिक़ सेना को संवैधानिक वैधता का रक्षक घोषित करना था. साथ ही इसमें यह भी कहा गया कि सेना के बजट को सावर्जनिक नहीं किया जाएगा. इसके अलावा राष्ट्रपति पद के चुनाव को 2012 के अंत या 2013 तक के लिए टाल दिया गया. संविधान संशोधन के इस प्रस्ताव से जनता भड़क गई. उन्हें लगने लगा कि सेना किसी तरह सत्ता अपने पास रखना चाहता है. मिस्र के युवा जल्द से जल्द लोकतंत्र बहाल करना चाहते हैं. उन्होंने अपने को ठगा महसूस किया. सेना को क्रांति विरोधी क़रार दिया तथा क़ाहिरा और अलक्जेंड्रिया जैसे शहरों में इकट्ठे होने लगे. पहले सेना ने इसे दबाने की कोशिश की, लेकिन जब प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ने लगी तो उनकी बात मान ली. मिस्र की जनता सोई नहीं है, जागी हुई है. जागृत लोगों को धोखा नहीं दिया जा सकता. मिस्र की सेना को इसका पता लग गया है तथा मिस्र की दूसरी क्रांति लगभग सफल हो गई है.

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